अगर अचानक प्रदर्शन हुआ तो पुलिस क्या करेगी ?
अब जबकि पुलिस ने अपने नागरिकों खास कर युवाओं और छात्रों के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध शुरू कर दिया है तो सवाल है कि इसके आगे क्या होगा? गुरिल्ला युद्ध इसलिए है, क्योंकि पुलिस और प्रदर्शनकारियों में नौ अक्तूबर से ‘तू डाल-डाल, मैं पात-पात का खेल’ चल रहा है। प्रदर्शनकारी रात में कनॉट प्लेस पहुंच कर शौचालयों या दूसरी जगहों पर छिपे थे, जहां से निकल कर वे जंतर-मंतर की ओर बढ़े। पुलिस उन्हें जनपथ पर रोक रही थी तो वे कनॉट प्लेस में इकट्ठा हो रहे थे। उन्हें कनॉट प्लेस में रोका गया तो वे रेलवे स्टेशन पहुंच गए। दक्षिण दिल्ली में प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली हाट में डेरा जमा लिया। निज़ामुद्दीन और उससे आगे लोधी रोड और लोधी गार्डन के पास प्रदर्शनकारी जमे रहे। पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच कई घंटे तक लुका-छिपी का खेल चला। सवाल है कि इस बार तो कॉकरोच जनता पार्टी ने प्रदर्शन का ऐलान कर दिया था, आगे किसी दिन ऐलान न करे और अचानक जंतर-मंतर पहुंच जाए तो क्या होगा? पुलिस की गुरिल्ला तकनीक से ही सीख कर प्रदर्शनकारियों ने अचानक प्रदर्शन (फ्लैश प्रोटेस्ट) कर दिया तो पुलिस क्या करेगी? क्या पुलिस अब स्थायी रूप से जंतर-मंतर को घेरे रहेगी? वहां लोग रहते हैं, संस्थाओं और राजनीतिक पार्टियों के दफ्तर हैं, दुकाने हैं, आने-जाने का रास्ता है। क्या सब कुछ स्थायी रूप से बंद कर दिया जाएगा? कम से कम अभी तो यही लग रहा है कि पुलिस और प्रदर्शनकारियों का टकराव जारी रहेगा।
पुलिस कार्रवाई का अभूतपूर्व दायरा
मीडिया रिपोर्ट में बताया गया कि छात्रों और नौजवानों के प्रदर्शन को नियंत्रित करने के लिए दिल्ली में सुरक्षा बलों करीब 40 हज़ार जवानों की तैनाती की गई थी। इनमें 23 हज़ार के करीब अर्धसैनिक बल तैनात किए गए और दिल्ली पुलिस के 15 हज़ार जवान तैनात थे। लेकिन यह सिर्फ दिल्ली का आंकड़ा है। मीडिया की अलग-अलग रिपोर्ट देखें तो पता चल रहा है कि पुलिस की कार्रवाई का दायरा बहुत बड़ा था। उत्तर प्रदेश और हरियाणा की पुलिस भी अपना काम कर रही थी। अगर पड़ोसी राज्यों की पुलिस की संख्या जोड़ी जाए तो आंकड़ा बहुत बड़ा हो जाएगा और पुलिस की तैयारी का स्तर भी बहुत बड़ा दिखने लगेगा। हरियाणा पुलिस ने दिल्ली के आसपास के इलाकों में गुरुग्राम और फरीदाबाद से लेकर रोहतक और सोनीपत व पानीपत में कांग्रेस पार्टी के नेताओं को घरों से निकलने से रोका। जो नेता पहले छिप कर निकल गए थे, वे दिल्ली पहुंच गए, लेकिन शनिवार को ज्यादातर नेताओं के घरों के बाहर पुलिस बैठा दी गई। विधायक, पूर्व विधायक को छोड़िए सामान्य नेताओं के घरों के बाहर भी पुलिस तैनात रही। यही स्थिति नोएडा और गाज़ियाबाद में दिखी। जिस पैमाने पर दिल्ली में पुलिस की तैनाती की गई उसी अनुपात में दिल्ली से लगती सीमाओं पर पुलिस तैनात की गई और बैरिकेडिंग की गई। सिंघु सीमा से लेकर गाजीपुर, बदरपुर और नोएडा सीमा पर हज़ारों जवान तैनात थे। कम ट्रैफिक होने के बावजूद बैरिकेडिंग और चेकिंग के कारण कई जगह जाम लगा रहा।
मध्य प्रदेश में सत्ता संघर्ष
केंद्रीय कृषि व किसान कल्याण मंत्री और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अपनी पार्टी की राज्य सरकार से ठन गई है। मुख्यमंत्री मोहन यादव के साथ पिछले लंबे समय से चल रहा उनका विवाद अब खुल कर सामने आ गया है। दोनों एक-दूसरे पर निशाना साध रहे हैं। पिछले दिनों जब पार्टी के नए संगठन महामंत्री चंद्रशेखर ने भोपाल में पार्टी नेताओं के साथ बैठक की तब मामला मीडिया में आ गया। उस बैठक में शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि कलेक्टर उनका फोन नहीं उठाते हैं। इस पर चंद्रशेखर ने दोनों समझाया और सारी गुटबाज़ी तीन महीने में खत्म करने को कहा, लेकिन उसके बाद मामला और तेज़ हो गया। मुख्यमंत्री मोहन यादव ने चुनाव जिताने वाली ‘लाडली बहना’ योजना पर ही सवाल उठा दिया। उन्होंने कहा कि इस योजना पर बहुत खर्च हो रहा है और राज्य की वित्तीय हालत बिगड़ रही है। गौरतलब है कि शिवराज सिंह चौहान ने इस योजना की शुरुआत की थी। बहरहाल इसके बाद मामला और आगे बढ़ा, जब शिवराज सिंह चौहान अपने चुनाव क्षेत्र के बुधनी गांव में वन विभाग द्वारा एक दर्जन आदिवासी परिवारों के घर तोड़े जाने के खिलाफ धरने पर बैठ गए। उन्होंने इसे ‘जुल्म की पराकाष्ठा’ कहा। यह पार्टी के भीतर सिर्फ अनुशासन की कमी का मामला नहीं है। यह सत्ता का संघर्ष है। शिवराज सिंह चौहान को भी मुख्यमंत्री रहते हुए उमा भारती और दूसरे नेताओं का ऐसा विरोध झेलना पड़ा था।
क्या आनंदीबेन राज्यपाल बनी रहेंगी?
छह राज्यों के राज्यपाल बदल गए है। दो राज्यपालों का तबादला हुआ है और चार राज्यों में नए राज्यपाल नियुक्त किए गए है। पिछले कई दिनों से राज्यपाल और उप राज्यपाल बदले जाने की चर्चा चल रही थी, लेकिन जिस राज्य में बदलाव की सबसे ज्यादा चर्चा थी वहां बदलाव नहीं हुआ। लगता है कि उत्तर प्रदेश के राजभवन में अभी आनंदीबेन पटेल ही रहेंगी। वह पांच साल से ज्यादा समय से उत्तर प्रदेश की राज्यपाल हैं। उससे पहले दो साल वे मध्य प्रदेश की भी राज्यपाल रह चुकी हैं। गुजरात के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद ही वह राज्यपाल बनी थीं और पिछले सात साल से ज्यादा समय से राज्यपाल हैं। पिछले महीने जब वह लंबी छुट्टी पर गईं तो कहा गया कि अब उनकी विदाई तय हो गई है। उससे पहले उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के क्षेत्र गोरखपुर में जाकर वहां शिक्षा व्यवस्था और यूनिवर्सिटी के हालात पर बहुत तीखी टिप्पणी की थी। उससे भी उनके हटने के कयास लगाए जा रहे थे, लेकिन वह 10 दिन की छुट्टी पर रही और किसी अन्य राज्यपाल को उत्तर प्रदेश का प्रभार नहीं दिया गया। अब चार महीने बाद चुनाव होने वाले हैं। देखना है कि आनंदी बेन पटेल ही चुनाव तक रहती हैं या कोई नया चेहरा लाया जाता है।





