चेतना को जागृत करने का पर्व है नवरात्र

नवरात्र साल में दो बार नवरात्र-महोत्सव मनाया जाता है। एक है वसंतकालीन नवरात्र महोत्सव जो कि चैत्र में होता है और दूसरा है शरद्कालीन नवरात्र जो आश्विन में पड़़ता है। दोनों ही नवरात्र शुक्ल पक्ष में मनाते हैं, जो कि प्रकाश का प्रतीक है। अंधकार से प्रकाश की ओर, मृत्यु से अमरत्व की ओर और अज्ञानता से ज्ञान की ओर अग्रसर होने का संदेश देता है नवरात्र पर्व, लेकिन हम इस तथ्य को नज़र अंदाज करके मात्र दिखावा व आडंबर को अपनाते हैं और भयंकर शोर-शराबा करके यह पर्व नौ दिनों तक मनाते तो हैं लेकिन तथ्य को नहीं आत्मसात कर पाते हैं।
दोनों नवरात्र की एक खासियत है और वह यह कि ऋतु परिवर्तन होता है छ: मास के दरमियान। चैत्र के नवरात्र में जहां गर्मी प्रारंभ होती है, वसंत ऋतु में प्रकृत्ति बुने ऊनी वस्त्रों को उतारकर नये वस्त्र धारणकर अपना श्रृंगार करती है। वहीं दूसरी ओर शरद् ऋतु का आगाज होता है, फसलों की कटाई होती है और दशहरा, दीपावली पर्वो को मनाने का उल्लास जागृति हो उठता है। मतलब एक तरह का बदलाव प्रारंभ होता है इन नवरात्रों के दरमियान। इस बदलाव का प्रभाव मनुष्य के तन-मन पर भी पड़ता है। वसंत ऋतु में जहां तरो-ताजगी महसूस करते हैं, वहीं शरद ऋतु में आनन्दोत्सव मनाते हैं कई प्रकार के पर्वो के नाम से, जैसे शरदपूर्णिमा, दशहरा, दिवाली, फसलों की कटाई वगैरह। 
‘‘जो देवी सभी प्राणियों में चेतना के रूप में निवास करती है, उसे हम नमन करते हैं।’’ परंतु क्या इस चेतना स्वरूप देवी का हमें अनुभव है? सिर्फ कहने मात्र से तो काम नहीं चलेगा न। हम वास्तव में इस अंतर्निहित चेतना को आत्मसात करने के लिए प्रयास करें, जिससे कि हम अनजान हैं।
जिस प्रकार शक्ति अधिष्ठात्री मां देवी ने प्रगट होकर राक्षसों का संहार किया उसी प्रकार हमारे अंदर की चेतना जागृति होने पर, उससे जुड़़ जाने पर हमारे अंदर के जितने भी विकार हैं, दुष्प्रवृत्तियां हैं उनका संहार हो जाता है। और नवरात्र का पर्व यही संदेश देता है कि अपने अंदर की चेतना को जागृति करके यह जीवन सार्थक बनाया जा सकता है। 
‘‘जो देवी प्रकाशरुप में सबके हृदय में स्थित है उसको हम नमन करते हैं।’’ अतएव उस प्रकाश स्वरूप का दर्शन करना अहम बात है। तो दो बातें हुईं, एक तो चेतना स्वरूप की और दूसरी प्रकाश स्वरुप की और यह अति आवश्यक है कि हम देवी के इन रुपों का साक्षात् दर्शन करें, अनुभव करें तभी तो सच्ची पूजा-आराधना होगी। सदैव हम प्रार्थना करते हैं कि ‘‘हे मां हमें सुख-सम्पत्ति का वैभव दो और आनंद से भरपूर हो हमारा जीवन।’’ परंतु इसके लिए हमें प्रयास भी तो करना चाहिए। सिर्फ प्रार्थना करने से बात नहीं बनेगी, बल्कि देवी के साक्षात् स्वरुप का जो कि अविनाशी है, सदा मंगलकारी और आनंददायक है अनुभव करना चाहिए। अज्ञानता रुपी दानव का संहार करके ज्ञानरुपी प्रकाश में जीवन आनंद से परिपूर्ण हो जाता है। असत्य से सत्य की ओर, अंधकार से प्रकाश की ओर तथा मृत्यु से अमृत्व की ओर कूच करने का संदेश है नवरात्र महोत्सव और यह तभी संभव है जब हम अपने अंदर की चेतना जागृति कर लें। चैतन्य-प्रकाश स्वरुप देवी का दर्शन हृदय के मंदिर में प्रवेश करके करना चाहिए और यह कठिन नहीं है बशर्ते हम चाहते हों तो। एक जिज्ञासा होनी चाहिए अधिष्ठात्रा मां देवी का दर्शन करने की। (सुमन सागर)

#चेतना को जागृत करने का पर्व है नवरात्र