नोबेल शांति पुरस्कार पाने वाली भारतीय मूल की नवी पिल्लई
दुनियाभर में युद्ध, अशांति, तनाव और अन्याय का दौर चल रहा है। इसी बीच शांति के लिए संघर्ष करने वालों को मिलने वाला नोबेल पुरस्कार मानवता के लिए उम्मीद की किरण है। हाल ही में दक्षिण अफ्रीका की दिग्गज मावनाधिकार कार्यकर्ता और न्यायविद् नावी पिल्लई को प्रतिष्ठित नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित करने की घोषणा की गई है। नावी पिल्लई का भारत से गहरा नाता है। उनके पूर्वज करीब 136 साल पहले तमिलनाडु से दक्षिण अफ्रीका में बसे थे।
नोबेल शांति पुरस्कार-2026 के लिए दक्षिण अफ्रीका की न्यायविद नवनेथेम ‘नवी’ पिल्लई को चुना गया है। उन्हें यह सम्मान शांति को बढ़ावा देने और अंतर्राष्ट्रीय कानून को मज़बूत करने के प्रयासों के लिए दिया गया है। तमिल मूल के परिवार में जन्मीं नवी पिल्लई का करियर उन लोगों के अधिकारों की रक्षा से जुड़ा रहा है जिन्हें भेदभाव, हिंसा और अन्याय का सामना करना पड़ा। रंगभेद के खिलाफ संघर्ष के दौर में नेल्सन मंडेला और दूसरे विरोधियों का बचाव करने से लेकर अंतर्राष्ट्रीय अदालतों में न्यायाधीश की भूमिका निभाने तक उन्होंने कानून और जवाबदेही को अपने काम का अहम हिस्सा बनाया।
नवी पिल्लई का पूरा नाम नवनेथेम पिल्लई है। उनका जन्म 23 सितम्बर, 1941 को दक्षिण अफ्रीका के डरबन शहर के क्लेयरवुड इलाके में हुआ था। वह भारतीय मूल के तमिल परिवार से ताल्लुक रखती हैं, लेकिन उनकी राष्ट्रीयता दक्षिण अफ्रीकी है यानी उनकी पारिवारिक जड़ें भारत से जुड़ी हैं जबकि उनका जन्म, पढ़ाई और करियर दक्षिण अफ्रीका में आगे बढ़ा। नवी पिल्लई ऐसे दौर में बड़ी हुईं जब दक्षिण अफ्रीका में रंगभेद की नीति लागू थी। इस व्यवस्था में नस्ल के आधार पर लोगों के अधिकार और अवसर तय होते थे। अश्वेत लोगों और दूसरे गैर-श्वेत समुदायों को भेदभाव का सामना करना पड़ता था। इसी सामाजिक माहौल ने उनके पेशेवर जीवन की दिशा को प्रभावित किया। उन्होंने कानून को सिर्फ अदालत में मुकद्दमे लड़ने का ज़रिया नहीं माना, बल्कि इसे भेदभाव के खिलाफ आवाज उठाने और लोगों के अधिकारों की रक्षा करने का माध्यम बनाया।
जानकारी के अनुसार नवी पिल्लई ने दक्षिण अफ्रीका की यूनिवर्सिटी ऑफ नेटाल से पढ़ाई की। उन्होंने 1963 में कला विषय में स्नातक और 1965 में कानून की डिग्री एलएलबी हासिल की। इसके बाद उन्होंने अमरीका की हार्वर्ड यूनिवर्सिटी से कानून में मास्टर्स की डिग्री ली और 1988 में न्यायिक विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की। कानून की पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने दक्षिण अफ्रीका में वकालत शुरू की। साल 1967 में वह नेटाल प्रांत में अपनी खुद की कानूनी प्रैक्टिस शुरू करने वाली पहली महिला बनीं। उस समय वहां नस्ल और लिंग के आधार पर भेदभाव की चुनौतियां मौजूद थीं। ऐसे माहौल में वकालत शुरू करना उनके करियर का एक अहम पड़ाव था।
नवी पिल्लई के करियर की सबसे अहम बातों में रंगभेद का विरोध करने वाले लोगों के अधिकारों के लिए काम करना शामिल है। उन्होंने उन कार्यकर्ताओं का बचाव किया जो दक्षिण अफ्रीका की रंगभेद व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठा रहे थे। उनके काम में राजनीतिक बंदियों के अधिकार, हिरासत में यातना के मामलों और निष्पक्ष कानूनी प्रक्रिया जैसे मुद्दे शामिल रहे। नोबेल समिति ने भी उनके शुरुआती कानूनी काम और नेल्सन मंडेला समेत रंगभेद का विरोध करने वाले लोगों के बचाव को उनके लम्बे करियर की एक अहम कड़ी बताया। समिति के अनुसार उनके काम में एक समान बात दिखाई देती है—कानून के शासन को मज़बूत करना और यह सुनिश्चित करना कि ताकतवर लोगों तथा संस्थाओं को भी अपने कामों के लिए जवाबदेह ठहराया जा सके। उन्होंने महिलाओं के अधिकारों के क्षेत्र में भी योगदान दिया और अंतर्राष्ट्रीय महिला अधिकार संगठन इक्वैलिटी नाउ की सह-स्थापना की।
नवी पिल्लई ने वकालत के बाद न्यायपालिका में भी अहम स्थान हासिल किया। साल 1995 में उन्हें दक्षिण अफ्रीका के हाईकोर्ट में कार्यवाहक न्यायाधीश नियुक्त किया गया। वह इस अदालत में न्यायाधीश बनने वाली पहली अश्वेत महिला थीं। बताया जाता है यह नियुक्ति रंगभेद व्यवस्था के अंत के बाद देश में बदलते सामाजिक और संस्थागत माहौल का एक महत्वपूर्ण पड़ाव थी। उनका करियर यहीं तक सीमित नहीं रहा। आगे चलकर उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर ऐसे मामलों में काम किया, जिनका संबंध युद्ध अपराधों, मानवता के खिलाफ अपराधों और नरसंहार जैसे गंभीर मुद्दों से था। नवी पिल्लई को 1995 में रवांडा के लिए गठित अंतर्राष्ट्रीय आपराधिक न्यायाधिकरण में न्यायाधीश नियुक्त किया गया। नॉर्वेजियन नोबेल समिति ने 9 अक्तूबर, 2026 को नवी पिल्लई को नोबेल शांति पुरस्कार देने की घोषणा की। नवी पिल्लई को यह पुरस्कार मिलना भारत के लिए गर्व और गौरव की बात है। (एजेंसी)

