जंगली जामुन एक बार लगाओ, जीवन भर कमाओ
किसानों के लिए ऐसा कौन सा पेड़ है, जिसे आज लगाएं और आने वाली पीढ़ियां भी उससे कमाई करती रहें? जंगली जामुन इस सवाल का दिलचस्प जवाब हो सकता है। गांवों-कस्बों में खासकर सड़कों के किनारे और खेतों की मेड़ों पर बिना किसी खास देखभाल के उग आने वाला यह पेड़ सिर्फ गर्मियों की यादों से जुड़ा फलभर नहीं है बल्कि लंबे समय तक चलने वाली यह कृषि संपत्ति भी बन सकता है। एक बार अच्छी जगह पर सही देखभाल के साथ लगाये जाने पर जामुन का पेड़ वर्षों तक फल देता है और इसके फल की मांग आजकल खूब है। बदली हुई लाइफस्टाइल के कारण देश में बड़ी संख्या में लोग डायबिटीज से पीड़ित हैं और जामुन के फल, रस, गुठलियां तक शुगर के मरीजों के लिए बहुत फायदेमंद हैं। इसलिए इन दिनों जामुन के फलों से लेकर इसकी गुठलियों तक की खूब मांग है। इसके अलावा इसके जूस, स्क्वैश, जैम, जैली, सिरका और पल्प जैसे उत्पाद भी खूब बिकते हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि जामुन का पेड़ एक बार तैयार हो जाए, तो वह कई-कई पीढ़ियों तक फलता-फूलता रहता है बशर्ते उसकी सही से देखभाल होती रहे। लेकिन जंगली जामुन की कुछ और जानकारियों के लिए हम आगे बढ़ें, उससे पहले यह कन्फ्यूजन दूर कर लीजिए कि जंगली जामुन का आशय, किसी अलग जामुन से नहीं है। दरअसल यह वही जामुन है, जिसका हम सब सेवन करते हैं। लेकिन इसके नाम में जंगली शब्द इसलिए जोड़ दिया गया है कि पहले इसके पेड़ को किसानों द्वारा व्यवस्थित रूप से लगाया नहीं जाता था बल्कि यह यूं ही गांवों और जंगलों में उग आता था। इसलिए स्थानीय स्तर पर लोग इसे जंगली जामुन कहना शुरु कर दिया। लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब इसके बकायदा व्यवसायिक बाग लगाये जा रहे हैं और इससे अच्छी-खासी आर्थिक कमाई भी की जा रही है। ऐसे में यह भी जान लेना ज़रूरी है कि जब किसान इसे अपनी आर्थिक आमदनी बढ़ाने के मकसद से लगाएं, तो जंगल में यूं ही उग आये पौधों को न लगाएं बल्कि व्यावसायिक रूप से प्रमाणित उन्नत किस्म के जामुन का पेड़, किसी नर्सरी से लेकर लगाएं।
जहां तक जामुन के पेड़ की वानस्पतिक प्रोफाइल का सवाल है तो इसका वैज्ञानिक नाम- ‘सिज़ीगियम क्यूमिनी’ है। यह मर्टेसी परिवार से संबंधित है और भारत में इसे जामुन, जंबू, जंबिल या राजमन जैसे कई नामों से जाना जाता है। इसका मूल क्षेत्र भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया है। जहां तक इसके अंग्रेजी नाम का सवाल है तो इसे इंडियन ब्लैक बेरी और ब्लैक प्लम के नाम से भी जाना जाता है। भारत में यह देशज और प्राकृतिक रूप से पाया जाने वाला पेड़ है, लेकिन अब इसे आर्थिक फायदे के लिए वैज्ञानिक तरीके से लगाया जा रहा है। जहां तक इसकी प्रकृति का सवाल है तो यह सदाबहार या अर्धसदाबहार पेड़ है। इसकी सामान्यत: ऊंचाई 10 से 30 मीटर तक हो सकती है। यह इसको मिली परिस्थितियों पर निर्भर करती हैं। इसका तना मजबूत, धूसर और भूरे रंग की छाल वाला होता है। इसकी पत्तियां मोटी, चमकदार और गहरे रंग की होती हैं। जहां तक इसके फूलों की बात है तो ये छोटे, हल्के सफेद या कई बार पीले होते हैं। सामान्यत: इसका फल अंडाकार होता है, पकने पर यह बैंगनी और गहरा काला दिखता है। इसके फल का स्वाद मीठा, हल्का कसैला और खट्टापन लिए होता है। जहां तक इसके बीज की बात है तो हर फल में इसका एक बड़ा बीज होता है। इसके फलने और पकने का समय शुरुआती गर्मियों से लेकर वर्षा ऋतु तक जाता है। अलग-अलग इलाकों की जलवायु के मुताबिक इसके फल का चक्र आता है। जहां तक जलवायु की बात है तो यह उष्णकटिबंधीय से उपोष्णकटिबंधीय जलवायु में आराम से फलता-फूलता है। इसकी विशेषता यह है कि यह काफी हद तक गर्मी सह लेता है और जहां तक इसके प्रसार का सवाल है तो बहुत से जानवरों द्वारा इसके फल को खाने के बाद उनके मल से निकले बीजों के जरिये और पक्षियों द्वारा इसके फल को एक जगह से दूसरी जगह ले जाने पर भी होता है।
इसकी लकड़ी के भी कई किस्म के उपयोग हैं, यह छाया देती है, इसकी लकड़ी से घरेलू फर्नीचर बनता है, साथ ही और बहुत किस्म के उपयोग हैं। जहां तक किसानों द्वारा इसे आर्थिक फायदा लेने की बात है तो इसके जरिये कई तरह से कमाई होती है। चूंकि आजकल स्वास्थ्य के प्रति सचेत लोग इसे खूब खाना पसंद करते हैं, इसलिए यह बाजारों में खूब बिकती है। ताजा जामुन बेचने के अलावा इसका जूस, शर्बत, जैली और सिरका जैसे उत्पाद भी बनाकर थोक या फुटकर में बेचा जा सकता है। कृषि-वनीकरण में भी इस पेड़ का खूब महत्व है। क्योंकि खेतों की मेड़ों, चारागाह या उपयुक्त खाली जगह में इसे कृषि-वनीकरण के रूप में शामिल किया जा सकता है। दरअसल जंगली जामुन एक प्राकृतिक संपदा है। लेकिन जब हम चयनित और गुणवत्तापूर्ण जामुन के पेड़ को अपने व्यावसायिक मकसद से लगाते हैं, तो यह कृषि संपत्ति बन जाती है। जहां तक इससे होने वाली कमाई का सवाल है तो आईसीएआर द्वारा विकसित गोमा प्रियंका किस्म के जरिये एक पेड़ से 50 से 70 किलो तक की उपज हासिल होती है। जामुन के पेड़ से प्रतिहेक्टेयर 2.5 से 3.5 लाख रुपये तक की आय आराम से हासिल की जा सकती है। लेकिन याद रखिये इसकी वास्तविक कमाई, इसकी उपज, कीमत, लागत, बाजार पर निर्भर करती है। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



