समाज के लिए नया खतरा बना इनफॉर्मेशन टेररिज़्म

देश में तमाम तरह के आतंकवाद के बाद अब इनफॉर्मेशन टेररिज्म का खतरा मंडरा रहा है। देश में पिछले दिनों कॉकरोच पार्टी के दो बड़े आंदोलन हुए और दोनों इस्तीफे की मांग पर थे। एक केंद्रीय शिक्षा मंत्री का दूसरा चुनाव आयोग के मुख्य चुनाव आयुक्त का। इन दोनों आंदोलनों के बाद एक नया खतरा सभी ने महसूस किया। यह खतरा था तेजी से फैलती सूचनाओं का, जितनी तेजी से सूचनाएं फैलीं वह चिंतनीय थीं। नेपाल की आपदा में भी यही खतरा महसूस किया गया था। अब भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा है कि अगर हर कोई खुद को पत्रकार बताने लगेगा, तब समस्याएं पैदा होंगी। उनकी पीठ में शामिल एक अन्य जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने यह भी कहा कि अदालत इस बात की जांच करेगी कि क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मतलब यह है कि हर व्यक्ति खुद को पत्रकार बता सकता है? इसी कड़ी में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इस बात पर जोर दिया है कि अब पत्रकारों की पहचान करना मुश्किल हो रहा है। यह पता नहीं चलता कि कौन रील बनाने वाला है और कौन स्वतंत्र पत्रकार? अन्य बातों को छोड़ दिया जाए तो आज हर कहीं इस बात पर चिंता है कि देश में इस समय मीडियाकर्मियों खासकर पत्रकारों की संख्या काफी तेजी से बढ़ रही है।  
देश के सूचना तंत्र में इस समय इनफॉर्मेशन टेररिज्म को लेकर चिंता व्यक्त की जा रही है। मगर इसके उलट हर कहीं ऐसे पत्रकार बल्कि यह कहना चाहिए कि ऐसे सूचना देने वालों की भीड़ बढ़ रही है, जो तेजी से खुद को चर्चित होते हुए देखना चाहते हैं और आंदोलनों, सामाजिक समारोहों, आपदा के समय, सोशल मीडिया में, इंटरनेट की दुनिया में हर प्रकार की सूचनाओं को प्रिंट तथा डिजिटल मीडिया से पहले देने को बेताब रहते हैं। माना जा रहा है कि यह डिजिटल युग का एक खतरनाक अंग है। इसमें बिना पुष्ट किए सूचनाएं जारी की जाती हैं, बस माइक के सामने कोई बोलने वाला होना चाहिए। गलत जानकारी या सूचना, भ्रामक सूचना तथा संवेदनशील मुद्दों पर तीखी टिप्पणी भी इसमें शामिल हैं। इस तरह की बातों को इनफॉर्मेशन टेररिज्म के रूप में लिया जा रहा है। 
गूगल पर इस तरह की सूचनाएं तो पहले ही से थीं जिन पर विश्वास करना मुश्किल होता है, अब रील के रूप में खुलेआम पेश की जा रही हैं। किसी अभिनेत्री की मौत, किसी राजनेता की बीमारी या मौत, किसी पर खुद का एनालिसिस और कई बार तो अंतर्राष्ट्रीय स्तर के मामलों पर ऐसी सूचनाएं आती हैं कि उन्हें सुनने-पढ़ने वाला सन्न रह जाता है। इन पर यह नहीं देखा जाता कि इनसे दो देशों के आपसी संबंध खराब हो सकते हैं या फिर तनाव या दंगों की वजह बन सकती हैं। एआई की मदद से इन्हें और धारदार बनाकर सूचना नहीं बल्कि भड़काऊ खबर बना दिया जाता है। चिंतनीय बात यह कि इनमें फोटो को भी जोड़ दिया जाता है, जिससे देखने-सुनने या पढ़ने वालों की संख्या बड़े। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों ने जिस तरह से इस बात को लिया है, उससे एक बात तो पक्की होती है कि इस वक्त यह समझ पाना मुश्किल हो रहा है कि कौन वास्तव में मीडिया से जुड़ा है और कौन सिर्फ खुद को सिद्ध करने के लिए माइक हाथ में लेकर सूचना प्रेषित कर रहा है, रील या अन्य माध्यमों से। नेपाल में जब बाढ़ का प्रकोप आया तो तमाम माइक थामें और सूचना देने वाले घुटने तक कीचड़ में उतरकर सूचनाएं प्रेषित कर रहे थे, बाद में उनको वहां के स्थानीय निवासियों ने सुरक्षित बाहर निकाला। यहां पर चिंता की बात यह है कि उनके पास कोई ऐसा माध्यम नहीं होता कि यह समझा जा सके कि वह किस अखबार, टीवी चैनल या डिजिटल माध्यम का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं। संभवत: सुप्रीम कोर्ट ने इसी बात को इंगित किया है और यह सूचनातंत्र में खतरनाक माना जा रहा है। 
दरअसल भारत में मीडिया में काम करने वाले पत्रकारों की संख्या का वास्तविक आंकड़ा आज तक तैयार नहीं हुआ है। यहां तक कि केंद्र या राज्य सरकारें भी ऐसे आंकड़े पेश नहीं करतीं। उनके पास जो सूचना होती है, वह उन पत्रकारों की होती है, जो या तो राज्य स्तर पर मान्यता प्राप्त हैं या पीआईबी के स्तर पर मान्यता प्राप्त हैं। किसी समाचार पत्र या टीवी चैनल अथवा डिजिटल प्लेटफार्म द्वारा सरकारों को बताया गया है। एक अन्य स्रोत वह होता है, जिसमें केंद्र या राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाओं में लाभ लिए मीडियाकर्मी होते हैं। इसमें सरकार द्वारा अत्यंत रियायती दरों पर दिए गए मकान या भूखंड, मेडिकल सुविधा, रेलवे-बस की सुविधा आदि शामिल हैं। राज्यों द्वारा मान्यता प्राप्त पत्रकारों की संख्या सबसे अधिक तेलंगाना में है, जहां पर यह संख्या 44,000 है। उत्तर प्रदेश में 5000 के करीब, राजस्थान में 2500 से 3000, मध्य प्रदेश में लगभग 3500, बिहार तथा उड़ीसा में 1100 के आसपास, पीआईबी द्वारा तकरीबन 2500 पत्रकारों को मान्यता प्राप्त माना गया है। 
देश के दूसरे राज्यों में अगर सभी को जोड़ दिया जाए तो यह आंकड़ा अधिकतम दो लाख पहुंचेगा। इनमें पत्रकारों के साथ ही डेस्क पर काम करने वाले, स्वतंत्र पत्रकार तथा संपादक स्तर तक के मीडियाकर्मी शामिल हैं। डिजिटल, वेब पोर्टल, सोशल मीडिया तथा टीवी चैनलों आदि में काम करने वालों की संख्या का अनुमान लगा पाना मुश्किल है। मीडिया उद्योग में लगभग 900 चैनल तथा 1,40,000 से अधिक वे पत्र-पत्रिकाएं हैं, जो पंजीकृत हैं। यहां पर उन मीडियाकर्मियों को शामिल नहीं किया गया है, जो शौकिया हैं या फिर पार्टटाइम काम करते हैं। इन हालातों में इनफॉर्मेशन टेररिज्म को मॉनीटर कैसे किया जा सकता है? यह एक चुनौती है। हालांकि सरकारों के मीडियाकर्मियों के लिए नियम कानून हैं, पर घटती-बढ़ती संख्या के कारण इन पर नजर रखना चुनौती बनता जा रहा है। इस मामले में यूनेस्को सोशल मीडिया और डिजिटल दुनिया में पनप रहे सूचना के प्रदूषण को रोकने के लिए काफी काम कर रहा है, उसने दुनिया के 134 देशों से दस हजार से अधिक सुझाव लेकर सोशल मीडिया प्लेटफार्म को रेगुलेट करने के लिए एक वैश्विक प्लान बनाया है। इसका मकसद यह है कि प्रेस की आजादी को कायम रखते हुए ‘फेक’ तथा घृणा फैलाने वाले समाचारों को रोका जा सके। वैसे जेन-जी जिसकी ज़िंदगी में रील तथा वीडियो खास दखल रखते हैं, वह इससे अधिक प्रभावित हैं और हाल के आंदोलनों में यह नजर भी आया है और शायद सुप्रीम कोर्ट ने इसी सबको देखकर कहा है कि अगर हर कोई अपने आपको पत्रकार बताने लगेगा तो समस्याएं पैदा होंगी।          

-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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