एक निर्णायक मोड़ पर है भारतीय राजनीति
राहुल गांधी ने भाजपा सरकार की नींद हराम कर रखी है। पिछले हफ्ते दिल्ली में बाराखंभा रोड से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक विपक्ष की यात्रा ने राहुल को एक नये नेता के तौर स्थापित कर दिया है। कई लोगों ने कहा कि इंदिरा गांधी के बाद पहली बार इतनी बड़ी भीड़ कांग्रेस के लिये इकट्ठा हुई। इस भीड़ ने केवल ये साबित नहीं किया कि वोट चोरी के सवाल पर लोगों का गुस्सा बढ़ता जा रहा है बल्कि ये भी साबित किया कि आम जन में प्रधानमंत्री मोदी का विश्वास भी काफी कम हो रहा है। सबसे बड़ी बात ये हुई है कि राहुल को लेकर जो अविश्वास कांग्रेस के अंदर और बाहर था, वो अब खत्म हो गया है। जहां पहले ये कहा जाता था कि राहुल इसलिये कांग्रेस के नेता हैं क्योंकि वो नेहरू गांधी परिवार से हैं। अब ये कहा जाता है कि क्या कांग्रेस राहुल के योग्य है या नहीं।
राहुल के लिये ये सफर आसान नहीं था। मोदी सरकार और पूरे संघ परिवार ने राहुल को पप्पू बनाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। उनको मुख्य धारा के मीडिया ने ये साबित कर दिया था कि वो वाकई में किसी काबिल नहीं हैं। मीडिया ने ये काम सरकार के इशारे पर किया था। वो अभी भी वो काम कर रहा है लेकिन अब उसकी कोई गूंज नहीं है। राहुल को भी इस बात का एहसास था। भारत जोड़ो यात्रा के दौरान राहुल ने कहा भी था कि उनकी छवि को खराब करने के लिये करोड़ों अरबों रुपये खर्च किये गये। ऐसे में राहुल की भारत की राजनीति में वापसी एक चमत्कार से कम नहीं है। भारत की राजनीति में किसी और नेता को इतनी बड़ी अग्नि परीक्षा से नहीं गुज़रना पड़ा। कोई और नेता होता तो वो मैदान छोड़ कर भाग जाता लेकिन राहुल डटे रहे।
प्रोपेगंडा के माध्यम से राहुल के प्रति लोगों में इस कदर अविश्वास पैदा कर दिया गया था कि खुद कांग्रेस के सीनियर नेता पीठ पीछे उनका मजाक उड़ाते थे। कुछ जानकार लोगों का ये भी कहना है कि राहुल को पप्पू बनाने का काम खुद कांग्रेस के लोगों ने शुरू किया था जिसे बाद में भाजपा ने लपक लिया। राहुल में कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं का कितना भरोसा था, ये इस बात से पता चलता है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में बुरी हार के बाद राहुल ने जब अध्यक्ष पद से इस्तीफा दिया तो उन्होंने ये कहा था कि मैं तो अकेला ही लड़ रहा था यानी उनका इशारा साफ था कि सीनियर नेता उनके साथ नहीं थे। ये महज इत्तेफाक नहीं है कि आज जब राहुल सड़क पर प्रियंका के साथ संघर्ष करते दिख रहे हैं, तब ये सारे वरिष्ठ नेता गायब हैं। राहुल के नेतृत्व में एक नई कांग्रेस का उदय हो रहा है जो वातानुकूलित कमरों में बैठ कर राजनीति नहीं कर रही है, वो सड़क पर उतर रही है और पुलिस प्रशासन से दो दो हाथ कर रही है।
दरअसल, हर नेता को अपने हिसाब से अपनी पार्टी को गढ़ना होता है। जैसे मोदी के भाजपा की कमान संभालने के बाद एक नई भाजपा का जन्म हुआ जो मोदी के रंग में रंगी हुई है। जो चुनाव जीतने के लिये किसी भी हद तक जा सकती है। जिसे चुनाव जीतने के लिये किसी भी पार्टी को तोड़ना और किसी को भी जेल भेजने में कोई संकोच नहीं होता। पार्टी के क्षत्रपों को किनारे लगा दिया गया और मोदी के नेतृत्व को आंख मूंद कर मानने वाले कांग्रेस के नेताओं को पूरी शिद्दत से आगे बढ़ाया गया। उसी तरह राहुल ने भी कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को बर्फ में लगाना शुरू कर दिया और अब जो कांग्रेस सामने है, वो राहुल की कांग्रेस है। ये वो कांग्रेस है जो राहुल की तरह आक्रामक है और जिसे मीठी मीठी बातें करना नहीं आता। जो मोदी को उसी की भाषा में जवाब देती है। इस वजह से जब राहुल के नेतृत्व में सुप्रीम कोर्ट तक यात्रा निकली तो अखबारों में एक खबर छपी कि संवैधानिक संस्थाओं पर इस कदर हमला करना कांग्रेस का कल्चर नहीं है। ये हाशिये पर पड़े कांग्रेसियों का रुदन था, ये उन नेताओं का रुदन था जो सड़क पर उतर कर लाठी डंडा नहीं खाना चाहते। जो सत्ताजीवी हो गये और जिन्हें इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वो भाजपा में हैं या कांग्रेस में। उनकी फितरत सिर्फ सरकार से मिले फायदे से है।
लेकिन अब ऐसा नहीं है। इसकी शुरुआत राहुल की भारत जोडो यात्रा से हुई। सीनियर कांग्रेस के नेता ये भूल गये थे कि जिन हालात में कांग्रेस पहुंच गई थी, वो पहले की तरह की राजनीति करके ज़िंदा नहीं की जा सकती थी। सवाल कांग्रेस के वजूद पर ही लगने लगा था। ये तो भला हो कांग्रेस का कि आम आदमी पार्टी अपने कर्मों से अखिल भारतीय स्वरूप नहीं ले सकी, नहीं तो 2014-2015 में ‘आप’ को कांग्रेस के राष्ट्रीय विकल्प के तौर पर देखा जा रहा था। ये वो वक्त था जब अरविंद केजरीवाल को मोदी का चैलेंजर माना जा रहा था और राहुल से किसी को कोई उम्मीद नहीं थी। राहुल के लिये ये सबसे बुरा समय था। पार्टी न केवल लगातार हार रही थी बल्कि एक-एक कर सभी छोटे बड़े नेता पार्टी छोड़ कर भाजपा में शामिल हो रहे थे। ऐसे में राहुल को ये समझ में आया कि पुराने पिलपिले नेताओं से न तो जंग लड़ी जा सकती है और न ही जंग जीती जा सकती है। वो दो निष्कर्ष पर पहुंचे।
एक, उनका सामना एक ऐसी पार्टी से है जो विचारधारात्मक है और दूसरे दलों जैसी नहीं है। और अगर मोदी से पार पाना है तो उसकी विचारधारा हिंदुत्व पर हमले करने होंगे, उसकी साख को खत्म करना होगा। भाजपा की मातृ संस्था आरएसएस और मोहन भागवत की छवि को ध्वस्त करना होगा। दो, कांग्रेस को बदलना होगा। पुराने ढर्रे से काम नहीं चलेगा। उसके लिये नये सामाजिक आधार को खोजना होगा। नये नेताओं की तलाश करना होगी। राहुल ने कई बार ये कहा है कि कांग्रेस की लड़ाई कांग्रेस के बाहर के लोग भी अच्छी तरह से लड़ रहे हैं। उन्होंने ऐसे लोगों को अपने साथ जोड़ना शुरू किया लेकिन असली बदलाव आया उनकी खुद की भारत जोड़ो यात्रा से। पहली बार लोगों को लगा कि राहुल गंभीर नेता हैं। ये वो वक्त था जब उनके कई कटु आलोचकों ने भी उनकी प्रशंसा की। वो राहुल को नई नज़र से देखने लगे। कन्या कुमारी से कश्मीर की यात्रा ने राहुल के लिये संजीवनी का काम किया। फिर उन्होंने जाति जनगणना व संविधान बचाओ का मुद्दा उठाया। 2024 के चुनाव में भाजपा नेताओं के बयान कि अगर चार सौ सीटें मिल गईं तो वो संविधान बदल देंगे, को राहुल गांधी ने इतने आक्रामक तरह से उठाया कि कभी बाबा साहेब आंबेडकर का मजाक उड़ाने वाले संघ परिवार के नेता और स्वयं नरेन्द्र मोदी को कहना पड़ा कि बाबा साहेब भी आ जाये तो संविधान को नहीं बदल सकते। 2024 में चार सौ का दावा करने वाली पार्टी 240 पर सिमट गई। ये राहुल की सबसे बड़ी जीत थी।
नेता विपक्ष बनने के बाद राहुल ने जो तेवर संसद के अंदर और बाहर दिखाये, उसने भाजपा को बुरी तरह से परेशान कर दिया, पर ये वो वक्त भी था जब भाजपा भारी बहुमत से राज्यों के चुनाव जीतने लगी। इस बीच राहुल ने सबूतों के साथ भाजपा और चुनाव आयोग पर वोट चोरी के गंभीर आरोप लगाने शुरू किये। भाजपा बचाव की मुद्रा में आ गई। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट ने राहुल के आरोपों पर एक तरह से मुहर लगा दी। रही सही कसर कॉकरोच जनता पार्टी ने पूरी कर दी। जंतर मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन ने मोदी सरकार का इकबाल मिट्टी में मिला दिया। राहुल ने चालाकी ये की कि उन्होंने कॉजपा के आंदोलन से प्रतिस्पर्धा नहीं की, उसके समानांतर कांग्रेस को स्थापित नहीं किया, बल्कि पूरक की भूमिका निभाई। नतीजा सबके सामने है। मोदी सरकार ये दोहरा हमला झेल नहीं पाई और धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हो गया।
आज राहुल को एक नये विकल्प के तौर पर देखा जा रहा है। मोदी की छवि लगातार गिर रही है। सरकार और संघ परिवार को समझ नहीं आ रहा है कि वो राहुल से कैसे निपटे। जिन राहुल को कभी कांग्रेस के लिये बोझ समझा जा रहा था, वो राहुल आज नरेन्द्र मोदी के लिये सबसे बड़ा सिर दर्द साबित हो रहे हैं। खुद कांग्रेस को उनसे कदम ताल करने में काफी मेहनत करनी पड़ रही है।
भारत में आज राजनीति एक बेहद निर्णायक मोड़ पर आ खड़ी हुई है। यहां से मोदी के लिये लड़ाई आसान नहीं होगी। जिस राहुल को उन्होंने अबोध बालक समझा था, अब वो बड़ा हो गया है और उन्हें दिन में तारे दिखा रहा है। इतिहास का एक चक्र खत्म होने को है, और दूसरा शुरू होने वाला है।



