‘भूतिया कणों’ और ‘दर्पणी छवि’ ने मारी बाजी भौतिकी-रसायन नोबेल पुरस्कार-2026
इस वर्ष के भौतिकी नोबेल पुरस्कार की खास बात यह रही कि इससे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के तीन पीएचडी शोधार्थी- अनुज कुमार उपाध्याय, गोपाल गर्ग व कृष्णमूर्ति जयकुमार का भी गहरा संबंध है। ये तीनों ही प्रतिष्ठित आइसक्यूब परियोजना के सदस्य हैं, जिसके प्रमुख व वैचारिक वास्तुकार प्रोफेसर फ्रांसिस हाल्जेन को साल 2026 के भौतिकी नोबेल पुरस्कार के लिए चुना गया है। ज़ाहिर है, हाल्जेन की इस कामयाबी से एएमयू के न्यूट्रिनो भौतिकी शोध से जुड़े इस सहयोग को भी विशेष पहचान मिली है। दूसरी ओर रॉयल स्वीडिश अकादमी ऑफ़ साइंसेज ने इस वर्ष का रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार फ्रांस के वैज्ञानिक हेनरी बी कागन और जापानी वैज्ञानिक केन्सो सोआई को संयुक्त रूप से देने की घोषणा की है। असिमेट्रिक आर्गेनिक सिंथेसिस में नॉन-लीनियर प्रभावों और ऑटोकटैलिसीस की खोज के लिए यह सम्मान मिला है। असिमेट्रिक ‘मिरर इमेज’ मोलिक्यूल्स की पहेली लम्बे समय से अनसुलझी थी, जबकि फर्मास्यूटिकल निर्माण में इसका बहुत अधिक महत्व है। 95 वर्षीय कागन नोबेल पुरस्कार जीतने वाले तीसरे सबसे बुजुर्ग व्यक्ति हैं। 76 वर्षीय सोओई का कहना है, ‘यह मेरे जीवन का सबसे अच्छा दिन है। मुझे खुशी है कि मैं यह पुरस्कार प्रो. हेनरी कागन के साथ साझा कर रहा हूं।’
गौरतलब है कि प्रो. हाल्जेन की दूरदर्शी सोच के कारण ही खगोल विज्ञान के क्षेत्र में एक नयी शाखा ‘न्यूट्रिनो खगोल विज्ञान’ की नींव रखी गई। उन्होंने दक्षिणी ध्रुव के नीचे मौजूद विशाल हिमनद बर्फ को न्यूट्रिनो जैसे सूक्ष्म उप-परमाणिवक कणों के प्राकृतिक संसूचक के रूप में उपयोग करने की परिकल्पना की थी। इसी अवधारणा से आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला विकसित हुई, जिसने दूरस्थ ब्रह्मांड से आने वाले न्यूट्रिनो का पता लगाने और उनका अध्ययन करने की नयी राह खोली। गौरतलब है कि अंटार्टिका के भौगोलिक दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ की गहराई में निर्मित आइसक्यूब वेधशाला उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो के अध्ययन के लिए दुनिया की प्रमुख वैज्ञानिक सुविधाओं में शामिल है। इसके निर्माण की शुरुआत तकरीबन 17 साल पहले हुई थी और यह एक दशक से अधिक समय से डाटा एकत्र कर रही है। आइसक्यूब के डाटा के विश्लेषण से आकाशगंगा के बाहर से आने वाले उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो के प्रवाह का अध्ययन मुमकिन हो सका है। शोधकर्ताओं ने इनके संभावित स्रोतों की पहचान के सिलसिले में भी महत्वपूर्ण सफलता अर्जित की है। संकेत कुछ सक्रिय आकाशगंगाओं में अति विशाल ब्लैक होल के आसपास मौजूद घने क्षेत्रों की ओर इशारा करते हैं, जिन्हें शक्तिशाली ब्रह्मांडीय त्वरक माना जा रहा है। एएमयू में भौतिकी विभाग के अध्यक्ष व न्यूट्रिनो भौतिकी विशेषज्ञ प्रो. मुहम्मद सज्जाद अतहर के मार्गदर्शन में ही अनुज, गोपाल व कृष्णमूर्ति शोध कार्य कर रहे हैं। अपने शोधार्थियों की उपलब्धि की सरहाना करते हुए प्रो. अतहर का कहना है कि यह सम्मान एएमयू के न्यूट्रिनो भौतिकी कार्यक्रम के लिए विशेष महत्व रखता है। इसके अतिरिक्त यह आधुनिक कण भौतिकी के महत्वपूर्ण क्षेत्रों में विश्वविद्यालय की निरंतर भागीदारी को भी रेखांकित करता है।
बेल्जियम-अमेरिकन वैज्ञानिक हाल्जेन, जो इस समय 82 वर्ष के हैं, ने 1988 में सबसे पहले यह प्रस्ताव रखा था कि दक्षिण ध्रुव पर जो शुद्ध बर्फ है, उसका प्रयोग करके उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो या ‘घोस्ट पार्टिकल्स’ (भूतिया कण) को पकड़ा जा सकता है, जो लगभग कभी भी मैटर से इंटरैक्ट नहीं करते हैं। उनका प्रस्ताव ही आइसक्यूब बना, जो 2011 में पूर्ण हुआ। इसमें अंटार्टिक बर्फ की एक क्यूबिक किलोमीटर भरी हुई है, जिसकी गहराई 2,500 मी तक पहुंचती है और 5,000 से अधिक सेंसर प्रतिदिन लगभग एक उच्च-ऊर्जा न्यूट्रिनो को रिकॉर्ड करते हैं। जब 2014 में स्मिथसोनियन पत्रिका ने अपना एक इन्जेंन्यूटी अवार्ड हाल्जेन को प्रदान किया तो उन्हें ‘न्यूट्रिनो मैन’ के नाम से संबोधित किया गया। बहरहाल, आइसक्यूब से मालूम हुआ है कि उच्च-ऊर्जा वाले न्यूट्रिनो आकाशगंगा के अंदर से भी आते हैं और बहुत दूर बाहर से भी। इस खोज से शुरू हुई इनके पीछे की कॉस्मिक स्रोतों की तलाश, जैसे तारों का विस्फोट, गामा-किरणों का फटना और ब्लैक होल्स व न्यूट्रॉन स्टार्स से संबंधित घटनाएं। आइसक्यूब ने 2018 में पहली बार एक विशिष्ट स्रोत का पता लगाया- ब्लाज़र। हाल्जेन का कहना है कि उनके कार्य के मुख्य फलों का देखा जाना अभी शेष है और उससे यूनिवर्स के बार में क्या कुछ ज़ाहिर होगा के बारे में अभी कुछ कहना जल्दबाज़ी होगी। उन्होंने कहा, ‘असल उत्साह तो यह है कि अभी मैं इस प्रश्न का उत्तर नहीं दे सकता। यह तो विज्ञान का परिचय मात्र है, एस्ट्रोनॉमी (खगोलशास्त्र) का आना तो अभी शेष है।’ ‘पूत के पांव पालने में दिखायी दे जाते हैं’ की युक्ति के आधार पर अगर अंदाज़ा लगाया जाये तो न्यूट्रिनो धर्म, दर्शन, अध्यात्म आदि को बेकार का फलसफ़ा बना देगा।
बहरहाल, फ्रेंच वैज्ञानिक कागन को रसायनशास्त्र का नोबेल पुरस्कार बहुत पहले मिल जाना चाहिए था; क्योंकि उनका कार्य बहुत प्रभावी रहा है। वर्ष 2001 में जब उन्हें अनदेखा कर दिया गया था, तो फ्रांस के शोध मंत्री ने इस बारे में नोबेल फाउंडेशन से शिकायत भी की थी। अब उनके कार्य को संक्षेप में समझने का प्रयास करते हैं। जीवन के अस्तित्व के लिए आवश्यक बहुत से मोलिक्यूल्स दो रूपों में मौजूद रहते हैं, जो एक दूसरे की ‘मिरर इमेज’ (दर्पण छवि) होते हैं, जैसे हमारा दायां व बायां हाथ। इसके बावजूद जीवित प्राणी लगभग एक्स्क्लूसिवली केवल एक रूप का ही प्रयोग करते हैं। इस फेनोमेनन को ‘होमोशिरेलिटी’ कहते हैं, जोकि यूनानी में हाथ के लिए इस्तेमाल किये जाने वाले शब्द से बना है। केवल एक रूप का प्रयोग क्यों किया जाता है? यह पहेली रसायनशास्त्रियों को एक सदी से भी अधिक से परेशान किये हुए थी, सुलझ नहीं रही थी।
इस पहेली का हल कागन ने निकाला। नॉन-लीनियर प्रभाव के तहत कागन ने यह साबित किया कि जब किसी रासायनिक अभिक्रिया में उत्प्रेरक के थोड़े से हिस्से में असंतुलन होता है, तो उसका अंतिम परिणाम अपेक्षा से कहीं अधिक एक ही दिशा (एक विशिष्ट दर्पण छवि) में बदल जाता है। जबकि जापानी वैज्ञानिक सोआई ने ऑटोकटैलिसीस एंड सोआई रिएक्शन की खोज करते हुए बताया कि एक अणु ख़ुद को ही उत्प्रेरक की मुद्रा में लेकर बड़ी मात्रा में अणु बनाने लगता है। मामूली सी असमानता से शुरू होकर यह प्रक्रिया लगभग 100 प्रतिशत एक ही प्रकार के अणु निर्मित कर देती है। कहने का अर्थ यह है कि रासायनिक क्रिया से एक अणु की दर्पण छवि बनायी जा सकती है और यह दवा बनाने वालों के लिए बहुत लाभकारी हो सकती है। ड्रग के बायें हाथ रूप का एक प्रभाव पड़ सकता है और दायें हाथ रूप का अन्य प्रभाव पड़ सकता है। फिर इस तरह अपनी पसंद की दवा बनाने के लिए तरीकेकार की भी ज़रूरत होगी। ज़ाहिर है इन तरीकों को विकसित करने में कागन व सोआई की खोजें बहुत लाभकारी होंगीं। ध्यान रहे कि पहेली को हल करने की पहली कड़ी पास्चर ने दी थी, जिसकी नींव पर यह इमारत खड़ी की गई है। अ़फसोस! पास्चर का निधन पहले नोबेल पुरस्कार (1901) के वितरण से कुछ वर्ष पहले हो गया था।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

