नोबेल शांति पुरस्कार के लिए ट्रम्प इतने हताश क्यों ?
अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को आखिर नोबेल शांति पुरस्कार पाने की इतनी बेचैनी क्यों है? क्या दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश का राष्ट्रपति होना उनके लिए पर्याप्त नहीं है, जो अब दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित शांति सम्मान को अपनी उपलब्धियों की अंतिम मुहर बनाना चाहते हैं? यदि पुरस्कार नहीं मिलता, तो क्या पुरस्कार देने वाली संस्था, उसके निर्णायकों और उस देश को ही कटघरे में खड़ा कर देना चाहिए, जहां यह निर्णय लिया जाता है? गुजरे 9 अक्तूबर 2026 को नोबेल शांति पुरस्कार की घोषणा के बाद ट्रम्प ने नार्वे और पुरस्कार के निर्णायकों पर जिस आक्रामक अंदाज में निशाना साधा, उसने इन सवालों को फिर से दुनिया के सामने ला खड़ा किया है। पुरस्कार न दिए जाने को ट्रम्प ने नार्वे के माथे पर ऐसा कलंक बताया है, जिसे कभी मिटाया नहीं जा सकेगा। ट्रम्प ने पुरस्कार को कुछ कथित कट्टरपंथी विचारधारा वाले लोगों द्वारा बदनाम कर देने की बात कही और विजेता भारतवंशी नवी पिल्लै को ऐसी शख्सियत बताया, जिसके बारे में किसी ने सुना तक नहीं।
यह किसी पुरस्कार से वंचित दुनिया के सबसे ताकतवर व्यक्ति की सामान्य निराशा नहीं थी। यह उस मानसिकता का प्रदर्शन था, जिसमें सम्मान पाने की इच्छा धीरे-धीरे सम्मान देने वालों पर अधिकार जताने लगती है। ट्रम्प की समस्या यह नहीं कि वह नोबेल शांति पुरस्कार चाहते हैं। समस्या यह है कि वह बार-बार अपनी उपलब्धियों के आधार पर पुरस्कार पर अपना दावा प्रस्तुत करते हैं और अस्वीकृति मिलने पर संस्था की विश्वसनीयता को ही चुनौती देने लगते हैं। ट्रम्प की नोबेल महत्वाकांक्षा नई नहीं है। 2019 में पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री इमरान खान के साथ मुलाकात के दौरान कश्मीर विवाद सुलझाने और नोबेल पुरस्कार के सवाल पर उन्होंने कहा था कि यदि पुरस्कार निष्पक्ष ढंग से दिए जाते, तो उन्हें बहुत-सी उपलब्धियों के लिए यह सम्मान मिल सकता था। उनके पहले कार्यकाल में भी उनकी यह इच्छा सार्वजनिक रूप से सामने आती रही। फरवरी 2025 में इज़रायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ व्हाइट हाउस में बातचीत के दौरान ट्रम्प ने कहा था, ‘नोबेल शांति पुरस्कार मुझे कभी नहीं मिलेगा, हालांकि मैं इसका सबसे वाजिब हकदार हूं।’ जून 2025 में उनका दावा एक बार फिर मुखर हो गया। उन्होंने कहा कि अब तक उन्हें चार या पांच बार यह पुरस्कार मिल जाना चाहिए था।
कुछ ही समय बाद उन्होंने यह भी कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध और इज़रायल-ईरान संघर्ष सहित किसी भी मामले में कुछ भी कर लें, पुरस्कार उन्हें नहीं मिलेगा, क्योंकि निर्णायक उदारवादी विचारधारा के लोगों को ही चुनते हैं। इस क्रम में उनकी दलीलें कई रूपों में सामने आयीं कहीं युद्ध रोकने का दावा, कहीं परमाणु संघर्ष टालने का श्रेय, कहीं मध्य पूर्व में शांति स्थापित करने की उपलब्धि, तो कहीं यह शिकायत कि राजनीतिक विचारधारा के कारण उनके साथ अन्याय हो रहा है। अमरीकी प्रतिनिधि क्लॉडिया टेनी ने जनवरी 2026 में तीसरी बार उनके नाम का समर्थन करते हुए नामांकन किया। पाकिस्तान सरकार ने जून 2025 में भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान कथित निर्णायक कूटनीतिक हस्तक्षेप के लिए उन्हें 2026 के नोबेल शांति पुरस्कार हेतु नामित करने की घोषणा की। इज़रायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने भी उनके नाम की पैरवी की। इस तरह ट्रम्प की निजी आकांक्षा को कुछ विदेशी सरकारों और राजनीतिज्ञों का सार्वजनिक समर्थन भी मिला, लेकिन नामांकन किसी पुरस्कार की गारंटी नहीं होता। किसी व्यक्ति का नाम प्रस्तावित होना और स्वतंत्र निर्णायक समिति द्वारा उसे पुरस्कार के योग्य मानना दो अलग बातें हैं। ट्रम्प की बयानबाजी में अक्सर यही अंतर धुंधला पड़ जाता है।
नोबेल शांति पुरस्कार के लिए ट्रम्प की सबसे प्रमुख दलील यह है कि उन्होंने दुनिया में 8 युद्ध रुकवाए इसलिए उन्हें आठ नोबेल शांति पुरस्कार मिलने चाहिए थे। अक्तूबर 2026 में उन्होंने जिन संघर्षों का फिर से उल्लेख किया है उनमें- भारत-पाकिस्तान, इज़रायल-ईरान, इज़रायल-हमास, कंबोडिया-थाईलैंड, सर्बिया-कोसोवो, रवांडा-कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य, आर्मेनिया-अजरबैजान तथा मिस्र-इथियोपिया के विवाद शामिल थे। उन्होंने उत्तर कोरिया-दक्षिण कोरिया, जापान-उत्तर कोरिया और चीन-ताइवान के बीच भी संभावित संघर्ष टालने का श्रेय लिया है। रूस-यूक्रेन और ईरान के मामलों को भी उन्होंने अपनी भावी शांति उपलब्धियों के रूप में पेश किया। हालांकि अंतर्राष्ट्रीय संघर्षों में अमरीकी कूटनीति की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। कुछ मामलों में ट्रम्प प्रशासन ने युद्धविराम या तनाव कम करने में योगदान दिया है। लेकिन किसी संघर्ष में मध्यस्थता करना, युद्धविराम करवाना और स्थायी शांति स्थापित कर देना तीन अलग बातें और अलग उपलब्धियां हैं।
स्वतंत्र तथ्य-जांच संस्था फैक्टचेक डॉट ओआरजी ने अगस्त 2025 में स्पष्ट किया था कि ट्रम्प के बताए सभी संघर्ष न तो वास्तविक युद्ध थे, न ही सभी का समाधान हो चुका था। भारत ने विशेष रूप से इस दावे का खंडन किया कि भारत-पाकिस्तान सैन्य कार्रवाई रोकने के मामले में अमरीकी मध्यस्थता निर्णायक थी। हमारे विदेश मंत्रालय के मुताबिक सैन्य कार्रवाई रोकने की सहमति दोनों देशों के बीच सीधे स्थापित संपर्क माध्यमों से बनी थी। दूसरी ओर पाकिस्तान ने ट्रम्प की भूमिका को महत्वपूर्ण बताते हुए उनके नामांकन की घोषणा की थी। इसी तरह 2020 के अब्राहम समझौते ट्रम्प की विदेश नीति की वास्तविक कूटनीतिक उपलब्धियों में गिने जा सकते हैं। इनके तहत इज़रायल और संयुक्त अरब अमीरात के बीच संबंध सामान्य हुए और बहरीन सहित कुछ अन्य अरब देशों के साथ भी रिश्तों के सामान्यीकरण की प्रक्रिया आगे बढ़ी। इस उपलब्धि का मूल्यांकन किया जाना चाहिए। मगर किसी उपलब्धि की प्रशंसा और उसके बदले सर्वोच्च अंतरराष्ट्रीय सम्मान पर अपना अधिकार जताना दो अलग-अलग बातें हैं। ट्रम्प के व्यवहार का सबसे चिंताजनक पहलू उनकी निराशा के साथ इसकी अभिव्यक्ति है। जनवरी 2026 में वेनेजुएला की विपक्षी नेता और 2025 की नोबेल शांति पुरस्कार विजेता मारिया कोरीना मचाडो ने अपना पदक ट्रम्प को सौंप दिया था। उन्होंने इसे ट्रम्प के प्रति सम्मान और वेनेजुएला की स्वतंत्रता के लिए उनके समर्थन से जोड़ा।
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