हिमाचल के प्रमुख स्थानों में से एक है मण्डी
देवों की भूमि हिमालय में धर्म स्थलों की संख्या को बताना तो संभव नहीं लगता परन्तु हिमालय के प्रमुख स्थलों में से प्रदेश के मध्य भाग में स्थित सुकेती व्यास नदी के संगम के दोनों ओर स्थित नगर ‘मण्डी’ का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।
हिमाचल का सांस्कृतिक व धार्मिक मिश्रण यहां के देवी देवताओं में भी है जो सजधज कर पालकियों में पुजारियों के कन्धों पर सवार होकर मण्डी में मनाए जाने वाले ऐतिहासिक मेले में आकर आज भी एक अद्भुत रोमांचकारी देव समागम का दृश्य पेश करते हैं।
मण्डी जहां ज़िला मुख्यालय है, वहीं अपने धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व के लिए देशभर में प्रसिद्ध है। इस नगर ‘मण्डी’ का शाब्दिक अर्थ बाजार होता है। ‘हिस्ट्री ऑफ पंजाब हिल स्टेट’ नामक पुस्तक में भी ‘मण्डी’ का अर्थ बाजार ही लगाया गया है। इस पुस्तक में बताया गया है कि प्राचीन समय से यह रास्ता मारकंड और लद्दाख से मैदानों की ओर जाता था जो आज भी वैसा ही है। इसलिए व्यापार का केन्द्र होने के कारण शायद इस स्थान को ‘मण्डी’ के नाम से पुकारा जाने लगा।
वैसे ‘मण्डी’ के नामकरण पर विद्वानों व लोगों में अलग-अलग मत हैं परन्तु कुछ धार्मिक धारणा रखने वाली किंवदंतियों के अनुसार यह नाम माण्डय नामक ऋषि के नाम से पड़ा है और माण्डय का अपभ्रंश ही ‘मण्डी’ है।
बताया जाता है कि राजा नरेंचन सेन की मृत्यु के उपरांत उसकी पत्नी गर्भावस्था में मंगलोर युद्ध से आतंकित होकर वहीं से अपने पिता के पास सुकेत की ओर निकली परन्तु रास्ते में एक स्थान पर पेड़ के नीचे बच्चे को जन्म दिया जिसका नाम बाद में पड़े (बान) ओक के कारण बानसेन ही जाना जाने लगा और इसी के वंशज अजबर सेन ने 1527 ई. में मण्डी नगर की नींव रखी थी। जो भी है परन्तु इस नगर की शिवरात्रि का समूचे उत्तरी भारत में अपना अलग ही स्थान है।
मण्डी में लगभग 80 शिव मन्दिर हैं जिस में भूतनाथ, त्रिलोकीनाथ, अर्धनारीश्वर व एक दशा रूद्र महादेव का अपना ऐतिहासिक महत्त्व है। शिवरात्रि मेले में अधिक ग्रामीण देवी देवता भाग लेते हैं। मेले में देश विदेश के सांस्कृतिक दलों के अतिरिक्त प्रदेश के लोक नर्तक दलों व लोकप्रिय गायकों और हास्य कवियों को बुलाया जाता है। मेले में मण्डी क्षेत्र के मुख्य व पूजनीय देवता माहूनाग, हुंरग नारायण और कमरूनाग के अलावा कई प्रमुख देवता शामिल होते हैं।
इस महाशिवरात्रि मेले के प्रथम दिन मण्डी की पुरानी रियासत के राजा के महल से भव्य जलूस निकाला जाता है जिसमें देवताओं के अलावा नगर और ग्रामीण जनता के सहित गणमान्य व्यक्ति भी सामूहिक रूप से भाग लेते हैं। सन् 1648 में बानसेन के वंशज राजा सूरजसेन ने औलाद न होने के कारण घोषणा की थी कि उसकी मृत्यु के बाद मण्डी रियासत की मूर्ति के रूप में ‘राजा माधव’ असली शासक होगा। इसीलिए आज भी इस शिवरात्रि में शिव के साथ-साथ उसकी पूजा भी लोकप्रिय है। यह मेला 300-400 साल पहले राजा अजबेर सेन ने पुरानी मण्डी में शुरू किया था। लोगों का कहना है कि अजबेर सेन को कई दिनों तक सपनों में एक कामधेनु गऊ दिखाई देती रही जो वर्तमान मण्डी में स्थापित भूतनाथ मंदिर के पास शिवलिंग की पूजा करती थी। राजा ने उस स्थान को देखने का निश्चय किया तथा वहां शिवपिंडी के दर्शन होने पर उसने अपनी राजधानी भी पुरानी मण्डी से वर्तमान मण्डी में स्थानान्तरित कर दी थी। महाशिवरात्रि पर्व को समस्त हिमाचल में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। यह पर्व प्रदेशवासियों के सामुदायिक जीवन का अभिन्न अंग है। महासू और मण्डी में शिवरात्रि अत्यधिक लोकप्रिय है तथा पूरे सप्ताह पारंपरिक ढंग से मनाई जाती है। शिवरात्रि के दिन मण्डी के लोग बड़ी श्रद्धा से व्रत रखते हैं तथा सभी महत्वपूर्ण मंदिरों में जाकर पूजा करते हैं। इस दिन मण्डी के लोग हलवा, अरबी व आलू की सूखी सब्जी और उबला हुआ कद्दू दूध के साथ खाते हैं। इसके अतिरिक्त सप्ताह भर लम्बी शिवरात्रि के दौरान सभी परिवारों में ‘फलाहार’ बांटने का रिवाज है जिसमें अपने सगे संबंधियों को नगदी, फल आदि देते हैं। (उर्वशी)





