अंडमान-निकोबार का कोकोनट कार्नीवाल
समुद्र के बीच में बसे द्वीपों की अपनी एक अलग भाषा होती है। यहां की हवा में नमक घुला होता है। रास्तों के किनारे झूमते नारियल के पेड़ किसी स्वागत द्वार की तरह लगते हैं और दूर तक फैला नीला पानी अचानक यह एहसास करा देता है कि भारत की भौगोलिक कहानी सिर्फ पहाड़ों, मैदानों और रेगिस्तान तक ही सीमित नहीं है। अंडमान-निकोबार पहुंचकर नज़र जब नारियल के पेड़ों पर ठहरती है, तो समझ में आता है कि नारियल महज एक फल या पेड़ नहीं बल्कि रोजमर्रा की ज़िंदगी, खानपान और स्थानीय अर्थव्यवस्था का हिस्सा है। इस रिश्ते को उत्सव में बदल देता है, यहां का कोकोनट कार्निवाल, जो इस साल 17 से 18 अक्तूबर 2026 को आयोजित होगा।
हर साल अक्तूबर माह में आयोजित होने वाला यह कार्निवाल विशेषकर घुमक्कड़ों के लिए लॉटरी खुलने जैसा होता है। क्याेंकि इस मौके पर देश के दूसरे हिस्सों से आने वाले पर्यटक देखते हैं कि यह पारंपरिक मेला, अपना एक अलग ही चुंबकीय आकर्षण रखता है। इस मौके पर यहां आने वाले पर्यटकों को इन द्वीपों की असली जीवनशैली को करीब से देखने का मौका मिलता है। नारियल से बने खाद्य पदार्थ, स्थानीय उत्पाद, हस्तशिल्प, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और स्थानीय स्वाद सब मिलकर इसे सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं बल्कि अंडमान की सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान की झलक बना देते हैं। सैलानियों के लिए किसी जगह की असली खूबसूरती उसके प्रसिद्ध पर्यटन स्थलों से आगे शुरु होती है। समुद्र तटों की तस्वीरें तो हर पर्यटक खींचता है, लेकिन उन समुद्र तटों के आसपास रहने वाले लोगों का जीवन कैसा है, वे क्या खाते हैं, क्या बनाते हैं और अपनी प्राकृतिक संपदा को किस तरह देखते हैं? इस सबको जानना यात्रा को एक महाकाव्यीय अनुभव बना देता है।
कोकोनट कार्निवाल इस अनुभव की खिड़की देश-विदेश से आये पर्यटकों के लिए खोलता है। यहां पहुंचकर लोगों को पता चलता है कि नारियल सिर्फ मंदिर में चढ़ाने या कुछ मिठाईयों में इस्तेमाल होने तक सीमित नहीं है। इसकी उपयोगिता की बहुत लंबी-चौड़ी कहानी है। इसका पानी हमारी प्यास बुझाता है। इसकी गिरी हमारे भोजन का महत्वपूर्ण हिस्सा बनती है। इसका तेल खानपान से लेकर दूसरे घरेलू कामों में इस्तेमाल होता है, जबकि इसकी जटा और खोल से कई तरह के उपयोगी उत्पाद बनाये जाते हैं। द्वीपों में इसकी मौजूदगी इतनी स्वाभाविक है कि पर्यटक को शायद पहली नज़र में इसकी आर्थिक और सांस्कृतिक भूमिका का अंदाजा भी न हो। कार्निवाल इसी रोजमर्रा की चीज को उत्सव के केन्द्र में लाकर बेचने का नजरिया देता है। इस कार्निवाल की एक और खूबी है, वह है, यहां के लजीज स्वाद की। अंडमान की यात्रा समुद्र के स्वाद के बिना अधूरी लगती है। स्थानीय भोजन में कई तरह के समुद्री खाद्य पदार्थों के साथ नारियल की संगति यहां देखते ही बनती है। नारियल आधारित चटनियां, करी और दूसरे स्थानीय व्यंजन यहां आने वाले पर्यटकों को उस स्वाद से परिचय कराते हैं, जो किसी होटल के सामान्य मेन्यू में नहीं मिलता। शाकाहारी यात्रियों के लिए भी यहां नारियल आधारित व्यंजनों की अपनी भरीपूरी दुनिया है।
कुल मिलाकर अंडमान-निकोबार कार्निवाल खानपान के जरिये भी सैलानियों के सामने स्थानीय संस्कृति परोसता है। यहां की संस्कृति के विविध आयाम हैं, जो सदियों से रह रहे यहां के अनेक समुदायों की परंपराओं से मिलकर बनी है। स्थानीय संगीत और नृत्य, हस्तशिल्प तथा रोजमर्रा के जीवन से जुड़े उत्पाद, इस बात का एहसास कराते हैं कि द्वीपों की संस्कृति मुख्य भूमि से अलग होते हुए भी उसमें भारत की विविधता के चटख रंग घुले हुए हैं। यही कारण है कि कोकोनट कार्निवाल को पर्यटन की दृष्टि से भी समझना चाहिए। जब कोई पर्यटक स्थानीय उत्पाद खरीदता है, स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेता है या स्थानीय कलाकारों की प्रस्तुतियां देखता है, तो इससे यहां की स्थानीय व्यवस्था को कई तरह से लाभ पहुंचता है। इस तरह उत्सव पर्यटन को केवल होटल्स और दर्शनीय स्थलों तक सीमित रखने की बजाय उसे स्थानीय समुदायों से जोड़ देता है। वैसे भी आज का सैलानी सिर्फ किसी मशहूर चीज को देखनेभर नहीं जाता बल्कि वहां जाकर उसे एहसास करना चाहता है। कोकोनट कार्निवाल इस सवाल का जवाब- यहां के नीले समुद्र, नारियल, संगीत, भोजन और स्थानीय जीवन के जरिये देता है।
अंडमान जाने वाले पर्यटकों के लिए यह आयोजन एक और कारण से आकर्षक बन जाता है। समुद्र तटों और जल क्रीड़ाओं के बीच यात्रा में संस्कृति का एक पड़ाव जुड़ जाता है। सुबह समुद्र के किनारे सूर्योदय, दिन में द्वीपों की सैर और स्थानीय बाज़ारों की खोज तथा शाम को सांस्कृतिक कार्यक्रमों का अनुभव। कोकोनट कार्निवाल के समय यहां आने वाले पर्यटक अपनी आंखों में सिर्फ अंडमान-निकोबार द्वीप की खूबसूरती ही नहीं ले जाते बल्कि इस सांस्कृतिक अनुभव को भी ले जाते हैं, जो जीवनभर उनके मन में यहां की याद ताजा बनाये रखता है। हालांकि किसी भी द्वीप पर्यटन की तरह यहां भी जिम्मेदाराना पर्यटन बहुत ज़रूरी है। अंडमान-निकोबार के समुद्र तट इसलिए भी लोगों को आकर्षित करते हैं, क्योंकि ये साफ-सुथरे हैं। ऐसे में यह पर्यटकों की जिम्मेदारी भी बनती है कि ये साफ-सुथरे समुद्र तट बाकी सैलानियों के लिए भी ऐसे ही बने रहें। इसलिए प्लास्टिक कचरा न फैलाना, समुद्री और तटीय पारिस्थितिकी का सम्मान करना, स्थानीय समुदायों और उनकी परंपराओं की तस्वीर या वीडियो लेने से पहले अनुमति लेना, स्थानीय उत्पादों को प्राथमिकता देना। भले ये छोटी बातें लगती हों, लेकिन संवेदनशील द्वीपों के लिए इनका बड़ा महत्व है। -इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर




