उठे गम्भीर विवादों का समाधान ज़रूरी
विगत कुछ दिनों से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के त्याग-पत्र को लेकर विपक्षी पार्टियों द्वारा व्यापक स्तर पर लामबंदी की जा रही है। चुनाव आयोग द्वारा जब से मतदाता सूचियों में सुधार की बात की गई है और इस दिशा में देश भर में सूचियों के गहन पुनरीक्षण करने का कार्य आरम्भ हुआ है, उसी समय से ही इस संबंध में व्यापक चर्चा और कड़ी आलोचना भी होती रही है। चुनाव आयोग ने मतदाताओं की जांच करने के लिए कुछ इस तरह के तरीके अपनाए जो बेहद जटिल थे और मतदाता के लिए इस परीक्षा से निकलना बहुत मुश्किल था। ज़रूरत तो इस बात की थी कि लम्बी अवधि के बाद मतदाताओं की पहचान के लिए पारदर्शी ढंग से ऐसे ढंग-तरीके अपनाए जाते जो ठीक और सही मतदाता के लिए मुश्किल पैदा करने वाले न होते। इनका लक्ष्य सही मतों की जांच करने के साथ-साथ दो बार बने वोट, मृत मतदाताओं के इस सूची से नाम काटने, जो विदेशों में चले गए और जिनका पता लगा पाना मुश्किल था, आदि की पहचान करके उनके नाम भी काटने और अन्य देशों से सीमा पार करके आए व्यक्तियों की पहचान की जानी भी ज़रूरी थी। ऐसे आंकड़े लगातार सामने भी आते रहे हैं परन्तु लगभग 13 करोड़ मतदाताओं के नाम काटे जाने से इस विवाद के अधिक बढ़ जाने से लोगों के भीतर इस प्रक्रिया के प्रति रोष भी पैदा हुआ। इस पूरे समय में यह प्रचार भी किया जाता रहा कि चुनाव आयोग अपने तरीके से मोदी सरकार की सहायता कर रहा है। इस समय में हुए चुनाव विशेष रूप से पश्चिम बंगाल और बिहार में भाजपा को मिले भारी बहुमत के बाद उठा यह विवाद और भी तूल पकड़ गया, जिसने चुनाव आयोग के साथ-साथ सरकार को संदेह के दायरे में खड़ा कर दिया। इससे पहले भी इलैक्ट्रॉनिक मशीनों को लेकर आशंकाएं प्रकट की जाती रहीं जो अभी भी जारी हैं, परन्तु इन्हें प्रभावशाली ढंग से प्रमाणित नहीं किया जा सका। चाहे स्थानीय स्तर पर शिकायतें ज़रूर मिलती रही हैं।
कांग्रेस नेता राहुल गांधी की टीमों ने भी इसकी विस्तारपूर्वक रिपोर्टें लोक-मंच पर पेश की हैं परन्तु न ही उन्होंने इसके लिए चुनाव आयोग से सम्पर्क किया और न ही इसके लिए अदालत का द्वार खटखटाया। राहुल गांधी द्वारा पिछले वर्षों में शुरू किए गए इस मुद्दे को क्रियात्मक रूप में पुख्ता सबूत सहित पेश नहीं किया जा सका। न ही आज तक इलैक्ट्रॉनिक मशीनों में हुई गड़बड़ी की छिटपुट घटनाओं के बिना व्यापक स्तर पर कोई पुख्ता सबूत ही सामने आ सके हैं। राहुल गांधी द्वारा ‘वोट चोरी’ के अपनाए गए मुद्दे का उनकी अपनी पार्टी कांग्रेस ने भी प्रत्येक स्तर पर प्रचार किया और अन्य विपक्षी पार्टियों ने भी समय-समय पर राहुल की ओर से चलाए इस अभियान के लिए समर्थन दिया, परन्तु इसके कोई क्रियात्मक परिणाम नहीं निकाले जा सके। विगत दिवस पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, पुडुचेरी की 5 विधानसभा और असम की एक लोकसभा सीट के लिए हुए उप-चुनावों में एक बार फिर भाजपा और उसकी सहयोगी पार्टियों को बड़ी जीत प्राप्त हुई। राहुल गांधी के पास इसका जवाब ‘वोट चोरी’ कहने के अलावा और कोई नहीं है। विगत दिवस राष्ट्रपति से कांग्रेस सहित अन्य विपक्षी पार्टियों के नेताओं ने मिलकर ज्ञानेश कुमार के त्याग-पत्र के साथ-साथ ‘वोट चोरी’ के बारे में भी ज्ञापन सौंपा जिसके संबंध में राष्ट्रपति ने उनसे पुख्ता सबूतों की मांग की है। यह पुख्ता सबूत राष्ट्रपति को कब दिए जाएंगे,यह देखने वाली बात होगी।
मुख्य चुनाव आयुक्त के त्याग-पत्र के मुद्दे को लेकर ही कॉकरोच जनता पार्टी ने दिल्ली के जंतर-मंतर में जो प्रदर्शन करने की घोषणा की थी, उसे सरकार ने कड़े सुरक्षा प्रबंध करके सफल नहीं होने दिया। हम समझते हैं कि यदि यह मामला इस सीमा तक पहुंच चुका है तो देश के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा इसे अपने हाथ में लेकर पारदर्शी ढंग से इसका कोई हल निकालना चाहिए ताकि लोगों का लोकतंत्र की भावना में विश्वास पक्का हो सके। सर्वोच्च न्यायालय ही कोई आयोग की स्थापना या अन्य तरीका अपनाकर इसका समाधान कर सकता है जो समय की ज़रूरत भी है और उठे ऐसे विवादों को कम करने में भी सहायक हो सकता है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

