नरेन्द्र मोदी को 2029 चुनावों तक ज्ञानेश कुमार की ज़रूरत ?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस बात को लेकर बड़ी उलझन में हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की विपक्ष की मांग से कैसे निपटा जाए। मौजूदा हालात अस्थिर हैं और मामला सीईसी को हटाने की मांग से आगे बढ़कर गृह मंत्री अमित शाह के इस्तीफे तक भी जा सकता है, जो दिल्ली में अघोषित लॉकडाउन लगाने और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को दबाने के फैसलों के पीछे मुख्य व्यक्ति रहे हैं।
आइए सबसे पहले चुनाव आयोग की बात करते हैं। ज्ञानेश कुमार 26 जनवरी, 2029 को रिटायर होने वाले हैं, जो अप्रैल-मई 2029 में होने वाले अगले लोकसभा चुनावों की प्रक्रिया शुरू होने से ठीक दो महीने पहले का समय है। मौजूदा दो चुनाव आयुक्तों में से सबसे वरीय डा. सुखबीर सिंह संधू 5 जुलाई, 2028 को रिटायर होंगे। दूसरे, डा. विवेक जोशी, 18 फरवरी, 2031 को रिटायर होंगे। इसलिए अप्रैल-मई 2029 में अगले लोकसभा चुनावों के समय, मौजूदा तीन सदस्यीय ईसीमें से केवल डा. विवेक जोशी ही बचे रहेंगे। सरकार को जुलाई 2028 के बाद एक नया चुनाव आयुक्त नियुक्त करना होगा।
मौजूदा नियमों के अनुसार वर्तमान सीईसी को उनके कार्यकाल के दौरान किए गए किसी भी काम के लिए कानून का संरक्षण प्राप्त है। सरकार उन्हें बर्खास्त नहीं कर सकती। संसद द्वारा उन पर महाभियोग चलाया जा सकता है लेकिन भाजपा और उसके सहयोगियों के पास भारी बहुमत होने के कारण अभी यह व्यावहारिक नहीं है। विपक्ष शायद दूसरी बार महाभियोग की कोशिश न करे। मोदी सरकार के पास उनके कार्यकाल के पूरा होने से पहले उनसे छुटकारा पाने का एकमात्र तरीका यही है कि उनसे खुद इस्तीफा देने के लिए कहा जाए। ज्ञानेश कुमार को मोदी-भक्त माना जाता है। केरल सरकार में सचिव रहते हुए उन्होंने मोदी और भाजपा के लिए काम किया है। अगर हालात की मांग हुई तो वह प्रधानमंत्री की बात मान सकते हैं। ज्ञानेश कुमार, जिन्हें ‘टास्क मास्टर’ माना जाता है, भाजपा में शामिल हो सकते हैं और मंत्री भी बन सकते हैं। लेकिन यह इस्तीफा दो बातों पर निर्भर करता है। पहली बात, सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग और उसके तीनों सदस्यों को नोटिस भेजकर पूछा है कि क्या फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। अगर फैसले सर्वसम्मति से नहीं लिए गए थे तो सर्वोच्च न्यायालय उन्हें रद्द कर सकता है। अब सवाल यह है कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ की खबर की सच्चाई जानने के लिए सर्वोच्च न्यायालय दोनों चुनाव आयुक्तों से आमने-सामने बात करने में कितना आगे जाएगा। अगर सर्वोच्च न्यायालय सिर्फ चुनाव आयोग के आधिकारिक जवाब को मान लेता है, तो इसका कोई खास मतलब नहीं होगा, क्योंकि सीईसी बाकी दोनों पर दबाव डालकर संयुक्त बयान जारी करवा सकते हैं कि सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे।
इसके अलावा सर्वोच्च न्यायालय को बदले हुए ‘फॉर्म 6’ के मामले पर भी सख्ती से कार्रवाई करनी होगी, जिसे अदालत ने मंज़ूरी नहीं दी थी जबकि सीईसी ने दावा किया था कि उन्हें अदालत की मंजूरी मिल गई थी। सर्वोच्च न्यायालय निश्चित रूप से सीईसी पर झूठ बोलने और अदालत के विचारों को गलत तरीके से पेश करने का आरोप लगा सकता है। सवाल यह है कि क्या सर्वोच्च न्यायालय कानूनों का पालन करने में नैतिक और चारित्रिक विफलता के लिए ज्ञानेश कुमार के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करेगा। सर्वोच्च न्यायालय को सीईसी को हटाने का आदेश देने का अधिकार नहीं है लेकिन न्यायालय निश्चित रूप से सीईसी पर अपने संवैधानिक कर्तव्यों का पालन करने में घोर विफलता का आरोप लगा सकता है। तब इसका मतलब होगा कि नैतिक रूप से ज्ञानेश कुमार सीईसी बने रहने का अपना अधिकार खो देंगे।
मौजूदा सीईसी के खिलाफ एक और बात है। केरल विधानसभा ने ज्ञानेश कुमार को सीईसी पद से हटाने के समर्थन में एक प्रस्ताव पारित किया है। देश में किसी विधानसभा का यह पहला ऐसा कदम है। साथ ही, केरल सरकार ने ज्ञानेश कुमार से जुड़ा एक पुराना मामला फिर से खोल दिया है, जिसमें उन पर केरल सरकार के एक अधिकारी को आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप लगा था। अगर इस मामले में आगे कार्रवाई होती है और ज्ञानेश कुमार के खिलाफ फैसला आता है तो उसे लागू किया जा सकता है क्योंकि यह मामला सीईसी को उनके मौजूदा कार्यकाल के दौरान मिलने वाली सुरक्षा के दायरे से बाहर है। अब सवाल यह उठता है कि प्रधानमंत्री सीईसी को बचाने का जोखिम क्यों उठा रहे हैं, जबकि उन्हें कानूनी स्तर पर इसके नतीजों का पता है। साथ ही, सीईसी ज्ञानेश कुमार के तहत चुनाव आयोग पर वोट चोरी के आरोपों और सीईसी को हटाने की मांग पर छात्रों, बुद्धिजीवियों और सिविल सोसाइटी के लोगों की भारी प्रतिक्रिया से विपक्ष को जो फायदा मिल रहा है, उसे भी वे जानते हैं।
वजह साफ है नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को इसी में अपनी तरफ से काम करने और आने वाले चुनावों (जो 2029 के मध्य में आम चुनावों के साथ खत्म होंगे) में राज्यों में भाजपा को जिताने में मदद के लिए ज्ञानेश कुमार की ज़रूरत है। हालांकि ज्ञानेश कुमार 26 जनवरी 2029 को रिटायर हो जाएंगे, लेकिन उम्मीद है कि वे चुनाव आयोग के कामकाज को इस तरह से ढाल देंगे कि नये सीईसी, जो पद संभालेंगे, चाहकर भी उस स्थिति में ज्यादा बदलाव नहीं कर पाएंगे। प्रधानमंत्री फिर डा. विवेक जोशी को सीईसी के तौर पर प्रोन्नत कर सकते हैं या ज्ञानेश कुमार के रिटायर होने के बाद किसी नए भरोसेमंद नौकरशाह को नया सीईसी नियुक्त किया जा सकता है।
भाजपा के शीर्ष नेतृत्व के लिए तुरंत प्राथमिकता मार्च 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हैं। भाजपा उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव हारने का जोखिम नहीं उठा सकती, जैसा कि 2024 के लोकसभा चुनावों में हुआ था, जब पार्टी को सिर्फ 33 सीटें मिली थीं जबकि इंडिया गठबंधन को 43 सीटें मिली थीं। अगर सीईसी के कहने पर कुछ चुनिंदा निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव अधिकारी थोड़ी भी मदद कर दें, तो उत्तर प्रदेश में भाजपा को चुनावी तौर पर बड़ा फायदा हो सकता है, जिसकी उसे सख्त ज़रूरत है। इसलिए अभी सरकार और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व का मुख्य ध्यान इस बात पर है कि चुनाव आयोग के हालिया फैसलों की जानकारी की सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की जा रही जांच की प्रक्रिया में देरी हो। उम्मीद है कि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता, चुनाव आयोग की ओर से जवाब देने के लिए नई तारीखें मांगने की पूरी कोशिश करेंगे। अब सब कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि क्या सर्वोच्च न्यायालय संविधान की मूल भावना यानी वोट देने के अधिकार की रक्षा करने वाले शेर की तरह काम करेगा या फिर अधूरी टिप्पणियों के ज़रिए सीईसी को आलोचना से बचने देगा। इस तरह ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे पर नरेन्द्र मोदी का अंतिम फैसला भी सर्वोच्च न्यायालय के अंतिम आदेश पर निर्भर करेगा। (संवाद)

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