मतदाता फॉर्म 6, 7 और 8 देशव्यापी विरोध प्रदर्शन की मुख्य वजह बने
उत्तर प्रदेश की संशोधित मतदाता सूची की समीक्षा करते हुए रिपोर्टर्स कलेक्टिव ने पाया कि इसमें बिना फॉर्म 6 और बिना फोटो के 16.18 लाख रहस्यमयी मतदाताओं को जोड़ा गया है, जिनकी पहचान को लेकर चुनाव आयोग रहस्यमयी खामोशी बनाये हुए है। यह कानूनन अवैध है। भारत के चुनाव आयोग ने इन 16.18 लाख मतदाताओं की पहचान सार्वजनिक नहीं की है, जिनके बारे में उसका दावा है कि उनका नाम देश के सबसे अधिक जनसंख्या वाले राज्य में हुई एसआईआर के प्रारम्भिक चरणों में जोड़े गये थे। गौरतलब है कि चुनाव आयोग मतदाता सूची में किसी भी भारतीय नागरिक का नाम उसी सूरत में जोड़ सकता है जब वह फॉर्म 6 के ज़रिये आवेदन करे। चुनाव आयोग ने वोटर लिस्ट में शामिल किये जाने के लिए 71.38 लाख आवेदनों की डिटेल्स सार्वजनिक की थी, जिनमें से अधिकतर वह लोग थे, जिनके नाम आयोग ने ड्राफ्ट लिस्ट में हटा दिये थे लेकिन इसके विपरीत चुनाव आयोग ने फाइनल लिस्ट में 84.3 लाख मतदाता जोड़े। इसका अर्थ यह हुआ कि सार्वजनिक किये गये आवेदनों की तुलना में 12.92 लाख अधिक मतदाता जोड़े गये। यह कानूनन असंभव है।
चूंकि फॉर्म 6 के बिना किसी को वोटर लिस्ट में नहीं जोड़ा जा सकता, इसलिए वोटर लिस्ट में जोड़े गये लोगों की संख्या आवेदन करने वाले लोगों की संख्या से अधिक नहीं हो सकती। इसके अतिरिक्त चुनाव आयोग को कई लाख आवेदन (फॉर्म 7) ड्राफ्ट लिस्ट से नाम हटाने के लिए भी मिले थे, इसलिए इतने अधिक एक्स्ट्रा वोटर्स को सूची में शामिल किया जाना और भी ज्यादा संदिग्ध प्रतीत होता है। रिपोर्टर्स कलेक्टिव का यह भी कहना है कि चुनाव आयोग ने अपनी 7 मार्च की प्रेस रिलीज़ में कहा था कि ड्राफ्ट लिस्ट तैयार किये जाने से पहले 16.18 लाख मतदाताओं ने अपना नाम सूची में शामिल किये जाने के लिए आवेदन किया था। इस पर रिपोर्टर्स कलेक्टिव का सवाल है कि यह कैसे संभव हो सकता है? क्योंकि एसआईआर के तहत तैयार की गई ड्राफ्ट लिस्ट के बाद ही तो लोगों को मालूम होगा कि उनका नाम हटा दिया गया था। ध्यान रहे कि इस चरण में केवल 18 वर्ष का होने वाले नये मतदाता ही आवेदन कर सकते हैं। कानूनन जिनका नाम सूची में जोड़ा गया है या हटाया गया है, उसे सार्वजनिक करना होगा ताकि आवेदन की वैधता की पुष्टि हो सके।
रिपोर्टर्स कलेक्टिव का कहना है कि जब उत्तर प्रदेश के मुख्य चुनाव अधिकारी नवदीप रिणवा से संपर्क किया गया कि यह रहस्यमयी 16.18 लाख मतदाता कैसे जोड़े गये, तो उन्होंने गुस्से में कहा, ‘तुम्हारी शंकाओं व प्रश्नों को क्लियर करने के लिए हम कंसल्टेशन सेवाएं उपलब्ध नहीं कराते हैं।’ लेकिन रिपोर्टर्स कलेक्टिव की खोजी रिपोर्ट वायरल होने पर रिणवा ने एक्स पर सफाई देते हुए अपने लम्बे पोस्ट में लिखा, ‘प्रसारित खबर ‘उत्तर प्रदेश की वोटर लिस्ट में 16.18 लाख रहस्यमयी वोटर जोड़े गये’ के आरोप के संबंध में यह स्पष्ट किया जाता है कि उत्तर प्रदेश में विशेष प्रगाढ़ पुनरीक्षण-2026 का कार्य लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1950, निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण नियम 1960 और भारत निर्वाचन आयोग के निर्देशों के अनुसार पूरी पारदर्शिता के साथ किया गया। खबर में लगाये गये आरोप तथ्यहीन तथा मिथ्या धारणाओं पर आधारित होने के कारण खारिज किये जाते हैं।’ कौन सच बोल रहा है और कौन झूठ, यह तो जांच का विषय है, लेकिन फॉर्म 6, जिसका प्रयोग नये मतदाताओं को पंजीकृत करने के लिए किया जाता है व जिसके प्रारूप में संसद द्वारा संशोधन के अतिरिक्त परिवर्तन संभव नहीं, को लेकर अब भारत का चुनाव आयोग बुरी तरह से फंसता हुआ नज़र आ रहा है।
चुनाव आयोग एसआईआर के दौरान यही कहता रहा कि फॉर्म 6 में ‘संशोधन’ सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर किया गया है लेकिन अब इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवायी के दौरान भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने स्पष्ट किया है कि उनकी अदालत ने फॉर्म 6 में ‘संशोधन’ को मंज़ूरी नहीं दी थी। अब चुनाव आयोग का कहना है कि फॉर्म 6 में कोई तब्दीली नहीं की गई थी, सिर्फ नये मतदाताओं के लिए अतिरिक्त घोषणा हेतु एनेक्सचर डी जोड़ा गया था। यह फॉर्म में ‘परिवर्तन’ करना ही होता है। इस एनेक्सचर डी को अब हटा दिया गया है, जिससे यह सवाल खड़े हो गये हैं कि इसे किसके कहने पर शामिल किया गया था, किसके कहने पर हटाया गया और जो सॉफ्टवेयर कंपनी संबंधित साईट का प्रबंधन करती है, उसे ऐसा करने के लिए किसने आदेश दिया था। दरअसल, विवाद केवल यहीं तक सीमित नहीं है। फॉर्म 7, जिसका प्रयोग मतदाता सूची में दर्ज नाम पर आपत्ति दर्ज करने या मतदाता का नाम सूची से हटाने के लिए किया जाता है, को लेकर तेलंगाना में पहली एफआईआर दर्ज की गई है, भाजपा के एक बीएलए (बूथ लेवल एजेंट) एस बालचंद्र के खिलाफ, जिस पर आरोप है कि राज्य में चल रही एसआईआर के दौरान उसने फॉर्म 7 में फज़र्ी जानकारियां भरके एक विशेष समुदाय के 30 मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट से हटवाने का प्रयास किया।
एफआईआर चिकडापल्ली पुलिस स्टेशन में भारतीय न्याय संहिता व जनप्रतिनिधि कानून की प्रासंगिक धाराओं के तहत दर्ज की गई है। वैध मतदाताओं को मतदाता सूची से हटाने का खेल अन्य राज्यों से भी प्रकाश में आया है। मसलन, कर्नाटक के विभिन्न क्षेत्रों में सैंकड़ों की संख्या में प्री-प्रिंटेड फॉर्म 7 दाखिल किये गये मतदाताओं का नाम वोटर लिस्ट से हटवाने के लिए और बीएलए (बूथ लेवल एजेंट्स) पर दबाव बनाया गया कि वह इन फॉर्म पर हस्ताक्षर करें। इस पर कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार का कहना है कि पहले से भरे हुए और प्री-प्रिंटेड फॉर्म 7 थोक के भाव में जमा किये गये थे, गलत तरह से मतदाताओं का नाम कटवाने के लिए, विशेषकर अल्पसंख्यकों, दलितों व पिछड़े समुदायों को निशाना बनाया गया था। इस विवाद पर ज़बरदस्त विरोध प्रदर्शन और पुलिस में रिपोर्ट के बाद मुख्य चुनाव अधिकारी ने राज्य की सभी 224 विधानसभा सीटों पर विस्तृत जांच के आदेश दिये हैं।
इसी वजह से सम्पूर्ण विपक्ष, सिविल सोसाइटी, दबाव गुट जैसे कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) आदि सड़कों पर हैं, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के साथ ही चुनाव प्रणाली में सुधार व निष्पक्षता की मांग भी कर रहा है। चुनाव आयोग का मामला सुप्रीम कोर्ट व विभिन्न हाईकोर्ट्स में भी इस समय सुनवायी के चरण में है। विशेषकर इसलिए भी कि मतदाताओं के फॉर्म 8 (पते में तब्दीली या एंट्री को दुरुस्त कराने के लिए किया जाता है) को चुनाव आयोग का केंद्रीय डिजिटल सिस्टम (ईसीआईनेट) स्वत: ही ठुकरा रहा है अगर एसआईआर के दौरान ड्राफ्ट सूची में मतदाता का नाम नहीं है। इस संबंध में चिंतित व परेशान मतदाताओं को हाईकोर्ट तक में दस्तक देनी पड़ रही है। इसलिए अब यह सुप्रीम कोर्ट की ज़िम्मेदारी है कि वह सुनिश्चित करे कि एसआईआर में कोई वयस्क भारतीय नागरिक वोटर लिस्ट से बाहर न हो और किसी नागरिक को अपने मत अधिकार के लिए अदालत के चक्कर न लगाने पड़ें।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर



