फ्रांस की गड़बड़ के संकेत

दुनिया भर के बड़े हिस्से में फैल रही अशांति ने बड़ी चिंता पैदा कर दी है। एक तरह से अधिकतर क्षेत्र आग का गोला बने नज़र आने लगे हैं। कई हिस्सों में हो रहे भयावह युद्धों ने एक तरह से धरती पर ऐसी थरथराहट पैदा की है, जो आने वाले समय में बड़ी अस्थिरता का संदेश दे रही है। इन युद्धों ने सभी देशों पर किसी न किसी तरह प्रभाव डाला है। खाड़ी देशों में पश्चिम एशिया और विशेष तौर पर खाड़ी देशों में लगे युद्धों ने तेल की कीमतें इस कद्र बढ़ाई है कि दुनिया भर में महंगाई बढ़ रही है। तकनीक और इलैक्ट्रॉनिक दौर ने जहां लोगों को बहुत सारी सुविधाएं दी हैं, वहीं बड़ी हद तक लोगों की रोज़ी रोटी भी छीन ली है। अनिश्चित भविष्य और भी भयानक लगने लगा है। संयुक्त राष्ट्र और बड़ी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाएं इन भयानक होते युद्धों को रोकने में असमर्थ नज़र आ रही हैं। अकेले रूस और यूक्रेन के युद्ध ने यूरोपियन देशों पर हर पक्ष से बड़ा प्रभाव डाला है।
महंगाई और बेरोज़गारी के साथ-साथ शरणार्थियों की भी बड़ी समस्या आ खड़ी हुई है, भारत के लिए भी यह बात चिंता का कारण है कि यूरोपियन देशों में रह रहे लाखों ही भारतीयों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ने की सम्भावना बन रही है। कुछ दिनों से फ्रांस में फैल रहे हिंसक आंदोलन ने एक बार तो वहां की सरकार को हिला कर रख दिया है। फ्रांस का राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों दुनिया के समझदार प्रशासकों में माने जाते हैं परन्तु देश भर में फैली इस हिंसा के कारण वह भी बेहद नाज़ुक स्थिति में आ गए हैं। पहले यह आंदोलन शिक्षण संस्थाओं से शुरू हुआ था। वहां की शिक्षा प्रणाली में बड़ी कमियों के कारण विद्यार्थी सड़कों पर उतरे थे, परन्तु उसके बाद इससे और गम्भीर मामले भी जुड़ने लगे। जन-सेवाओं में आई गिरावट, बढ़ती हुई बेरोज़गारी तथा महंगाई के कारण यह आंदोलन देश की राजधानी पैरिस से शुरू होकर अनेक शहरों में फैल गया है। लाखों आंदोलनकारी सड़कों पर उतर आए हैं। उन्होंने दुकानों की लूट-मार ही नहीं की, अपितु तोड़-फोड़ करने के साथ-साथ उन्हें आग भी लगाई है। सैकड़ों व्यक्तियों की गिरफ्तारी तथा बड़ी संख्या में पुलिस कर्मचारियों के घायल होने से नि:संदेह यह बेहद गम्भीर मामला बन गया है। बात यूरोप के एक देश तक ही सीमित नहीं रही, अपितु पुर्तगाल, इटली, बैल्जियम, स्पेन तथा रूबानिया तक फैल गई है। इन देशों में भी लाखों व्यक्ति सड़कों पर उतर आए हैं। चाहे इन देशों के प्रशासकों ने गैर-ज़िम्मेदार तत्वों को इसके लिए आरोपी ठहराया है और उन्हें कड़ी सज़ाएं देने की बात की है, परन्तु इसके बावजूद यूरोप में हालात सुधरते दिखाई नहीं दे रहे। 
चिन्ता की बात यह भी है कि यदि ऐसी हिंसा से यूरोप नहीं बचा तो अफ्रीका तथा एशिया का क्या हाल होगा? आज एशिया के बहुत-से देश अस्थिर दिखाई दे रहे हैं। वहां तानाशाही मजबूती से अपने पांव जमा रही है। दशकों से ज़्यादातर देशों की आपसी दुश्मनी ने जहां विकास की गति धीमी की है, वहीं करोड़ों लोग गरीबी की ज़द में भी आ चुके हैं। विश्व के सामने आज बेरोज़गारी, गरीबी तथा बढ़ती हुई जनसंख्या के गम्भीर मामले आ खड़े हुए हैं। इन मामलों का समाधान करने के साथ-साथ चल रहे भीषण युद्धों को भी हर हाल में रोकने के लिए एकजुट होकर प्रयास करने होंगे। यदि ऐसा न हो सका तो पहले ही बारूद के ढेर पर बैठी दुनिया का भविष्य और भी अनिश्चित हुआ दिखाई देगा।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द 

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