भूतकाल
धीरे-धीरे बहुत से
चेहरे आलोप हो रहे हैं
देखता था जिनको बचपन से।
धीरे-धीरे वो सब आवाज़ें
खामोश हो रही है
सुनता था जिनको लड़कपन से।
धीरे-धीरे वो सब
अपने-पराये खोते जा रहें है
मिलता था जिनको बाल्यावस्था से।
धीरे-धीरे वो सब गांव
शहर में बदलते जा रहे हैं
घूमता था जिनकी पगडंडियों के किनारे।
धीरे-धीरे वो सब मानव
दानव में बदलते जा रहे हैं
समझता था जिनको विश्व का महामानव।
-डा. राजीव डोगरा
मो. 9876777233
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