एक बेबस का अनकहा दर्द

इस बार कार्यालय के वार्षिकोत्सव कार्यक्रम में शामिल होने का निमंत्रण किसी कारणवश नहीं मिलने से सेवानिवृत्त कर्मचारियों के चेहरों पर मायूसी की छाया साफ दिखाई दे रही थी। आखिर ऐसा क्यों न होता? जिस कार्यालय में उन्होंने अपने जीवन के बहुमूल्य वर्ष खपा दिए हों, उसी कार्यालय के वार्षिकोत्सव में आमंत्रण न मिलना किसी टीस से कम नहीं था।
कार्यक्रम में किन-किन लोगों को आमंत्रित किया जाना है, इसके लिए एक पैनल पहले से निर्धारित रहता है। उसमें सेवानिवृत्त कर्मचारियों के साथ-साथ बाहर से आमंत्रित किए जाने वाले प्रमुख लोगों के नाम भी क्रमवार दर्ज होते हैं। कार्यालय में वर्षों से इसी परंपरा के अनुसार कार्य होता आया है।
जब हम स्वयं सेवा में थे, तब विभाग के ऐसे अनेक कार्यक्रमों और व्यवस्थाओं को निभाने में अपनी भूमिका निभाते रहे थे। इसलिए सेवानिवृत्त कर्मचारियों को आमंत्रित करना कोई नई बात नहीं थी। बल्कि पेंशनरों को आमंत्रित करना तो परंपरा का अभिन्न हिस्सा हुआ करता था। वे कार्यक्रम में आकर अपने अनुभवों से नए कर्मचारियों को अवगत कराते और उन्हें अपने अनुभवों की विरासत सौंपते थे।
लेकिन इन दिनों कार्यालय का माहौल कुछ अच्छा नहीं चल रहा था। बीच-बीच में एक से बढ़कर एक ‘टॉप मॉडल’ शिगूफे निकल रहे थे। कुछ लोग इन गतिविधियों से भीतर-ही-भीतर जल रहे थे, तो एक वर्ग ऐसा भी था जो ऊपर से मजा लेते हुए खूब मचल रहा था। कार्यालय जिन अच्छे कार्यों और उपलब्धियों के लिए जाना जाता था, उन्हीं के माथे पर अब कलंक का ठीकरा फूट पड़ा था। परिणामस्वरूप एक वर्ग भीतर से पूरी तरह टूट चुका था।
नई नियुक्तियों के बाद जब भरभराकर कर्मचारियों की फौज कार्यालय के प्रांगण में आ पहुँची, उसके बाद कार्यालय के माथे पर बदनामी का ऐसा डंक लगा कि उसकी आंच से पूरा माहौल खलबला उठा।
फिर वार्षिकोत्सव मनाने का समय आया। परंपरा के अनुसार कार्यक्रम से लगभग एक सप्ताह पहले ही आगंतुकों को निमंत्रण-पत्र भेज दिए जाते थे। लेकिन इस बार एक दिन शेष रह गया और निमंत्रण-पत्र का कहीं अता-पता नहीं था। बस, अब केवल एक दिन की मोहलत थी।
कार्यालय की ओर से अपेक्षित सम्मान न मिलने से पेंशनर संगठन के भीतर एक अलग ही जज्बा और जोश पैदा हो गया। फिर क्या था! हम लोगों ने आनन-फानन में ही सही, लेकिन व्यापक स्तर पर सभी को इसकी जानकारी दी। लोगों को समझाया और इस वार्षिकोत्सव की परंपरा को टूटने से बचाने के लिए कमर कस ली। 
आखिर जिस परंपरा के बदौलत हमारी पहचान बनी है, उससे पिंड छुड़ाना हमें कतई शोभा नहीं देता।हम उससे कैसे वंचित रह सकते थेएजो कभी हमारे अपने कर्मक्षेत्र की पहचान हुआ करती थी?
हालात देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था कि यदि यही स्थिति रही तो संगठन का मनोबल टूट जाएगा। बीच-बीच में ऐसी आवाजें भी उठने लगी थीं। लेकिन हम सबने मिलकर अल्प समय में ही मोर्चा संभाल लिया। बंदूक की गोली की तरह छूटते हुए समय का सदुपयोग किया और देखते-ही-देखते किला फतेह कर लिया।
समय से पहले सारे कार्य व्यवस्थित कर लिए गए और अगले दिन वार्षिकोत्सव मनाने के लिए हम दोगुने उत्साह के साथ जुट गए।
और आखिरकार कार्यक्रम बेहद सफल रहा।
यह सफलता केवल एक कार्यक्रम की सफलता नहीं थी, बल्कि उस परंपरा और उस आत्म-सम्मान की जीत थी, जिसे हम किसी भी कीमत पर टूटने नहीं देना चाहते थे। उन लोगों के मुंह पर भी मानो एक करारा तमाचा था, जो यह मान बैठे थे कि अब इस संगठन का मनोबल टूट जाएगा और इसकी प्रासंगिकता समाप्त हो जाएगी, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम ने एक कड़वी सच्चाई पर भी सोचने के लिए विवश कर दिया।
ऐसा प्रतीत होता है कि जीवन के आखिरी मोड़ पर पहुंच चुके लोगों से नाता जोड़ने या तोड़ने से शायद किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। जिन लोगों ने कभी अपनी पूरी जवानी और ज़िंदगी कार्यालय के नाम कर दी, उनके लिए आज शायद इतना ही काफी है कि वे अब सेवानिवृत्त हैं।
मानो अब वे उस पुराने सामान की तरह हैं, जिसे डस्टबिन में डालने का समय आ गया हो।
लेकिन कौन जानता है कि जिस लम्हे को हम बेकार समझकर किनारे कर रहे हैं, वही कल हमारी जरूरत बन जाए?
आखिर ज़िंदगी भी तो एक सफर है।
न जाने किसकी गाड़ी कब छूट जाए और किस स्टेशन पर किससे नाता टूट जाए।
इसलिए किसी के वर्तमान को देखकर उसके अतीत की कीमत कम नहीं करनी चाहिए। क्योंकि आज जो व्यक्ति सेवानिवृत्त होकर किनारे खड़ा है, कभी उसी ने अपने श्रम, अनुभव और समर्पण से उस संस्था की नींव मजबूत की थी।
रिश्ते पद से नहीं, योगदान से बनते हैं। और किसी की सेवा समाप्त हो सकती है, लेकिन उसके योगदान का मूल्य कभी समाप्त नहीं होता।
-मो. 8329680650

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