यमन की जंग से पश्चिम एशिया में गहराता संकट

खाड़ी में अशांति के बादल एक बार फिर मंडरा रहे हैं। इस बार इसका केंद्र यमन का आंतरिक सत्ता संघर्ष है। इसकी आंच सऊदी अरब तक पहुंची, जहां हूती विद्रोहियों के हवाई अड्डों पर हमलों में एक भारतीय समेत कई लोगों की जान गई। इसके जवाब में सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने राजधानी सना सहित हूतियों के कब्जे वाले इलाकों में हवाई हमले किए। इससे संघर्ष के व्यापक होने की आशंका बढ़ गई है। अमरीका के संभावित हस्तक्षेप को रोकने के लिए ईरान ने मध्यस्थता का दांव चला है। उसका कहना है कि खाड़ी का मामला आपस में सुलझाया जाना चाहिए, बाहरी शक्तियों को प्रवेश नहीं दिया जाए।
दरअसल, यमन में हूती विद्रोहियों और सरकार के बीच लड़ाई विस्फोटक कगार पर पहुंच चुकी है। गत 10 अक्तूबर को रियाद हवाई अड्डे पर हूतियों के हमले में एक भारतीय समेत 13 लोगों की मौत हुई और 300 से ज्यादा घायल हुए। अगले दिन दमम हवाई अड्डे पर भी हमला हुआ। इन हमलों का दुनिया भर में कड़ा विरोध हुआ है। भारत ने भी हमले तुरंत रोकने की अपील की है।
हूती हमलों और सऊदी अरब की जवाबी कार्रवाई से पूरे पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ गया है। आशंका है कि यमन में सत्ता की लड़ाई खाड़ी में युद्ध की ज्वाला भड़का सकती है। खासतौर से अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने जिस तरह से हस्तक्षेप करने और सऊदी अरब का साथ देने की बात कही है। सऊदी अरब खाड़ी में अमरीका का भरोसेमंद दोस्त रहा है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि ईरान इस नए तनाव में अमरीका का दखल नहीं चाहता। 
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक हूती विद्रोहियों और यमन की सऊदी समर्थित सरकार के बीच सैन्य संघर्ष में अगस्त से 46 से अधिक नागरिक मारे गए हैं। संयुक्त राष्ट्र के विशेष दूत हैंस ग्रुंडबर्ग ने चेतावनी दी है कि यमन में फिर पूर्ण युद्ध शुरू हो सकता है, जो पूरे इलाके को अशांति में धकेल देगा। इसके मूल में यमन और पश्चिम एशिया में शक्ति संतुलन का संघर्ष है।
सऊदी अरब खाड़ी के सबसे संपन्न और ताकतवर देशों में से एक है। वह इज़रायल से कूटनीतिक रिश्ता न होने के बावजूद दोस्ताना व्यवहार रखता है और ईरान को भी पसंद नहीं करता। पश्चिम एशिया में वह अमरीका का करीबी सहयोगी है। ऐसे में ईरान की मध्यस्थता का प्रस्ताव काफी अलग वज़न रखता है। इस संघर्ष का दूसरा पहलू यह है कि यमन की राजधानी सना, जहां हूतियों का 2014 से कब्ज़ा है, उसे वापस लेने के लिए यमन सरकार ने बड़े सैन्य ऑपरेशन की घोषणा की है। सऊदी गठबंधन ने भी 13 अक्तूबर को सना सहित कई इलाकों में हवाई हमले किए। इन हमलों ने 2023 में शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए बनी सहमति को संकट में डाल दिया है। हूतियों ने सऊदी अरब को इसलिए निशाने पर लिया क्योंकि वह यमन सरकार को सैन्य मदद दे रहा है। हूती इन हमलों को अंतर्राष्ट्रीय समझौतों का उल्लंघन बताते हैं।
यमन की स्थिति पेचीदा है। राजधानी सना सहित उत्तर-पश्चिमी इलाके में हूतियों का कब्ज़ा है। वे ईरान के करीबी माने जाते हैं जबकि अंतर्राष्ट्रीय मान्यता प्राप्त सरकार के प्रमुख रशाद अल-अलीमी हैं और उन्हें सऊदी अरब का समर्थन प्राप्त है। अब लड़ाई इलाके पर कब्ज़े तक सीमित नहीं रही, बल्कि इसमें लाल सागर के समुद्री व्यापार रास्तों की सुरक्षा और नियंत्रण का सवाल भी जुड़ गया है।
सऊदी नेतृत्व वाले गठबंधन ने 9 अक्तूबर को हूतियों के तीन रॉकेट लॉन्च प्लेटफॉर्म नष्ट करने का दावा किया था। दूसरी ओर हूतियों ने सऊदी अरब के हवाई अड्डों और तेल प्रतिष्ठानों पर हमले जारी रखने की चेतावनी दी है। हूती, जिन्हें अंसार अल्लाह कहा जाता है, ने रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास बड़े क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया था। यह लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है। यहां हूतियों की बढ़त ने अमरीका और सऊदी अरब का खेल बिगाड़ दिया था। हालांकि हाल में यमन की सरकारी सेनाओं ने इस इलाके में बढ़त हासिल की है। इस सारे वार-प्रतिवार के बीच ईरान भू-राजनीति में अपनी कूटनीतिक स्थिति मज़बूत करना चाहता है और अमरीका को इस इलाके से बाहर रखना उसके हित में है। लिहाजा, वह यमन सरकार, हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच मध्यस्थता का इच्छुक है। इस बीच 14 अक्तूबर को हूती राजनीतिक ब्यूरो के मोहम्मद अल-बुखैती ने भी सऊदी अरब से मध्यस्थता के ज़रिए बातचीत का स्वागत किया है। हालांकि उन्होंने सऊदी सैन्य अभियान समाप्त करने और हूतियों के कब्ज़े वाले बंदरगाहों तथा हवाई अड्डों पर लगे प्रतिबंध हटाने की शर्त रखी है। ओमान, रूस और चीन भी बातचीत बहाल कराने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में ईरान की पेशकश को क्षेत्रीय कूटनीति में अपनी भूमिका मज़बूत करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। (एजेंसी)

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