रबड़ देने वाले पेड़


 

रबड़ का चलन संसार भर में है, इससे अनेक तरह की वस्तुएं बनाई जाती हैं, लेकिन तुम्हें मालूम है यह कैसे बनता है ? आओ, यही कुछ तुम्हें बताते हैं... रबड़ ‘हेविया’ प्रजाति के पांच दर्जन से भी अधिक पेड़ों से प्राप्त किया जाता है, इन वृक्षों को ‘रबड़ ट्री’ नाम से जाना जाता है, हां, सबसे पहले वृक्ष के तने में एक चीरा लगा दिया जाता है, जिसमें से सफेद दूध जैसा चिपचिपा पदार्थ निकलता है। इस पदार्थ को ‘लेटेक्स’ कहा जाता है। इसे एक बाल्टी, टब या ड्रम में एकत्र किया जाता है तथा उसमें कई प्रकार के रासायनिक पदार्थ मिलाकर इस योग्य बनाया जाता है कि वह विभिन्न प्रकार की वस्तुओं के निर्माण में काम आ सके। रबड़ के वृक्ष से दूध या लेटेक्स निकालने की क्रिया उस समय की जाती है जबकि वृक्ष के तने की मोटाई लगभग 45 से 50 सेंटीमीटर तक हो जाती है। वैसे इस प्रक्रिया को टैपिंग कहा जाता है। टैपिंग वृक्ष में लगभग एक मीटर तक की ऊंचाई पर छाल में काट लगाकर की जाती है। काटे हुए स्थान के नीचे द्रव एकत्र करने के लिए बर्तन लगा दिया जाता है। वृक्षों से प्राप्त लेटेक्स को जमा कर कारखानों में भेजा जाता है। कारखानों में पहुंचने के उपरान्त लेटेक्स को सावधानीपूर्वक छाना जाता है, फिर उसमें हाइड्रोफ्लोरिक अम्ल, एसिटिक अम्ल एवं फार्मिक अम्ल मिलाकर उसे दूसरे यौगिकों से पृथक कर लिया जाता है। फिर रबड़ को बड़े चौड़े मुंह के पात्रों में डालकर ‘रबड़ केक’ बना दिया जाता है।
 बाद में इसे ‘क्रेप’ के रूप में ढाल लिया जाता है, इसी को सुखाकर रबड़ प्राप्त किया जाता है। रंगीन रबड़ बनाने के लिए ‘तरल लेटेक्स’ में ही नीला, पीला, लाल, काला या हरा रंग मिला दिया जाता है। हमारे देश में केरल, कर्नाटक व तमिलनाडु में रबड़ की खेती व्यापक पैमाने पर होती है।
— अर्चना जैन