हिमालय को प्रदूषण-मुक्त करना भी हो पहाड़ी यात्रा का उद्देश्य
हिमालय केवल पर्वतों की एक शृंखला नहीं है, वह भारत की सांस्कृतिक चेतना, आध्यात्मिक आस्था और प्राकृतिक जीवन का आधार है। उसकी चोटियों में तप की स्मृतियां हैं, उसकी नदियों में करोड़ों लोगों की जीवनधारा बहती है और उसकी घाटियों में असंख्य धार्मिक स्थल सदियों से श्रद्धालुओं को आकर्षित करते रहे हैं। हिमाचल प्रदेश सहित पूरे हिमालयी क्षेत्र में हिंदू धर्म के अनेक प्रमुख तीर्थ स्थल हैं। इन स्थानों पर पहुंचना श्रद्धालुओं के लिए आस्था का विषय है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में तीर्थ यात्रा और पर्यटन के बीच की सीमा धुंधली होती जा रही है। दर्शन और आध्यात्मिक अनुभूति के साथ मनोरंजन, मौज-मस्ती और उपभोक्तावादी जीवनशैली का प्रवेश पहाड़ों की संवेदनशीलता पर भारी पड़ रहा है। हिमालय की सबसे बड़ी विशेषता ही उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी भी है। यहां का पर्यावरण अत्यंत नाजुक है। ऊंचाई वाले क्षेत्रों में मिट्टी की परत पतली है, वनस्पतियों की पुनरुत्पादन क्षमता सीमित है और कचरे के प्राकृतिक रूप से नष्ट होने की प्रक्रिया मैदानी क्षेत्रों की तुलना में बहुत धीमी है। इसके बावजूद हज़ारों-लाखों लोगों को एक साथ इन क्षेत्रों में पहुंचाया जा रहा है। वाहनों की लम्बी कतारें, पार्किंग का दबाव, होटल और ढाबों का अनियोजित विस्तार, प्लास्टिक की बोतलें, खाद्य पदार्थों के रैपर, पॉलीथिन और डिस्पोजेबल सामग्री पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता और पर्यावरण को लगातार चोट पहुंचा रहे हैं।
चारधाम यात्रा के दौरान इस वर्ष सितम्बर के मध्य तक 800 टन से अधिक कचरा एकत्र होने की सूचना इस संकट की गंभीरता को सामने रखती है। केदारनाथ जैसे अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र में अप्रैल से अगस्त के बीच 50-30 टन कचरा जमा होना विशेष चिंता का विषय है। यह तथ्य इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ऊंचाई वाले क्षेत्रों में फेंकी गई एक प्लास्टिक बोतल केवल एक बोतल नहीं रहती, वह लंबे समय तक पर्यावरण में मौजूद रह कर मिट्टी, जल स्रोतों और वन्यजीवन के लिए खतरा बन सकती है। विडम्बना देखिए, जिस स्थान पर मनुष्य आत्म-शुद्धि, संयम और त्याग की भावना लेकर जाता है, वहीं वह अपने पीछे कचरे का निशान छोड़ आता है। क्या ऐसी यात्रा को वास्तव में तीर्थ यात्रा कहा जा सकता है? तीर्थ का अर्थ केवल किसी धार्मिक स्थल तक पहुंच जाना नहीं है। तीर्थ मनुष्य के भीतर परिवर्तन की यात्रा है। यदि धार्मिक स्थल में माथा टेकने के बाद हम उसी पर्वत की गोद में प्लास्टिक फेंक दें, जिसकी पवित्रता के नाम पर वहां पहुंचे हैं, तो इसे अधूरी आस्था ही कहा जा सकता है।
इस संदर्भ में ‘कैरी मी बैक’ अभियान उम्मीद की एक महत्वपूर्ण किरण है। लगभग पांच हज़ार तीर्थयात्रियों द्वारा करीब 18 किलोमीटर के रास्ते से 12 टन से अधिक कंप्रेस्ड प्लास्टिक वापस नीचे लाना बताता है कि श्रद्धालुओं व पर्यटकों को सहभागी बनाया जाए तो वे पर्यावरण संरक्षण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यह केवल कचरा उठाने का अभियान नहीं, बल्कि यात्रा व पर्यटन की मानसिकता बदलने का प्रयास है। ऐसे अभियानों को व्यापक स्वरूप देकर हिमाचल, उत्तराखंड और अन्य हिमालय के तीर्थ व पर्यटन क्षेत्रों में लागू किया जाना चाहिए। पुन: उपयोग किए जाने वाले बर्तनों और पानी भरने की सुविधाओं के विस्तार के कारण यात्रियों की संख्या में 17 प्रतिशत वृद्धि के बावजूद प्रति यात्री कचरे में 15 प्रतिशत कमी आना इस बात का प्रमाण है कि सुविधाजनक और वैज्ञानिक व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए तो पर्यावरणीय दबाव कम किया जा सकता है। इसलिए केवल श्रद्धालुओं व पर्यटकों से अपील करना पर्याप्त नहीं है, प्रशासन को ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें पर्यावरण-अनुकूल व्यवहार सबसे सहज विकल्प बने।
हिमाचल प्रदेश के धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों पर भीड़ का अनियंत्रित बढ़ना इसी व्यापक संकट का हिस्सा है। शिमला, मनाली, धर्मशाला और धार्मिक व पर्यटन स्थलों पर मौसम विशेष में बढ़ने वाला दबाव यातायात, जलापूर्ति, सीवेज, ठोस कचरा और स्थानीय संसाधनों पर असर डालता है। पहाड़ों की वहन क्षमता मैदानी शहरों जैसी नहीं है। इसलिए किसी भी तीर्थ या पर्यटन स्थल की लोकप्रियता को केवल अधिकाधिक लोगों को वहां पहुंचाने की सफलता के रूप में नहीं देखा जा सकता। अब समय आ गया है कि ‘जितने अधिक पर्यटक, उतना अधिक विकास’ की सोच को ‘जितना संवेदनशील पर्यावरण, उतना ज़िम्मेदार पर्यटन’ में बदला जाए। पर्यटन व तीर्थ स्थलों की वहन क्षमता का वैज्ञानिक अध्ययन हो और उसके आधार पर प्रतिदिन या मौसम के अनुसार आगंतुकों की संख्या निर्धारित की जाए। सिंगल-यूज प्लास्टिक पर प्रभावी नियंत्रण हो, पानी के रिफिल स्टेशन बढ़ाए जाएं, बोतलों और पैकेजिंग के लिए डिपॉजिट-रिटर्न व्यवस्था लागू की जानी चाहिए तथा कचरे को स्रोत पर ही अलग करने की व्यवस्था हो। दुकानदारों, होटल संचालकों और विक्रेताओं को उनके द्वारा उत्पन्न कचरे के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
सबसे महत्वपूर्ण है तीर्थ यात्री की मानसिकता में परिवर्तन। पहाड़ हमारे मनोरंजन के मैदान नहीं हैं। वे हमारी आने वाली पीढ़ियों की प्राकृतिक विरासत हैं। जिस नदी के किनारे हम पूजा करते हैं, वही नदी मैदानों में बसे करोड़ों लोगों का जीवन है। जिस जंगल को हम कैमरे में कैद करते हैं, वही जंगल पहाड़ी पारिस्थितिकी को संतुलित करता है। जिस पर्वत को हम देवभूमि कह कर नमन करते हैं, उसकी ढलानों पर प्लास्टिक फेंकना उचित नहीं है। नेपाल और हिमालयी क्षेत्र में समय-समय पर अत्यधिक वर्षा, बाढ़, भूस्खलन और हिमस्खलन जैसी प्राकृतिक आपदाओं ने यह चेतावनी दी है कि पर्वतीय पारिस्थितिकी के साथ छेड़छाड़ के परिणाम गंभीर हो सकते हैं। हर आपदा को सीधे पर्यटन या प्रदूषण का परिणाम मानना वैज्ञानिक रूप से उचित नहीं होगा, लेकिन इतना निश्चित है कि अनियोजित निर्माण, अत्यधिक मानवीय दबाव, वन क्षरण और कचरा प्रबंधन की कमज़ोरी पर्वतीय क्षेत्रों की संवेदनशीलता को बढ़ा सकती है।
सवाल यह भी है कि पहाड़ी राज्यों में विकास का क्या पैमाना होना चाहिए? अगर विकास के नाम पर कहीं निर्माण गतिविधियां आवश्यक हों तो वह नियोजन के साथ ही आपदाओं को झेलने में सक्षम होनी चाहिए। आम तौर पर देखा गया है कि इन राज्यों में पर्यटन एवं धार्मिक यात्राओं को बढ़ावा देने के नाम पर ऐसी बड़ी-बड़ी इमारतें खड़ी हो गईं जो न सिर्फ बाढ़ और भूस्खलन झेलने में अक्षम साबित हुईं बल्कि पर्यावरण के हिसाब से भी नुकसानदेह रही हैं। हिमालय को केवल देवभूमि कहने से उसकी रक्षा नहीं होगी, उसे देवभूमि की तरह व्यवहार देकर ही उसकी पवित्रता बचाई जा सकती है। यही प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और यही आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारा नैतिक दायित्व है।
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