श्रीलंका के राजनीतिक बदलाव का असर


श्रीलंका में गोतबाया राजपक्षे ने नए राष्ट्रपति के तौर पर शपथ ग्रहण कर ली है। भारत की ओर से हिन्द महासागर में स्थित अपने इस पड़ोसी के साथ कई कारणों से अपने संबंधों को सुधारने की आवश्यकता होगी। इसका एक बड़ा कारण यह है कि इससे पूर्व मैत्रीपाला सिरीसेना की सरकार को भारत की तरफ झुकाव वाली माना जाता था। परन्तु अब गोतबाया राजपक्षे की सरकार को इसलिए चीन की तरफ झुकाव रखने वाली माना जाएगा, क्योंकि गोतबाया महिंदा राजपक्षे के छोटे भाई हैं। सिरीसेना से पूर्व 10 वर्ष तक महिंदा राजपक्षे श्रीलंका के राष्ट्रपति रहे थे। गोतबाया भाई होने के साथ-साथ उनके पक्के साथी भी रहे हैं। महिंदा राजपक्षे की सरकार के समय चीन ने श्रीलंका के साथ बहुत निकटता बढ़ा ली थी और उसने अपनी काफी पूंजी भी वहां लगाई हुई है। इसीलिए इस नई स्थिति को देखते हुए ही अचानक भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कोलम्बो जाकर गोतबाया के साथ मुलाकात की है। उन्होंने नए राष्ट्रपति को भारत आने का निमंत्रण भी दिया है, जिसको उन्होंने स्वीकार भी कर लिया है। गोतबाया की बड़ी जीत को कई पक्षों से देखा जा रहा है। उन्होंने सत्तारूढ़ यूनाइटेड नैशनल पार्टी के उम्मीदवार साजिथ प्रेमदासा को बड़े अन्तर से हराया है। चुनावों के दौरान गोतबाया ने देश में सुरक्षा को सुनिश्चित बनाने का वायदा किया था। इसके साथ-साथ उन्होंने गत 15 वर्षों से आर्थिक मंदहाली में फंसे श्रीलंका को विकास के पथ पर लाने का वायदा भी किया था। शपथ ग्रहण के बाद उन्होंने अपनी विदेश नीति को स्पष्ट करते हुए कहा है कि श्रीलंका अंतर्राष्ट्रीय संबंधों में संतुलन बनाये रखेगा। उसकी नीति किसी एक पक्ष की ओर झुकाव वाली नहीं होगी। श्रीलंका वर्ष 2001 तक ‘लिट्टे’ के साथ गृह युद्ध में फंसा रहा था। यह गृह युद्ध 30 वर्ष तक चलता रहा था। इसमें हज़ारों ही लोग मारे गए थे। ‘लिट्टे’ के आत्मघाती हमलावरों ने एक तरह से देश को तबाह करके रख दिया था। भीषण युद्ध के समय महिंदा राजपक्षे श्रीलंका के राष्ट्रपति थे। गोतबाया उनके रक्षा सचिव थे। गोतबाया ने ही बड़ी सैन्य कार्रवाई करके दो वर्षों में ही इस ब़गावत को दबा दिया था। उसके बाद महिंदा राजपक्षे उजड़ चुके इस देश में तमिल मूल के नागरिकों को पर्याप्त सहायता दे सकने में असमर्थ रहे थे, जिसके लिए उनकी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी आलोचना हुई थी। इस 10 वर्ष के विवादित शासन के बाद यूनाइटेड नैशनल पार्टी के सिरीसेना वहां के राष्ट्रपति बने थे। अब 5 वर्ष बाद इसी पार्टी के ही राष्ट्रपति के उम्मीदवार प्रेमदासा को गोतबाया राजपक्षे ने हरा दिया है। राजपक्षे के पक्ष में इसलिए भी बड़ी संख्या में वोट भुगते क्योंकि इसी वर्ष अप्रैल के महीने में इस्लामिक स्टेट के आतंकवादियों ने अपने आत्मघाती हमलावरों द्वारा देश के अलग-अलग होटलों और चर्चों को निशाना बनाया था। जिसमें 250 के लगभग लोग मारे गये थे।  इन योजनाबद्ध हमलों ने सिरीसेना की सरकार को कमज़ोर कर दिया था। श्रीलंका की जनसंख्या 2.25 करोड़ के लगभग है। यहां 70 प्रतिशत जनसंख्या सिनहाली मूल के लोगों की है, जो बुद्ध धर्म को मानते हैं। 14 प्रतिशत के लगभग तमिल हिन्दू हैं और 10 प्रतिशत के लगभग मुसलमान हैं और शेष इसाई या कुछ अन्य धर्मों से संबंध रखते हैं। ‘लिट्टे’ के बाद मुस्लिम आतंकवादी संगठन द्वारा फैलाई हिंसा से पैदा हुई स्थिति के कारण ही गोतबाया को सिनहाली लोगों का बड़ा समर्थन मिला है। श्रीलंका लगभग 65 हज़ार किलोमीटर की धरती वाला टापू है। भारत का निकटतम पड़ोसी है। हिन्द महासागर में इसका काफी महत्त्व है। इस टापू को भी अंग्रेज़ों से भारत को मिली आज़ादी के कुछ समय बाद ही आज़ादी मिली थी। भारत के साथ इसके सदियों पुराने निकटतम संबंध रहे हैं। यह ‘सार्क’ देशों के साथ-साथ राष्ट्रमंडल देशों का भी सदस्य है। समय-समय पर भारत ने इसकी हर पक्ष से बड़ी सहायता भी की है। अब पैदा हुए नए हालात में दोनों देश किस तरह सहयोग से चलते हैं यह देखने वाली बात होगी। भारत की ओर से श्रीलंका के आंतरिक मामलों में गत लम्बे समय से किसी तरह का भी हस्तक्षेप नहीं किया जा रहा। इसका अच्छा प्रभाव बना है, जिससे आगामी समय में दोनों देशों के बीच हर तरह का सहयोग बढ़ने के बड़े आसार बन गये हैं।

—बरजिन्दर सिंह हमदर्द