कहानी-छूट
जितनी छूट हमने इसे दे रखी है, क्या कोई देता होगा अपनी बहू को? जो चाहो पहनो, जो चाहो खाओ, जहां चाहो जाओ... और क्या चाहिए किसी को? इसके बाद भी जब देखो तब इनके मुंह फूले ही रहते हैं। कोई बाहर का आकर देखे तो उसे लगेगा कि पता नहीं कितने अत्याचार हो रहे हैं बेचारी पर...’ माया ने अपनी छह माह की नवेली बहू मिनी को सुनाते हुई बेटे नवल से कहा, नवल ने अपनी ममतामयी मां की तरफ गर्व से देखा फिर मिनी की तरफ मुड़ गया।
‘क्या परेशानी है तुम्हें यहां? इतनी छूट किसी को मिले तो वो इनके पांव धो-धोकर पीए। तुम्हें तो कोई अहसान ही नहीं है। तुम आखिर चाहती क्या हो?’ नवल नहीं चाहते हुए भी तल्ख हो गया। मिनी ने कुछ नहीं कहा, कहती भी क्या? कैसे समझाती उसे कि छूट की उनकी परिभाषा उसकी परिभाषा से कितनी अलग है। केवल आंखों में आए पानी को छिपाते हुए कमरे में चली गई। गीली आंखें कोई देख लेता तो एक और बवंडर उठ खड़ा होता।
कितनी आज़ाद थी वह अपने मायके में। सहेलियों के साथ घूमना-फिरना और मस्ती करना... हर नई लगी फिल्म को पहली फुर्सत में देखने जाना... रविवार तो जैसे मटरगश्ती के लिए तय ही था। उसकी एक सहेली फ्लैट लेकर पढ़ाई कर रही थी। वहीं जमता था उनका अड्डा। दोस्त लोग उस फ्लैट को ‘उठाईगीरों का अड्डा’ कहा करते थे। याद आते ही मिनी मुस्कुराने लगी। मिनी को इस बात से इनकार नहीं है कि भौतिक रूप से उसे शादी के बाद भी बहुत छूट मिली है लेकिन फिर भी पता नहीं क्यों, इतनी छूट मिलने के बाद भी मिनी को यहां घुटन होती है। लगता तो यही है कि सब उसे बहुत प्यार करते हैं लेकिन उसे यह प्यार महसूस क्यों नहीं होता। जबकि मां तो उसे कितनी ही बार डपट भी दिया करती थी, उसके बावजूद उसे कभी भी ऐसा नहीं लगा कि मां उससे प्यार नहीं करती। मां की तरह सासू मां के गले में बांहें डालकर झूलने में उसे संकोच क्यों होता है? क्यों सामाजिक और खून के रिश्तों के बीच संकोच का यह पुल वह लांघ नहीं पा रही है?
अभी कल शाम की ही तो बात है। एक ठेले पर गहरे पीले रंग के बड़े-बड़े लंबे पपीते रखे थे। देखते ही मिनी के मुंह में पानी भर आया। उसने नवल से पपीता लेने को कहा-
‘फल-सब्जियां मां ही लेकर आती हैं। मुझे अधिक कुछ समझ नहीं है।’ कहकर नवल ने टाल दिया। घर जाकर नवल ने मां से पपीता लाने को कहा। माया ने फ्रिज में से पाइनएप्पल निकालकर मिनी को थमा दिया और कहा- ‘काटकर सबको सर्व कर दो।’ मिनी ने पहले पाइनएप्पल और फिर नवल की तरफ देखा।
‘अरे वाह! बड़े मजे हैं तुम्हारे तो। पपीता मांगों तो पाइनएप्पल मिलता है।’ कहते हुए नवल ने गर्व से मां की तरफ देखा। मिनी क्या करती। कैसे नवल को बताती कि उसका मनपसंद फल पपीता है, पाइनएप्पल नहीं। उसने चुपचाप पाइनएप्पल छीला और प्लेट सबके बीच में रख दी।
‘तुम भी खाओ ना!’ नवल ने प्लेट उसकी तरफ बढ़ाते हुए कहा।
‘नहीं, पाइनएप्पल से मेरे दांत खट्टे हो जाते हैं।’ मिनी ने खीज के साथ कहा तो माया ने नवल की तरफ देखकर अपना मुंह टेढ़ा कर लिया।
‘लो! अब हलवा खाने से भी दांत घिसने लगे।’ माया ने कटाक्ष किया। मिनी उठकर अपने कमरे में आ गई। वहां रुकने का हासिल आंख में आंसू आना होता जिन्हें घड़ियाली करार दिया जाना भी तय था।
‘शायद मेरी समझ ही कम है तभी तो मुझे इनका ममतामयी रूप दिखाई नहीं देता या मुझ तक आते-आते इनका ममता वाला श्रोत सूख ही जाता है?’ मिनी लगातार ब्याह के बाद वाले पिछले छह महीनों पर मंथन कर रही थी। माया को लेकर उसे अपने और शेष लोगों के मत में भारी अंतर महसूस हो रहा था। मिनी को अपनी ससुराल की तरफ के रिश्तेदारों से मिलने के लिए भी माया की तारीफों के पुल पर चढ़कर ही जाना होता है। मिलने वाला कोई भी हो, माया के स्वभाव की तारीफ करता नहीं अघाता।
‘मिनी ने ज़रूर पिछले जन्म में मोती दान किए होंगे, तभी तो माया जैसी सास मिली है। वरना कोई करता है भला शाम की चाय साथ पीने के लिए अपनी बहू का इंतजार? माया को देखो, जब तक मिनी ऑफिस से आ नहीं जाती तब तक चाय नहीं पीती चाहे कितनी भी देर क्यों न हो जाए।’ रिश्तेदार बड़े गर्व से कहते हुए मिनी पर अहसान जताते लेकिन सोचने वाली बात है कि यह बात आखिर घर से बाहर निकली तो निकली कैसे होगी? जाहिर है कि माया ने ही किसी को बताया होगा। उसके बाद तो सब जानते ही हैं कि जैसे दीवारों के कान होते हैं वैसे ही बातों के भी पंख होते हैं। पलक झपकते ही वे एक घर से दूसरे घर की मेहमान हो जाती हैं।
ऐसा सुनती तो मिनी मन ही मन अपनी मां को याद करती। वे भी शाम की चाय के लिए मिनी का इंतजार करती थी। फर्क बस इतना था कि मां उसके लिए चाय बनाकर उसका इंतजार करती थी और सासू माँ चाय बनने का। बस, छूट का इतना सा अंतर किसी को दिखाई नहीं देता।
ऐसी बहुत सी वजह थी जो मिनी की छूट की परिभाषा को माया की परिभाषा से अलग करती थी। शुरू-शुरू में मिनी ने सबको अपनी परिभाषा समझाने की कोशिश भी की थी लेकिन पके हुए मटकों को वापस गीली मिट्टी में नहीं बदला जा सकता। हर कोई माया को उसी चश्मे से देखने का आदी था जो माया ने उन्हें पहना रखा था। अब रातोंरात तो उस चश्मे के लेंस बदले नहीं जा सकते ना! मिनी ने भी अब प्रयास करने छोड़ दिए थे। वैसे भी सबको बदलने में अपनी ऊर्जा लगाने से बेहतर है कि उससे कहीं कम ऊर्जा अपने आप को बदलने में लगाई जाये। मिनी अब इसी सिद्धांत पर चलने लगी थी।
मिनी अब किसी से बहस नहीं करती। ना अपनी पसंद-नापसंद जाहिर करती है और ना ही अपनी कोई इच्छा। मिनी ने अंगीकार कर लिया कि जो हो रहा है वह अच्छा है और जो नहीं हो रहा है वह उससे भी अच्छा... वैसे भी मां अक्सर कहा करती थी कि ‘जो प्राप्त है, वह पर्याप्त है’ यदि इस मार्ग पर चलोगी तो मानसिक शांति बनी रहेगी अन्यथा मन में हमेशा भटकन ही रहेगी। बात तो उनकी सौ टका खरी थी लेकिन मन के द्वन्द भला आसानी से नजरअंदाज किये जा सकते हैं क्या? मिनी ने भले ही अपनी नियति स्वीकार कर ली हो लेकिन मन में अभी भी एक छटपटाहट बनी ही रहती है। मिनी को लगता है कि मन को मारकर वह मशीन बन गई है। उसका पूरा दिन इसी तरह से बीतता जैसे किसी इलेक्ट्रॉनिक मशीन में प्रोग्राम सेट कर दिया हो।
सुबह उठते ही सबको चाय देना। उसी समय सुबह के नाश्ते और दोपहर के खाने का पूछ लेना। बिना किसी वाद-प्रतिवाद के सबकुछ बनाकर रख देना और अपना टिफिन लेकर ऑफिस निकल जाना। शाम को आकर सबके लिए चाय बनाना और उसी समय रात के खाने का मेनू पूछ लेना। बिना इफ और बट के खाना बनाना, खाना और अपने कमरे में चले जाना। इसके बाद उसमें इतनी ऊर्जा नहीं बचती थी कि वह परिवार के साथ परिचर्चा-संवाद में भाग ले। वैसे भी जब उसके मत को कोई महत्व ही नहीं दिया जाता तो वह नाहक क्यों अपनी ऊर्जा व्यर्थ करे। (क्रमश:)



