हार-जीत का फैसला

बहुत समय पहले की बात है। देश के दो महान विद्वान-आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र-आमने-सामने बैठे थे। दोनों के बीच शास्त्रार्थ चल रहा था।
एक दिन नहीं, दो दिन नहीं...देखते-देखते सोलह दिन बीत गए। लेकिन किसी विद्वान ने हार नहीं मानी।
चारों ओर विद्वानों और श्रोताओं की भीड़ लगी थी। सभी बड़ी उत्सुकता से दोनों के तर्क सुन रहे थे।
‘वाह! क्या तर्क है!’
‘अरे, इसका उत्तर तो बहुत कठिन है!’
‘देखना, आज तो फैसला हो ही जाएगा!’
ऐसी फुसफुसाहटों से पूरा वातावरण गूंज रहा था।
इस कठिन शास्त्रार्थ की निर्णायक थीं-मंडन मिश्र की विदुषी धर्मपत्नी देवी भारती। वे दोनों विद्वानों के तर्कों को बड़ी सूक्ष्मता से सुन रही थीं।
तभी देवी भारती को किसी आवश्यक कार्य से थोड़ी देर के लिए बाहर जाना पड़ा। उन्होंने दोनों विद्वानों की ओर देखा और कहा, ‘‘मुझे कुछ समय के लिए बाहर जाना होगा। आप दोनों शास्त्रार्थ जारी रखिए।’’ फिर वे कुछ सोचकर मुस्कुराईं। उन्होंने दो सुंदर फूलों की मालाएं मंगवाईं और एक-एक माला आदि शंकराचार्य तथा मंडन मिश्र के गले में डाल दी।
मंडन मिश्र ने आश्चर्य से पूछा,-‘देवी! इन मालाओं का क्या प्रयोजन है?’
देवी भारती ने कहा, ‘इन मालाओं में ही आज के निर्णय का संकेत छिपा है।’
शंकराचार्य भी मुस्कुराए,‘अच्छा! तो ये मालाएं भी हमारे शास्त्रार्थ की साक्षी रहेंगी?’
देवी भारती ने उत्तर दिया, ‘हां। मेरी अनुपस्थिति में ये मालाएं आपके हार और जीत का फैसला करेंगी।’ इतना कहकर वे वहां से चली गईं।
शास्त्रार्थ फिर शुरू हो गया।
एक प्रश्न सामने आता और उसके साथ ही तर्कों की बौछार शुरू हो जाती।
‘इसका उत्तर क्या है?’ मंडन मिश्र ने पूछा।
शंकराचार्य ने शांत स्वर में उत्तर दिया, ‘इसका उत्तर तर्क से नहीं, प्रमाण से समझिए...’
मंडन मिश्र तुरंत बोले, ‘लेकिन मेरा तर्क यह कहता है कि...’
दोनों विद्वान देर तक अपने-अपने पक्ष में तर्क देते रहे।
कुछ समय बाद देवी भारती वापस लौट आईं।
सभी की निगाहें उनकी ओर उठ गईं।
एक विद्वान ने सोचा, अब देवी भारती दोनों के तर्क सुनेंगी और फिर निर्णय देंगी।
लेकिन देवी भारती ने दोनों विद्वानों को ध्यान से देखा और तुरंत अपना निर्णय सुना दिया- ‘इस शास्त्रार्थ में आदि शंकराचार्य विजयी हुए हैं और मंडन मिश्र पराजित।’
यह सुनते ही वहां सन्नाटा छा गया।
‘क्या?’
‘लेकिन देवी भारती ने तो पूरा शास्त्रार्थ सुना ही नहीं!’
‘फिर उन्होंने फैसला कैसे कर दिया?’
सभी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
तभी एक विद्वान ने हाथ जोड़कर विनम्रता से पूछा, ‘हे देवी! आपकी विद्वत्ता पर किसी को संदेह नहीं, लेकिन एक बात समझ में नहीं आई। आप तो शास्त्रार्थ के बीच में बाहर चली गई थीं। फिर लौटते ही आपने इतना बड़ा निर्णय कैसे सुना दिया?’
देवी भारती मुस्कुराईं-उन्होंने दोनों विद्वानों के गले की मालाओं की ओर संकेत करते हुए कहा, ‘मेरा निर्णय इन मालाओं ने सुनाया है।’
सभी आश्चर्य से मालाओं को देखने लगे।
देवी भारती ने समझाया, ‘जब कोई व्यक्ति शास्त्रार्थ में अपनी हार को सामने देखता है, तो उसके मन में बेचैनी और क्रोध पैदा होने लगता है। क्रोध के कारण शरीर का ताप बढ़ जाता है।’
उन्होंने मंडन मिश्र के गले की माला की ओर देखा।
‘देखिए, मंडन मिश्र के गले की माला मुरझाकर सूखने लगी है। जबकि आदि शंकराचार्य के गले की माला अभी भी पहले की तरह ताजी है।’
सभी की आंखें आश्चर्य से फैल गईं।
देवी भारती ने आगे कहा,
‘इससे मुझे संकेत मिल गया कि शास्त्रार्थ के दौरान मंडन मिश्र पराजय की ओर बढ़ रहे थे, जबकि शंकराचार्य शांत और स्थिर बने रहे। इसलिए मैंने अपना निर्णय सुना दिया।’
कुछ क्षणों तक वहां पूर्ण शांति रही।
फिर अचानक चारों ओर से आवाजें उठीं-
‘अद्भुत!’
‘क्या सूझ-बूझ है!’
‘देवी भारती सचमुच महान विदुषी हैं!’
मंडन मिश्र ने भी अपनी पत्नी के निर्णय को स्वीकार किया और आदि शंकराचार्य को सम्मानपूर्वक विजयी माना। (सुमन सागर)

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