हीरो ऑफ द वीक कैप्टन स्मित मच्छार

गुजरे 30 सितम्बर 2026 से पहले कैप्टन स्मित मच्छार का नाम विमानन जगत के बाहर शायद ही किसी ने सुना था। मुंबई के घाटकोपर इलाके के रहने वाले 39 वर्षीय पायलट की ज़िंदगी में शोहरत का कोई आग्रह भी नहीं था। वह उन पेशेवरों में थे, जिनके लिए विमान उड़ाना रोमांच से ज्यादा जिम्मेदारी होता है। लेकिन 30 सितम्बर की सुबह फ्लाईदुबई की उड़ान एफजेड1073 के कॉकपिट में जिस तरह उनके ओमानी सह-पालयट हमाम अल हमामी ने उन पर क्रैश एक्स यानी कुल्हाड़ी से हमला कर दिया ताकि वह विमान को ले जाकर इज़रायल में किसी ऊंची इमारत से टकराकर 9/11 जैसे खौफनाक हादसे को अंजाम दे सके। लेकिन कुल्हाड़ी से हुए हमले के बावजूद जिस तरह कैप्टेन स्मित मच्छार ने अदम्य साहस का परिचय देते हुए बेहोश होने के पहले किसी तरह कॉकपिट का दरवाजा खोल दिया और क्रू के सदस्यों व विमान यात्रियों ने इस आतंकी पायलट पर काबू कर लिया और संयोग से फ्लाइट में मौजूद दो ऑफ ड्यूटी पायलटों ने विमान को संभाल लिया, जिससे विमान में क्रू मेंबर सहित सवार सभी 182 लोगों की जान बच गई। इस अचानक घटी घटना ने कैप्टेन मच्छार की डेढ़ दशक लंबी एविएशन यात्रा को एक असाधारण आयाम दे दिया। आज उन्हें भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से लेकर इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ-साथ अमरीका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प, दुबई के क्राउन प्रिंस हमदान बिन मोहम्मद अल मकतूम सहित दुनिया के अनेक नेताओं और सेलिब्रिटीज ने सार्वजनिक रूप से सलाम कर चुके हैं। 
दिलचस्प बात यह है कि स्मित कभी पायलट बनना ही नहीं चाहते। उनका पहला रास्ता परिवार के टेक्सटाइल कारोबार की ओर जाता था, लेकिन एक एविएशन सैमीनार में 19 साल की उम्र में जब वह शामिल हुए, तो वहां सुने गये एक लेक्चर ने उनकी ज़िंदगी की दिशा ही बदल दी। कैप्टेन स्मित का संबंध मूलरूप से गुजरात के अमरेली ज़िला स्थिति सावरकुंडला से है, हालांकि उनका जन्म और परवरिश मुंबई में ही हुई है। क्योंकि उनका परिवार गुजरात से आकर मुंबई के घाटकोपर और तिलक नगर इलाके में बरसों पहले बस चुका था। 
उनके पिता उपेंद्र मच्छार टेक्सटाइल कारोबार से जुड़े रहे। परिवार का कारोबार कोई मामूली पारिवारिक धंधा नहीं था। स्मित के दादा ने टेक्सटाइल प्रिंटिंग फैक्टरी स्थापित की थी, जिसे बाद में उनके पिता और चाचा ने संभाला। बचपन में स्मित के सामने भी स्वाभाविक रूप से यही भविष्य था। पढ़ाई पूरी करो और परिवार का कारोबार संभालो, यह उनके घर के बड़े लोगों का कहना था। स्मित ने एमडी भाटिया स्कूल से 2003 में 10वीं कक्षा पास की, उनके एक सहपाठी भाविन जेठवा के मुताबिक स्कूल के दिनों में वह सीधे-सादे बेफिक्र और स्पष्टवादी थे, उन्हें बनावटीपन पसंद नहीं था। उनके बचपन के एक और दोस्त अमित सोनी का कहना है, वह खुशमिजाज और जिंदादिल हैं।
स्कूल के बाद स्मित ने ससमीरा इंस्टीट्यूट ऑफ मैन-मेड टेक्सटाइल से मैन-मेड टेक्सटाइल केमेस्ट्री से जुड़ा डिप्लोमा किया, जिसका मकसद था परिवार के कारोबार को समझना और आगे चलकर उसको संभालना। लेकिन कोर्स पूरा करने के बाद उन्होंने सोचा कि कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए मैनेजमेंट की पढ़ाई भी ज़रूरी होगी। इसलिए वह मुंबई के वेलिंगकर इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट पहुंचे। उनकी प्रोफाइल के मुताबिक वहां से उन्होंने बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन की पढ़ाई 2007-08 में पूरी की। यहीं पर पढ़ाई के दौरान उनकी ज़िंदगी ने एक अप्रत्याशित मोड़ लिया। उन दिनों उनकी उम्र 19 साल थी, जब मैनेजमेंट की पढ़ाई के दौरान वह एक एविएशन सैमीनार में शामिल हुए। वहां विमानन के बारे में एक लेक्चर सुनते हुए उन्हें लगा कि यही तो वह दुनिया है, जिसमें वह जाना चाहते हैं। अंतत: उन्होंने दृढ़ फैसला ले लिया, जो कि उनके परिवार के लिए चैंकाने वाला था। अपने एक इंटरव्यू में कैप्टेन स्मित ने बताया कि उनकी मां इस पेशे को लेकर डर गईं थीं, हालांकि पिता अपेक्षाकृत सहज थे, लेकिन उनके लिए भी यह आसान निर्णय नहीं था। क्याेंकि पायलट ट्रेनिंग परिवार के लिए बहुत बड़ा आर्थिक निवेश थी। उनके मुताबिक उन्होंने अपने पिता से कहा कि उनके पास एक सपना है, जिसे वह पूरा करना चाहते हैं। पिता ने शर्त रखी कि मेहनत से कमाये गये पैसे को वह व्यर्थ नहीं जानें देंगे, स्मित ने यह वायदा निभाया। 
वह पायलट प्रशिक्षण के लिए न्यूज़ीलैंड के मेन-लैंड एविएशन कॉलेज पहुंच गये, यह उनके लिए दोहरी छलांग थी। पहली बार वह भारत से बाहर गये थे और पहली बार विमानन को कॅरियर के रूप में अपनाने का जो सपना देखा था, वह मूर्तरूप ले रहा था। कैप्टेन स्मित के मुताबिक पायलट ट्रेनिंग पर जाने से पहले उन्होंने विमान से यात्रा भी बहुत कम की थी। उन्हें ट्रेनिंग से पहले चेताया गया था कि डर लग सकता है और ऐसा सही ही कहा गया था, क्योंकि कैप्टेन स्मित के मुताबिक वह डरे भी, लेकिन पीछे नहीं हटे और फिर वह दिन आया जब वह प्रशिक्षु पायलट के रूप में पहली बार एयरलाइन विमान की जिम्मेदारी महसूस हुई। बेंग्लुरु से दिल्ली की उड़ान के दौरान। उनके साथ वरिष्ठ परीक्षक थे, बाद में उन्होंने बताया था कि डर उड़ाने का नहीं था बल्कि जिम्मेदारी का था कि विमान में बैठे लोगों की सुरक्षा अब उनके निर्णोयों से जुड़ी है। साल 2011 में भारत लौटने के बाद कैप्टेन स्मित ने स्पाइस जेट ज्वाइन किया और अगले 11 वर्षों तक उन्होंने न केवल अनेक उड़ानें भरीं बल्कि धीरे-धीरे नेतृत्व और प्रशिक्षण की जिम्मेदारियों भी संभाली। वह सीनियर कमांडर बने और नवम्बर 2020 से लाइन ट्रेनिंग कैप्टेन की भूमिका में भी आये। उनके प्रोफाइल के मुताबिक स्पाइस जेट के दौरान उन्होंने 6,400 से ज्यादा घंटे पायलट इन कमांड के रूप में उड़ाये हैं। कुल मिलाकर बोइंग 737 परिवार पर लगभग 9,750 घंटे का उनका उड़ान अनुभव दर्ज है। 
उनकी इस यात्रा में 30 सितम्बर 2026 को वह भयावह दिन आया, जिसके लिए शायद कोई सिम्यूलेटर किसी को पूरी तरह से तैयार नहीं कर सकता। दुबई से तेलअवीव जा रही फ्लाईदुबई एफजेड1073 में जो कुछ हुआ, वह अब सदियों तक एक केस स्टडी के रूप में पढ़ाया जायेगा कि जब यात्रियों से खचाखच भरा विमान एक झटके में हजारों फीट नीचे आ गया, तो किस तरह उन्होंने अपनी जान की परवाह न करते हुए, 174 यात्री और 8 क्रू सदस्यों को बचाया। हमले के बाद उन्हें तबुक में उपचार मिला और फिर उन्हें यूएई ले जाया गया, जहां उन्होंने अस्पताल के बिस्तर से प्रधानमंत्री मोदी और बाद में इज़रायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू से बात की। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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