लोकतंत्र के पुनर्जागरण का समय 

आगामी साल से शुरू होने वाला चुनावों का दौर अब हमारे सामने है। 2027 की शुरुआत से लेकर साल के अंत तक सात राज्यों में नई सरकारें चुनने के लिए चुनाव होंगे। ये चुनाव निश्चित रूप से 2029 के लोकसभा चुनावों से पहले राजनीतिक दृश्य को प्रभावित करेंगे और इससे भी अहम बात यह है कि ऐसे समय में भारतीय लोकतंत्र के उद्देश्य और प्रक्रिया की जांच करेंगे, जब चुनाव प्रणाली की निष्पक्षता और विश्वनीयता पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। 
फिज़ूल की बातें, इशारों में लगाए जाते आरोपों, निंदा तथा गाली-गलौच का बेहद शोर, संघीय ढांचे की बुनियादी धारणों पर रानजीतिक सहमति का खात्म, संवैधानिक सत्ता की सीमाओं का उल्लंघन तथा सार्वजनिकजीवन में दिखाई दे रहा नैतिक पतन—ये सब हमें राष्ट्र और उसकी राजनीति की स्थिति के बारे में और ज़्यादा संजीदा और विवेकपूर्ण विचार करने के लिए मजबूर करते हैं। यह विचार इस याद के साथ शुरू होना चाहिए कि लोगों के वोट का अंतिम मकसद सिर्फ बहुमत वाली सरकार बनाना नहीं है। इसका मकसद एक ऐसी सरकार सुनिश्चित बनाना है, जो मौलिक आज़ादी में निहित इंसानी मर्यादा की उन्नति के लिए वचनबद्ध हो और यही संविधान की सबसे बड़ी ज़रूरत है, क्योंकि सभ्य समाज की पहचान न्याय की उस धारणा से होती है, जिसकी नींव इंसानी मर्यादा पर आधारित हो, जो समय के अनुभवों के ज़रिये विकसित हुई हो और इतिहास की कसौटी पर जांची गई हो। 
लोकतंत्र सिर्फ बहुमत का शासन नहीं है। इसके केन्द्र में इंसानी मर्यादा की ईमानदारी है, जो मानवाधिकारों की पवित्रता से सुरक्षित होती है। यह लोकतंत्र का मूल वादा भी है और इसकी बुनियादी शर्त भी। लोकतंत्र की यह धारणा बहुमत के सिद्धांत के औचित्य या अहमियत से इन्कार नहीं करती, लेकिन यह इस विचार को स्वीकार नहीं करती कि बहुमत की इच्छा ही अपने आप में संवैधानिक औचित्य का आखिरी और बड़ा स्रोत है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया लगातार ऐसे सवाल पछने की मांग करती है, जो एक न्यायपूर्ण एवं समानतापूर्ण सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था की तलाश में ‘गिरावट के मलबे को हटा’ सकें। इसलिए यह पूछना ज़रूरी है कि भारत की भौतिक और तकनीकी तरक्की के क्षेत्र में प्रशंसनीय उन्नति के बावजूद भाईचारे और हमदर्दी पर आधारित एक न्यायपूर्ण समाज का संवैधानिक वादा आज भी इतना दूर क्यों लगता है। सवाल मुश्किल हैं, लेकिन उनसे बचा नहीं जा सकता।
हमें सबसे पहले खुद से पूछना चाहिए कि क्या सच्चे लोकतंत्र के उन गुणों और ऊंचे मूल्यों को पोषित किया जा सकता है, जब राजनीतिक वफादारियां ऐसी मुफ्त की सुविधाओं से हासिल की जाती हों, जो अक्सर हाशिए पर खड़े लोगों की मजबूरियों का फायदा उठाकर उन्हें राजनीतिक लाभ का ज़रिया बनाती हैं? भारत के बड़े बहुसंख्यक के असंतोषजनक जीवन-हालात-मौलिक अधिकारों और मर्यादा से वंचित अधूरी ज़िन्दगी का न खत्म होने वाला संघर्ष—वह ‘अच्छा जीनव’ नहीं हो सकता जिसकी कल्पना हमारे संविधान निर्माताओं और कल्याणकारी राज्य के विचारकों ने की थी।
यह हमें याद दिलाता है कि सिर्फ भौतिक तरक्की से इंसानियत को पोषित नहीं कर सकती। आज़ादी के मुश्किल से एक दशक बाद लिखी गई साहिर लुधियानवी की दिल को छू लेने वाली पंक्तियां आज भी बेचैन कर देने वाली प्रासंगिकता रखती हैं : 
हर इक जिस्म घायल, हर इक रूह प्यासी,
निगाहों में उलझन, दिलों में उदासी,
ये दुनिया है या आलम-ए-बेहवासी,
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है।
(हर जिस्म घायल है, हर रूह प्यासी है, आंखों में बेचैनी और दिलों में उदासी। क्या यही वो दुनिया है जिसकी हमने कामना की थी, या ये सिर्फ निराशा की दुनिया है?)
ये पंक्तियां एक देश की अधूरी उम्मीदों और उसकी राजनीति की नाकामी को बेहद प्रभावशाली ढंग से दर्शाती है। 
भारतीय राजनीति, कड़वी दल-बंदी और बेअंत तीव्र  राजनीतिक दुश्मनी में फंस कर, लोकतांत्रिक मुकाबले के उस बड़े मकसद को दृष्टिविगत करने के खतरे में हैं, जिसका आधार व्यक्ति की मर्यादा पर आधारित एक समानतापूर्ण व्यवस्था की ओर बढ़ने के लिए विचारों का आज़ाद आदान-प्रदान है। लोकतंत्र की ये मूल धारणाएं और हमारे राजनीतिक जीवन की हकीकतों को बार-बार याद करना ज़रूरी है ताकि हम सिर्फ इस कारण यह भ्रम न पालें कि भारतीय लोकतंत्र में सब कुछ ठीक है, क्योंकि चुनाव लगातार होते रहे हैं। 
इसलिए हमें लगातार यह पूछते रहना होगा कि क्या हमारे राजनीतिक नेता उन तनावों और चुनौतियों का सामना करने के लिए काफी गंभीरता से सोच, बोल और काम कर रहे हैं, जिन्होंने मिलकर देश को उस मर्यादा-आधारित समाज की ओर यात्रा को रोका है, जिसकी कल्पना हमारे संविधान निर्माताओं ने की थी। हमें उन सुखद नतीजों का सामना करने से भी हिचकिचाना नहीं चाहिए, हो इन सवालों से सामने आते हैं।
चाहे यह बात कठोर लगे, लेकिन एक शक्तिशाली राज की शान और भौतिक तरक्की के आकर्षण से प्रभावित होकर हम राजनीतिक असहनशीलता और सत्ता के भय को स्वीकार कर लिया है। विभाजक और नफरत से प्रेरित पक्षपात से जन्मा एक राजनीतिक तौर पर अस्थिर समाज, कमज़ोर होती लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा कम होती मौलिक आज़ादी के साथ मिल कर ऐसी राजनीति  की कहानी बयान करता है, जिसे नैतिक एवं संस्थागत पुनर्जागरण की ज़रूरत है।
अनुभव यह सिद्ध करता है कि लोकतंत्र लोगों की चेतना में न्याय के साधन के तौर पर तभी जीवित रहता है, जब उसकी नींव दया, संवाद, विनम्रता और समझदारी पर आधारित हो। राजनीतिक विरोधियों का लगातार बहिष्कार और सत्ता का अहंकार तथा दुरुपयोग लोकतांत्रिक सिद्धातों से मेल नहीं खाते। लोकतंत्र सत्ता के इस्तेमाल में समझ, संयम और उदारता की मांग करता है। सत्ता अपने आप में अपनी बेगुनाही का सबूत स्वयं रिकार्ड में दर्ज नहीं कर सकती।
सत्तारूढ़ पार्टी को संवैधानिक दायरे में रह कर शासन करने का अधिकार है, लेकिन उसे यह समझना होगा कि संवैधानिक सत्ता, जिसकी अपनी एक सीमा है, मनमाने ढंग से इस्तेमाल होने पर अपनी ईमानदारी खो देती है। इसलिए लोगों के नाम पर इस्तेमाल की जाने वाली सत्ता एक नैतिक पहरेदार—यानी संवैधानिक अंतआर्त्मा के अधीन रहना चाहिए, जो इसकी सीमाएं निर्धारित करती है।
सत्ताधारी व्यवस्था को यह समझना चाहिए कि अन्याय के खिलाफ लोगों का नैतिक विरोध ही लोकतंत्र को सार्थक बनाता है और जन आंदोलनों का दमन लोकतांत्रिक चेतना को और मज़बूत करता है। दूसरी ओर, विपक्ष राष्ट्र की नैतिक चेतना और कल्पना का प्रतिनिधित्व तभी कर सकता है, जब उसमें बौद्धिक ईमानदारी और राजनीतिक निरन्तरता हो। बड़े उद्देश्यों का समर्थन करना और फिर उनके लिए ज़रूरी त्याग और मुश्किल फैसले लेने के लिए तैयारी ही उन राजनीतिक नेताओं को इतिहास में प्रगतिशील बदलाव के वाहक के रूप में दर्ज कर सकती है, जो जंतर-मंतर तथा अन्य स्थानों पर सक्रिय हैं। राष्ट्र अपनी विकास यात्रा पर गर्व कर सकता है और करना भी चाहिए। फिर भी महात्या गांधी की 157वीं वर्षगांठ पर हमें ठहर कर उन सुधारों के बारे में सोचना चाहिए, जो ऐसे समय में भारत को एक आदर्श लोकतंत्र बनाने के लिए ज़रूरी हैं, जब विश्व भर में लोकतंत्र पीछे हटता दिखाई दे रहा है। लोकतंत्र के पुनर्जागरण के लिए राजनीति को मानवीय बनाना तथा सत्ता के व्यवहार को सभ्यक एवं संयम वाला बनाना ज़रूरी है। इसलिए हमें अपने राजनीतिक आचरण में एक दृढ़ नैतिक संहिता को जगह देनी होगी—ऐसी संहिता जो चुनाव राजनीति की अल्प समय की मांगों तथा जीत के घमंड से ऊपर मानवीय मर्यादा, भाईचारे, आज़ादी तथा न्याय को स्थान दे। 
राष्ट्रपिता को श्रद्धांजलि देते समय अमरीकी महिला मानवाधिकारों आंदोलन की एक प्रमुख नेता कैरी चैपमैन कैट के प्रेरणादायक शब्दों को याद करना उचित होगा :
उन गलतियों के विरुद्ध, जिनका विरोध लाज़िमी है,
उन हकों के लिए, जिनकी सराहना की ज़रूरत है,
उस भविष्य के लिए, जो दूर हमारा इंतज़ार कर रहा है।
अपने-आप को समर्पित कर दें।
गलत के विरोध में खड़े होने, कमज़ोर तथा वंचित लोगों के अधिकारों का साथ देने तथा भविष्य के प्रति अपने-आप को समर्पित करने का यह आह्वान उस नैतिक दिशा-सूचक के रूप में काम कर सकता है, जिसकी भारतीय लोकतंत्र को अपने आगामी चुनावी दौर में दाखिल होते समय सबसे अधिक ज़रूरत है। 


—लेखक, सीनियर एडवोकेट तथा भारत के पूर्व केन्द्रीय कानून एवं न्याय मंत्री हैं। उनकी ओर से व्यक्त किए गए विचार निजी हैं।

#लोकतंत्र के पुनर्जागरण का समय