बालिकाओं का सम्मान और सुरक्षा सबकी ज़िम्मेदारी

आज के लिए विशेष

कहने के लिए समानता के इस युग में भी आज भी लड़के  लड़की में भेदभाव किया जाता है जबकि वैश्विक समृद्धि हेतु बालिकाओं का भी कदम से कदम मिलाकर चलना आवश्यक है। अंतर्ष्ट्रीय बालिका दिवस इसी और उठाया गया एक सार्थक कदम है। दुनिया भर में लड़की की महत्ता को प्रतिपादित करता है 11 अक्तूबर जिसे अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस के रूप में मनाया जा रहा है।  वास्तव देखें तो आज भी बालिकाओं की स्थिति  अच्छी नहीं है। गरीब अफ्रीकी, एशियाई व दक्षिण-एशियाई देशों में तो लिंग भेद से बालिकाओं का हाल बेहाल है।
संविधान की दृष्टि में बालक व बालिका बराबर होने की बात ज़रूर दर्ज है लेकिन वास्तव में ऐसा है नहीं और इसकी वजह से बालिकाओं की संख्या लगातार घटती जा रही है जिसके कारण भारत में तो लिंगानुपात असंतुलन खतरनाक स्थिति तक पहुंच गया है । जनगणना आंकड़ों के मुताबिक 1991 में देश में प्रति एक हज़ार बालकों पर 972 बालिकाएं थीं जबकि 2001 की जनगणना में एक हज़ार पुरुषों पर स्त्रियों की संख्या 933 मात्र रही। वहीं 2011 में 861 बालिकाएं प्रति एक हज़ार लड़़कों पर दर्ज की गईं थी और वर्तमान में यह 800 से भी कम आंकी जा रही हैं । 2021 में जनगणना नहीं हो पाई थी बाद में  2026 में जनगणना का कार्य चल रहा है और उसके आंकड़े अभी तक सामने नहीं आए हैं।
आखिर हम बच्चियां क्यों नहीं चाहते? आइए, एक नज़र उन  परिस्थितियों पर डालें जिनकी वजह से हर मां बाप बेटे को बेटियों पर वरीयता देते हैं। गरीबों में बेटी का जन्म इसलिए ज़्यादा डर पैदा करता है क्योंकि उसके शादी-ब्याह बेहद महंगे  हो गए हैं। पढ़े-लिखे रोज़गार में लगे वर व अच्छे घर नहीं मिलते हैं। मिलते भी हैं तो की भारी मांगें जान निकालने की हद तक जा रही हैं। उत्तर व मध्य भारत में खासतौर पर दहेज, छेड़-छाड़ की घटनाएं, शिक्षा व पालन-पोषण पर बढ़ता बेतहशा खर्च, बेटे-बेटी का भेदभाव व समाज की दकियानूसी सोच मुख्य वजह है । 
आज कहने के लिए तो खाने-पीने में लड़की एवं लड़की में कोई भेदभाव नहीं है, लेकिन करने व कहने में  बड़ा फर्क है। लड़कियों की शादी के बाद भी सुरक्षा की गारंटी नहीं रह गई है। दहेज हत्या व प्रताड़ना लगातार बढ़ रही है। कानून तो बहुत हैं, परन्तु बेअसर व अव्यावहारिक हैं। तलाक की दर 34 प्रतिशत तक जा पंहुची है जो भयावह है। पुनर्विवाह में दिक्कतें होती हैं, परम्परागत भारतीय समाज दूसरी शादी करने वाली लड़की को आज  भी अच्छी नज़र से नहीं देखता। बेशक आज लड़की को उस सभ्य समाज से अपने अस्तित्व के लिए लड़ना पड रहा है, जो उसे कभी पूजता है तो कभी दुत्कारता है। 
आज कस्बों व शहरों में ‘बालिका बचाओ’ व ‘महिला सशक्तिकरण’ विषयों  पर चर्चाएं व सेमीनार तो बहुत होते हैं पर यथार्थ में बेटियां आज भी ‘बेचारी’ बनीं हुई हैं। उनके खान-पान से लेकर शिक्षा व कार्य में उनसे भेदभाव हमारे समाज में आम बात है। दुखद तो पहलू यह है कि इस परम्परा के वाहक अशिक्षित व निम्न व मध्यम वर्ग ही नहीं है बल्कि उच्च व शिक्षित समाज भी है। आज डरी हुई लड़कियों को घर में रहने के लिए मज़बूर होना पड़ रहा है। घर से शुरू होने वाले शोषण की वह बाद में इतनी आदी हो जाती हैं कि अपने ऊपर होने वाले अत्याचार को भी चुपचाप सहन लेती। लगातार  घटती बेटियां की संख्या भारी चिंता का सबब होना चहिए परन्तु है नहीं। हालांकि केरल जैसे कुछ राज्यों ने इस घृणित प्रवृत्ति को गंभीरता से लिया और इसे रोकने के लिए अनेक प्रभावकारी कदम उठाए हैं। गुजरात में भी ‘डीकरी बचाओ’ अभियान चला है। हिमाचल प्रदेश जैसे छोटे राज्य में लिंगानुपात में सुधार और कन्या भ्रूण हत्याएं रोकने के लिए प्रदेश सरकार ने एक अनूठी स्कीम तैयार की है। कन्या धन योजना व  गांधी बालिका योजना के अंतर्गत पहली कन्या के जन्म के बाद स्थायी परिवार नियोजन अपनाने वाले माता-पिता को 25 हज़ार रुपये तथा दूसरी कन्या के बाद स्थायी परिवार नियोजन अपनाने माता-पिता को 20 हजार रुपये प्रोत्साहन राशि के रूप में प्रदान किए जा रहे हैं।  बालिका बचाओ, बालिका पढ़ाओ जैसे अभियान को सफल बनाने के लिए सबकी सक्रिय भागीदारी बहुत ज़रूरी है। कन्या भ्रूण हत्या रोकने हेतु सामाजिक जागरूकता बढ़ाने के साथ-साथ हमें बालिकाओं को बेटे से बढ़कर मानना होगा। दहेज जैसी कुरीतियों से बचना होगा। 
आज जब एक तरफ अंतर्राष्ट्रीय बालिका दिवस मनाया जा रहा है तो वहीं भारत में नवरात्रि शुरू हो गए हैं और इन्हें नवरात्रों में भी मुख्य रूप से कन्याओं का ही पूजन किया जाता है। इसलिए लड़कियों के प्रति समाज को अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। आज वक्त की मांग है कि हम बालिकाओं को उनका हक, सम्मान तथा सुरक्षा प्रदान करें, तभी सही अर्थों में बालिका दिवस सार्थक सिद्ध होगा। (एजेंसी)

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