आज दशहरे पर विशेष
राम के आध्यात्मिक मूल्यों को करें आत्मसारावण पर राम की विजय का प्रतीक है दशहरा पर्व। इस अवसर पर हम राम की जय जयकार करते हैं और रावण को उसकी बुराइयों के कारण जलाने का जश्न मनाते हैं। वर्षों से चली आ रही यह परम्परा आगे भी जारी रहेगी लेकिन बार-बार रावण को जला देने पर भी आज तक रावण रूपी बुराई समाप्त नहीं हो पाई। सच यह है कि रावण तो हम सबके अंदर है, जो विकार रूप में बैठा है। उसे हम हटाना ही नहीं चाहते। हम राम रावण से जुड़े किस्सों को रामायण या फिर राम चरित मानस के माध्यम से मंचित कर उन्हें हर वर्ष याद करते हैं। रामायण के मुख्य पात्र राम, सीता, हनुमान व रावण हैं। रामायण हिंदू धर्म की एक प्रमुख आध्यात्मिक पुस्तक मानी जाती है परन्तु विडम्बना यह है कि रामायण को बार-बार पढ़ने व मंचित करने के बावजूद उसमें लिखे आध्यात्मिक मूल्यों की धारणा नहीं हो पाती। हम राम के नाम रूप पर बहस करते रहते हैं। इससे रामायण रचना की सार्थकता कभी भी सिद्ध नहीं हो सकती। इसके लिए आवश्यक है कि हम रामायण को आत्मसात करें।
रामायण महर्षि वाल्मीकि के द्वारा लिखित एक आध्यात्मिक पुस्तक है। हम यह जानते हैं कि महर्षि वाल्मीकि आध्यात्मिक जागृति के एक प्रेरक नायक थे। ईश्वरीय अनुभूति के द्वारा उनका जीवन दिव्य व महान हो गया था। जो भी ईश्वर की अनुभूति कर लेता है, वह दूसरों का शुभचिंतक हो जाता है व स्वयं की अनुभूतियों को समाज कल्याण हेतु प्रयोग कर लोगों में एक नई सोच फैलाने का कार्य करता है। स्वयं का जीवन आध्यात्मिक होने पर ही महर्षि वाल्मीकि ने समाज में आध्यात्मिक जागृति लाने का बीड़ा उठाया था। मोह माया में फंसे लोगों को आध्यात्मिक ज्ञान रोचक लग सके, इसके लिए उन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान को एक रोचक कथा के रूप में प्रस्तुत किया जिसमें मुख्य नायक व नायिका राम और सीता को रखा गया। जैसे आजकल सरकार या कोई भी समाज सुधारक यदि लोगों को किसी भी बुराई के बारे में जागरूक करना चाहता है तो वह एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म या विज्ञापन के ज़रिए इस संदेश को जन-जन में पहुंचाता है। लघु फिल्म या विज्ञापन में वह किसी ऐसे चेहरे को प्रयोग करेंगे जो लोगों में प्रसिद्ध हो, ताकि लोग उसको आत्मसात करें। महर्षि वाल्मीकि ने त्रेता युग के बाद आए द्वापर युग व उसके बाद आने वाले समय में समाज में आध्यात्मिक क्रांति लाने हेतु राम व सीता के नाम व चरित्र का प्रयोग किया जो त्रेता युग में विश्व में राज्य करके गए थे। विडम्बना इस बात की है कि हम रामायण में लिखित सब पात्रों को उसी तरह से स्वीकार करते हैं जैसे रामायण को पढ़ने पर जान पड़ते, इसलिए कहीं न कहीं रामायण को किसी और परिपेक्ष में देखने की बड़ी आवश्यकता है। रामायण का वास्तविक अर्थ जानने के लिए रामायण के विभिन्न पात्रों को निम्नलिखित रूप में समझा जाना चाहिए।
1. राम : राम वास्तव में निराकार शिव परमात्मा ही हैं, जो संगम युग पर धरा पर अवतरित होकर अपनी बिछड़ी हुई (सतयुगी आत्मा) सीता जी को रावण (विकारों) के चंगुल से छुड़ाने आये हैं।
2. सीता : हर वह आत्मा जो वास्तव में पवित्र है परन्तु आज रावण के चंगुल में फंसने के कारण दुखी और अपवित्र हो गई है।
3. रावण : पतित व विकार युक्त सोच व उसकी धारणा ही रावण है जिसमें फंसी हर आत्मा आज विकारों के बोझ तले दबती जा रही है। पांच मुख्य विकार पुरुष के व पांच मुख्य विकार स्त्री के ही रावण के दस शीश हैं।
4. हनुमान : वास्तव में धरा पर अवतरित हुए परमात्मा को सर्वप्रथम पहचानने वाली आत्मा (ब्रह्मा बाबा) ही हनुमान हैं, परन्तु हर वह आत्मा जो ईश्वर को पहचान कर दूसरी आत्माओं (सीता) को धरा पर आए ईश्वर (राम) का संदेश देने के निमित्त बनती है, वह भी हनुमान की तरह ही है।
5. वानर सेना : साधारण दिखने वाली मनुष्य आत्माएं ईश्वर (राम) को पहचान कर, संस्कार परिवर्तन द्वारा रावण राज्य (पतित सोच पर आधारित दुनिया) को समाप्त करने में राम का साथ देने वाली संसार की 33 करोड़ आत्माएं ही वानर सेना है।
6. लंका : पतित दुनिया जहां हर कार्य देहभान व विकार ग्रसित होकर किया जाता है, वही रावण की नगरी लंका है।
इसलिए आवश्यक है कि हम सबसे पहले अपने अंदर के रावण का खात्मा करने के लिए विकारों का त्याग करें और राम सरीखे गुण धारण कर राम अनुगामी बनें। तभी विजय दशमी यानि दशहरा का पर्व मनाया जाना सार्थक हो सकता है। ऐसे में बार-बार रावण को जलाने की भी ज़रूरत नहीं रहेगी क्योंकि हमारे अंदर का रावण मरते ही बाहरी दुनिया का रावण स्वत: समाप्त हो जाएगा। इस तरह से हम दशहरा के वास्तविक अर्थ को भी समझ सकेंगे और अपने अंदर के रावण को त्याग कर या फिर जला कर राम जैसे गुण धारण कर सकेंगे।
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