भारतीय सिनेमा ने खोया अपना बेबाक ‘नाना’

भारतीय सिनेमा ने ऐसे कलाकार कम देखे हैं, जिनकी पहचान किसी एक किरदार, किसी एक संवाद या किसी एक दौर से नहीं बनी बल्कि जिनकी पूरी शख्सियत ही अभिनय की एक अलग पाठशाला बन गई। नाना पाटेकर उन्हीं विरल कलाकारों में थे। बुलंद आवाज, चेहरे पर भावों का असाधारण उतार-चढ़ाव, संवाद बोलने का अपना अनूठा अंदाज और अभिनय में ऐसी तीव्रता कि दर्शक किरदार और अभिनेता के बीच का फर्क भूल जाए। नाना पाटेकर का यही जादू उन्हें भीड़ से अलग करता रहा। 
8 अक्तूबर की सुबह गोवा के डोना पाउला स्थित अपने आवास पर कार्डियक अरेस्ट के बाद 75 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। विडंबना देखिए कि जीवन और मृत्यु पर सहजता से बात करने वाले नाना ने निधन से महज चार दिन पहले 4 अक्तूबर को गोवा के डोना पाउला में आयोजित एक कार्यक्रम में कहा था कि हर किसी को एक दिन जाना है, मुझे नहीं पता कि मैं कल यहां रहूंगा या नहीं। उस समय यह जीवन की क्षणभंगुरता पर उनका सामान्य-सा दार्शनिक विचार था लेकिन उनके निधन के बाद वही शब्द असाधारण रूप से मार्मिक हो उठे हैं।
महाराष्ट्र के रायगढ़ ज़िले के मुरुड-जंजीरा में 1 जनवरी 1951 को विश्वनाथ गजानन पाटेकर के रूप में जन्मे नाना का बचपन किसी फिल्मी चमक-दमक में नहीं बल्कि संघर्ष की कठोर जमीन पर बीता। परिवार का छोटा व्यवसाय आर्थिक धोखे के कारण तबाह हो गया। किशोरावस्था में ही उन्हें परिवार की मदद के लिए काम करना पड़ा। स्कूल के बाद फिल्म पोस्टर पेंट करना और फिर कई किलोमीटर पैदल घर लौटना उनकी दिनचर्या का हिस्सा था। अभाव इतना गहरा था कि कई बार भोजन जुटाना भी कठिन हो जाता था। यही संघर्ष आगे चलकर उनके अभिनय की सबसे बड़ी पूंजी बना। उन्होंने ज़िंदगी को बाहर से नहीं, भीतर से देखा था। नाना के व्यक्तित्व में बचपन से ही विद्रोह और संवेदनशीलता साथ-साथ मौजूद थे। रंगमंच ने उन्हें अभिव्यक्ति का रास्ता दिया। मराठी थिएटर से शुरू हुई उनकी अभिनय-यात्रा ने धीरे-धीरे हिंदी सिनेमा का रुख किया और 1978 की ‘गमन’ से बड़े पर्दे पर उनका सफर शुरू हुआ। शुरुआती वर्षों में छोटी और सहायक भूमिकाओं के बाद ‘अंकुश’, ‘प्रतिघात’ और ‘सलाम बॉम्बे!’ जैसी फिल्मों ने उनकी प्रतिभा को पहचान दिलाई लेकिन 1989 की ‘परिंदॉ’ ने नाना पाटेकर को भारतीय सिनेमा के सबसे प्रभावशाली अभिनेताओं की अग्रिम पंक्ति में ला खड़ा किया।
‘परिंदा’ का अन्ना केवल एक खलनायक नहीं था, वह हिंदी फिल्मों के पारंपरिक विलेन की परिभाषा को बदल देने वाला किरदार था। नाना ने उसमें क्रूरता, बेचैनी, असुरक्षा और हिंसा को इस तरह पिरोया कि अन्ना भारतीय सिनेमा के यादगार चरित्रों में शामिल हो गया। इस भूमिका के लिए उन्हें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और फिल्मफेयर पुरस्कार दोनों मिले। इसके बाद ‘क्रांतिवीर’ में उनका शिवाजी राव वागले वाला किरदार आया, एक ऐसा चरित्र, जिसमें आक्रोश, देशभक्ति और व्यवस्था के प्रति असंतोष एक साथ दिखाई दिया। इस भूमिका के लिए उन्हें सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला। ‘अग्निसाक्षी’ में जुनूनी पति की भूमिका ने फिर उन्हें राष्ट्रीय सम्मान दिलाया। इस तरह नाना पाटेकर तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों के विजेता बने।
 ‘परिंदा’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता, ‘क्रांतिवीर’ के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता व ‘अग्निसाक्षी’ के लिए सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता। फिल्मफेयर के स्तर पर भी उनकी उपलब्धियां कम असाधारण नहीं रही। ‘परिंदा’, ‘अंगार’, ‘क्रांतिवीर’ और ‘अपहरण’ के लिए उन्हें चार फिल्मफेयर पुरस्कार मिले। विशेष बात यह रही कि उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता, सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता और नकारात्मक भूमिका, तीनों श्रेणियों में फिल्मफेयर सम्मान हासिल किया, जो उनकी अभिनय-विविधता का प्रमाण है।
नाना को केवल गंभीर भूमिकाओं का अभिनेता समझना भी उनके साथ न्याय नहीं होगा। 2007 की ‘वेलकम’ में उदय शेट्टी के रूप में उन्होंने जिस तरह कॉमेडी को अपने अंदाज में साधा, वह उनके अभिनय के दूसरे छोर का परिचय था। संवादों की टाइमिंग, चेहरे के हावभाव व अनिल कपूर के मजनू भाई के साथ उनकी केमिस्ट्री ने उदय-मजनू की जोड़ी को लोकप्रिय बना दिया। ‘वेलकम बैक’ में भी उन्होंने यही किरदार निभाया। ‘अब तक छप्पन’, ‘अपहरण’, ‘राजनीति’, ‘खामोशी- द म्यूजिकल’, ‘तिरंगा’ और मराठी की ‘नटसम्राट’ जैसी फिल्मों में उन्होंने साबित किया कि अभिनेता के लिए शैली नहीं, चरित्र महत्वपूर्ण होता है। नाना केवल अभिनेता नहीं थे, उन्होंने निर्देशन और लेखन में भी हाथ आजमाया। ‘प्रहार-द फाइनल अटैक’ उनके निर्देशन की महत्वपूर्ण फिल्म थी। सेना के प्रति उनका आकर्षण भी जगजाहिर था। ‘प्रहार’ के लिए उन्होंने कठोर सैन्य प्रशिक्षण लिया और भारतीय सेना के साथ उनका गहरा जुड़ाव बना। यही कारण था कि उनके व्यक्तित्व में अभिनेता की संवेदनशीलता के साथ सैनिक जैसी अनुशासनप्रियता और स्पष्टवादिता भी दिखाई देती थी।
उनके जीवन का एक और पक्ष कैमरे से बहुत दूर था, समाज के लिए कुछ करने की बेचैनी। अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ उन्होंने 2015 में ‘नाम फाउंडेशन’ की शुरुआत की। महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित ग्रामीण क्षेत्रों और किसान परिवारों के लिए काम करने वाली इस संस्था का उद्देश्य केवल आर्थिक सहायता देना नहीं बल्कि पानी, खेती और ग्रामीण जीवन की बुनियादी समस्याओं के स्थायी समाधान तलाशना रहा है। संस्था जलसंकट, जलसंधारण, बंद पड़ी जल परियोजनाओं और किसानों की आजीविका जैसे मुद्दों पर काम करती है। नाना की सामाजिक प्रतिबद्धता का अर्थ केवल मंच से भाषण देना नहीं था, उन्होंने किसान परिवारों, विधवाओं और जरूरतमंदों की मदद की तथा ग्रामीण क्षेत्रों में जल संरक्षण को सामाजिक आंदोलन का रूप देने की कोशिश की। यही वजह है कि उनकी पहचान केवल ‘फिल्म स्टार’ तक सीमित नहीं रही। वह उन कलाकारों में थे, जिनके लिए प्रसिद्धि किसी मंजिल से ज्यादा जिम्मेदारी थी।
2013 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया। राष्ट्रीय पुरस्कारों, फिल्मफेयर सम्मानों और पद्मश्री के बावजूद नाना का सार्वजनिक व्यक्तित्व हमेशा अपेक्षाकृत सादा रहा। वह चकाचौंध से अधिक जमीन से जुड़े जीवन के लिए जाने जाते थे। पुणे के डोंजे स्थित उनका फार्महाउस भी उनके इसी स्वभाव का प्रतीक रहा, जहां वे प्रकृति और खेती के बीच समय बिताते थे। नाना की ज़िंदगी में दर्द भी कम नहीं था। 1993 के मुंबई बम धमाकों में उन्होंने अपने भाई को खोया था। निजी त्रासदियों, आर्थिक संघर्षों और जीवन की कठोर वास्तविकताओं ने शायद उनके अभिनय को वह गहराई दी, जो केवल अभिनय-प्रशिक्षण से हासिल नहीं होती। वह पात्र को निभाते नहीं थे, उसे भीतर उतार लेते थे। इसलिए उनकी आंखों का गुस्सा भी वास्तविक लगता था और उनकी खामोशी भी संवाद बन जाती थी। नाना पाटेकर जैसे कलाकारों में गहराई, अलग पहचान और विशिष्ट उपस्थिति होती है और उनके निभा, किरदार कई पीढ़ियों तक याद किए जाएंगे।
नाना पाटेकर का जाना इसलिए भी एक युग का अवसान है क्योंकि उन्होंने अभिनय को केवल पेशा नहीं माना। वह उस दौर के कलाकार थे, जब संवाद सिर्फ बोले नहीं जाते थे, जिए जाते थे। जब खलनायक का मतलब केवल काली पोशाक और ऊंची आवाज नहीं था। जब अभिनेता की असली पहचान उसके चेहरे से ज्यादा उसकी संवेदना से बनती थी। उन्होंने सौ से अधिक फिल्मों में काम किया और हिंदी तथा मराठी, दोनों सिनेमा संसारों में अपनी अलग छाप छोड़ी। उनकी सबसे बड़ी विरासत पुरस्कारों की सूची नहीं, वह अभिनय-शैली है, जिसने आने वाली पीढ़ियों को यह सिखाया कि अभिनय का अर्थ केवल कैमरे के सामने संवाद बोलना नहीं बल्कि मनुष्य के भीतर छिपे अनेक चेहरों को पहचानना है। नाना पाटेकर ने 4 अक्तूबर को पूछा था कि क्या हम वह कर पाए, जो हम करना चाहते थे? क्या हमने प्रयास किया? चार दिन बाद उनकी ज़िंदगी का पर्दा गिर गया। मगर इस सवाल का जवाब उनकी अपनी ज़िंदगी देती है कि उन्होंने संघर्ष किया, अभिनय किया, समाज के लिए काम किया और अपनी शर्तों पर जिए। इसलिए नाना पाटेकर की कहानी उन किरदारों, संवादों, संवेदनाओं और सामाजिक कार्यों में आगे भी जीवित रहेगी, जिन्हें उन्होंने अपने पीछे छोड़ा है। पर्दा गिर गया है लेकिन कलाकार अभी भी मंच पर है, अपनी आवाज, अपनी आंखों और अपने अद्वितीय अभिनय के साथ।

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