धरनास्थल के रूप में उभार और तालाबंदी तक का स़फर

जब लोगों के बोलने और सुनने की शक्ति, सत्ता के रहमो-करम पर होने लगे तो उस समय एक ‘स्थान’ पर इकट्ठा हुई कुछ आवाज़ों का ‘शोर’ पुन: यह विश्वास पैदा करता है कि निज़ाम को चुनौती देने वाला कोई है और लोकतंत्र जीवित है।
आज़ाद भारत में पिछले कुछ दशकों से आवाज़ों के इस ‘शोर’ के लिए जो एक स्थान निश्चित किया गया था, उसका नाम जंतर-मंतर है। कई प्रदर्शनों के साक्षी रहे जंतर-मंतर पर अभी केन्द्र सरकार ने प्रदर्शन करने पर पाबंदी लगा दी है। केन्द्र का यह फैसला सोमवार को उस समय आया जब लोकसभा में विपक्षी दल के नेता राहुल गांधी करीब 19 पार्टियों के प्रवक्ताओं के साथ मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने के लिए लोकतंत्र बचाओ मार्च निकाल रहे थे।
अंतत: यह जंतर-मंतर क्या है, आज़ाद भारत में इसकी भूमिका क्या, और क्यों है, और जंतर-मंतर को प्रदर्शनों से अलग करने के क्या अर्थ हैं? इन सभी सवालों के जवाब को कुछ निकट होकर देखते हैं।
क्या है जंतर-मंतर
जंतर-मंतर 200 वर्ष पहले भारत में साईंस की तरक्की की मिसाल है। इसका निर्माण 1724 में महाराजा जय सिंह द्वितीय ने करवाया था। जंतर-मंतर वास्तव में अंतरिक्ष, तारों और ग्रहों का अध्ययन करने के लिए एक प्रयोगशाला है, जिसको अंग्रेज़ी में ्नह्यह्लह्म्शठ्ठशद्वद्बष्ड्डद्य शड्ढह्यद्गह्म्1ड्डह्लशह्म्4 कहा जाता है। विज्ञान और ज्योतिष शास्त्र के प्रेमी महाराजा जय सिंह ने दिल्ली के अलावा जयपुर, उज्जैन और वाराणसी में भी ऐसी प्रयोगशालाओं का निर्माण करवाया था। इनमें ग्रहों की गति मापने के लिए अलग-अलग तरह के उपकरण भी लगाए गए। इनमें से जयपुर जंतर-मंतर के यत्न ही पूरी तरह से सही स्थिति में हैं। मथुरा की प्रयोगशाला 1940 के आस-पास नष्ट हो चुकी है। दिल्ली के जंतर-मंतर के आस-पास बड़ी-बड़ी इमारतें बनने के कारण आज इसके अध्ययन सही परिणाम नहीं दे पा रहे।
जंतर-मंतर कैसे बना प्रदर्शन वाला स्थान
विज्ञान और ज्योतिष शास्त्र से दूर दिल्ली के जंतर-मंतर की एक और पहचान रही है, वह है प्रयोगशाला की पिछली सड़क और उसके आस-पास का इलाका। इन सड़कों से समय की सरकार के खिलाफ उठने वाली आवाज़ें ही पिछले करीब कई दशकों से जंतर-मंतर की असल पहचान बन गई हैं। इस प्रदर्शन स्थल पर कभी लोग भूख-हड़ताल करके अपने हक की मांग करते हैं और कभी नारों के साथ सरकार से जवाबदेही की मांग करते हैं। इस स्थान के बारे में यह भी कहा जाता है कि जंतर-मंतर कभी अकेला नहीं होता। यहां एक इन्सान की आवाज़ भी कुछ दूर स्थित सत्ता के केन्द्र ‘संसद भवन’ तक उतनी ही बुलंदी के साथ पहुंचती है, जितनी कि एक पूरे समूह की आवाज़। जंतर-मंतर पर सवाल तब अपना सिर उठाते हैं, जब सत्ता जवाब देने से मुकर जाती है।
परन्तु क्या स्वतंत्र भारत के शुरुआती वर्षों से ही जंतर-मंतर धरनों का स्थान बना हुआ है? तो इसका जवाब ना है। पहले विरोध प्रदर्शनों का मंच संसद भवन के और नज़दीक होता था— संसद भवन के सामने बने राजपथ (अब कर्त्तव्य पथ) जहां गणतंत्र दिवस की परेड निकलती है, के पास बोट क्लब का मैदान। 1960 से 1980 तक बोट क्लब ही भारत का प्रदर्शन-स्थल बना रहा। अक्तूबर 1988 में किसान नेता महिन्द्र सिंह टिकैत के नेतृत्व में करीब 5 लाख किसानों, जिनमें से ज्यादातर पश्चिमी उत्तर प्रदेश से थे, ने दिल्ली के बोट क्लब में डेरे लगाए। गन्ने की कीमतें, बिजली और पानी का बकाया रद्द करने सहित 35 मांगों के समर्थन में किसानों के करीब एक सप्ताह तक विजय चौक से इंडिया गेट तक पूरा मार्ग जाम कर दिया। अंतत: केन्द्र को किसानों की मांगों के आगे झुकना पड़ा, जिसके बाद प्रदर्शन खत्म हुआ।
1990 से तीन वर्षों के बाद एक अन्य बड़ी घटना हुई, जिसने दोबारा दिल्ली को हिला दिया। 1993 में बाबरी मस्जिद गिराने के बाद प्रदर्शनों का सिलसिला बोट क्लब से हटता हुआ जंतर-मंतर तक पहुंच गया। जंतर-मंतर से आवाज़ों की ललकार बोट क्लब जितनी तीखी तो नहीं परन्तु आवाज़ सत्ता के कानों कर पहुंचती ज़रूर है। संसद भवन से करीब 500 मीटर की दूरी पर स्थित जंतर-मंतर उस समय से ही प्रदर्शन-स्थल के रूप में उभरा।
विपक्षी पार्टियों द्वारा जंतर-मंतर से संसद भवन तक के मार्च का ऐलान ही केन्द्र को ‘़खबरदार’ करने के संदेश का काम करता। हालांकि जंतर-मंतर पर प्रदर्शन भी नियमों के साथ होते हैं। इसके लिए पुलिस से इजाज़त लेना, 15 दिन पहले जानकारी देना आदि शामिल थे। इन संदेशों को और व्यवस्थित ढंग से बनाने हेतु संसद के निचले सदन में 2015 को सरकार ने बताया कि जंतर-मंतर पर पांच हज़ार से अधिक लोग इकट्ठा नहीं होने चाहिएं और वहां प्रदर्शकारियों को वाहन लाने की इजाज़त नहीं दी जानी चाहिए। इसके अलावा ज्यादा संख्या में प्रदर्शनकारियों हेतु रामलीला मैदान बताया गया और पांच हज़ार से अधिक लोगों के लिए लुहाड़ी मैदान का नाम बताया गया। साथ ही यह भी कहा गया कि सरकार को ज्ञापन देने के लिए सिर्फ 3 से 4 प्रवक्ता ही शामिल हो सकते हैं।
प्रसिद्ध धरने प्रदर्शन
जंतर-मंतर वैसे तो प्रदर्शनों के लिए पनाहगार माना जाता रहा है परन्तु कुछ धरनों ने स्वतंत्र भारत के इतिहास में अपनी मज़बूत मौजूदगी दर्ज करवाई है। उनमें 1990 के दशक में हुआ ‘नर्मदा बचाओ आंदोलन’ शुरुआती मील का पत्थर था। सामाजिक कार्यकर्ता मेधा पाटकर के नेतृत्व में हुए इस प्रदर्शन में बड़े-छोटे डैमों के कारण डूब रहे गांवों और उजड़े लोगों का दर्द था जिनका पुनर्वास तरक्की के किसी भी आंकड़ों में शामिल नहीं था।
2011 में हुए अन्ना हज़ारे आंदोलन ने न सिर्फ सत्ता पक्ष को चुनौती दी बल्कि आंदोलन ने सत्ता का तख्त हिलाते हुए उसको पद से हटाने में भी अहम् भूमिका निभाई। गांधी टोपी पहने भूख-हड़ताल करने वाले अन्ना हज़ारे ने दिल्ली के गलियारों में समग्र क्रांति ला दी और लाखों लोग थालियां खड़काते जंतर-मंतर की तंग गलियों में ही सरकार के खिलाफ नारे लगाते नज़र आए।
अन्ना आंदोलन के बाद अगले ही वर्ष 2012 में दिल्ली में हुए निर्भया कांड ने एक बार फिर लोगों को सड़कों पर निकलने के लिए मजबूर किया। यह राजनीतिक आंदोलन न होकर एक जन-आंदोलन बन गया, जिसमें हर कोई सामूहिक दुष्कर्म का शिकार हुई निर्भया के लिए इन्साफ की मांग कर रहा था। जंतर-मंतर एक बार फिर इस जन-आंदोलन का साक्षी रहा था। इस आंदोलन ने ही सरकार को दुष्कर्म के खिलाफ कानून को और सख्त करने के लिए मजबूर किया।
पूर्व सैनिकों द्वारा ‘वन रैंक वन पैन्शन’ की मांग को लेकर, अध्यापकों द्वारा अपनी नौकरियां पक्की करवाने को लेकर, तमिलनाडू के सूखा पीड़ित किसानों द्वारा अपनी मांगों को लेकर और एल.जी.बी.टी. भाईचारे द्वारा बराबर के अधिकारों की मांगों के लेकर जंतर-मंतर पर विरोध प्रदर्शन किया गया। तीन दशकों में विरोध प्रदर्शनों की सूची को लम्बी सीमा तक झेला है।
हालांकि अक्तूबर 2017 में नैशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने सम्बद्ध इलाकों में रहने वाले लोगों को धरने प्रदर्शनों के कारण होने वाले शोर, प्रदूषण और अन्य समस्याओं को ध्यान में रखते हुए धरने राम लीला मैदान में तबदील करने के आदेश दिए। इस पर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा और सुप्रीम कोर्ट ने धरनों के पक्ष और वहां रहने वाले लोगों के बीच संतुलन बनाने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया, जिससे जंतर-मंतर और धरनों का आपसी राबता कायम रहा।
जुलाई 2026 में कॉकरोच जनता पार्टी द्वारा किए गये आंदोलन में शामिल हुए विद्यार्थियों ने शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान को इस्तीफा देने पर मजबूर किया और अभी मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे को लेकर हुए आंदोलन ने भी ‘चलो जंतर-मंतर’ का नारा बुलंद किया।
क्या है सरकार का आदेश
दिल्ली पुलिस कमिश्नर अनुराग ठाकुर ने 11 अक्तूबर को स्टैंडिंग आर्डर जारी करते हुए कहा कि केन्द्रीय गृह मंत्रालय ने विरोध प्रदर्शनों के लिए अलग स्थान की समीक्षा करने के लिए एक कमेटी का गठन किया था। कमेटी ने रामलीला, बुहाड़ी मैदान और पूर्वी दिल्ली के सी.बी.डी. मैदान को विरोध प्रदर्शनों के लिए नये स्थान नोटीफाई करने की सिफारिश की है।
ये तीनों स्थान दिल्ली के अलग-अलग हिस्सों से दूर नहीं हैं परन्तु सत्ता के केन्द्रीय भवन से बहुत दूर हैं। रामलीला मैदान जंतर-मंतर से करीब 3 किलोमीटर दूर है। बुहाड़ी मैदान जंतर-मंतर से करीब 21 किलोमीटर और सी.बी.डी. मैदान करीब 13 किलोमीटर दूर है।
नई व्यवस्था के तहत अब जंतर-मंतर पर कोई संगठन या समूह प्रदर्शन नहीं कर सकता। यदि कोई भी वहां किसी तरह का प्रदर्शन करता है तो उस पर पुरानी धारा 144 और अब भारतीय न्याय संहिता की धारा 163 के तहत कार्रवाई हो सकती है। सरकारी आदेश के उल्लंघन के तहत दर्ज हुए मामलों में एक माह से 6 माह तक की जेल की सज़ा, जुर्माना या दोनों किये जा सकते हैं। यदि कोई प्रदर्शनकारी हथियारों के साथ पकड़ा जाता है तो सज़ा दो वर्ष तक बढ़ सकती है। पुलिस पर हमला करना ़गैर-ज़मानती जुर्म बनने के कारण उसे 3 से 5 वर्ष तक की जेल की सज़ा हो सकती है।
नए स्थानों पर है परेशानी
रामलीला मैदान, जो कि संसद भवन से सबसे नज़दीक है और जहां पहले भी बड़े समूहों द्वारा प्रदर्शन किए जाते रहे हैं, वहां की बुकिंग और उपलब्धता एक बड़ी चुनौती है। जानकारी के अनुसार रामलीला मैदान में एक दिन की बुकिंग का कुल खर्च 1.21 लाख रुपये है, जिसमें से 55 हज़ार रुपये रिफंड हो जाते हैं। इसके अलावा 2026 में मैदान में जमा होने के लिए सिर्फ 3 तिथियां उपलब्ध हैं-29, 30 और 31 तक।
दूसरा स्थान बुहाड़ी मैदान मैट्रो स्टेशन से करीब डेढ़ किलोमीटर दूर है। इसका क्षेत्रफल 2.10 लाख वर्ग मीटर है, जिसमें छोटे प्रदर्शन गुम ही  हो जाएंगे। हालांकि बुहाड़ी मैदान की बुकिंग के लिए अभी सरकार द्वारा स्टैंडर्ड संचालक अमल (एस.ओ.पी.) जारी नहीं किए गए।
पूर्वी दिल्ली के शाहदरा में स्थित इस मैदान के निकट रिहायशी आबादी बहुत ज्यादा है। फिलहाल यह स्थान लोगों द्वारा इकट्ठे समय बिताने, सुबह की सैर और खेलने के लिए प्रयोग किया जाता है।
हम जंतर-मंतर लेकर रहेंगे
सरकार ने चाहे जंतर-मंतर पर प्रदर्शनों के लिए तालाबंदी कर दी है परन्तु पिछले सप्ताह-दस दिनों से प्रदर्शनों का गढ़ बनी दिल्ली, राजनीतिक विरोधी, सिविल सोसायटी के सदस्य और विद्यार्थी संगठन इस फैसले को मानने से इंकार कर रहे हैं। प्रदर्शनकारियों की सूचि में अब एक मुख्य मुद्दा जंतर-मंतर को वापिस लेने का भी है।
बेचैन, निराश और सिस्टम से परेशान आवाज़ों की तीन दशकों से पनाहगार बना जंतर-मंतर दोबारा अपना पुराना अस्तित्व पाने में कामयाब होता है या नहीं, यह सवाल अभी समय के गर्भ में से अपना जवाब तलाश कर रहा है।
-मो. 099101-88350

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