लहसुन, प्याज़ और सफाचट बाबू
हमारे यहां एक बंगाली बाबू हुआ करते थे। नाम था उनका सफाचट बाबू। पेशे से वकील थे। आधुनिकता उनकी सोच में थी। पुरातन के घोर विरोधी थे। गार्लिक और ऑनियन में सफाचट बाबू के प्राण बसते थे। वो सावन-भादों, आश्विन, कार्तिक कुछ नहीं मानते थे। वो दूर से ही किसी होटल में बन रहे गार्लिक और ऑनियन के पेस्ट को भुनते हुए सूंघ लेते तो मताए हुए हाथी की तरह उस होटल का रुख कर लेते यानी कुल मिलाकर मुर्गा, मीट और मछली के बहुत ही शौकीन थे। उनके और भी दो-तीन डॉक्टर मित्र और कुछ बड़े प्रापर्टी डीलर मित्र हुआ करते थे। डाक्टर मित्र जब जब सफाचट बाबू बीमार पड़ते तो उनको मीट मछली मुर्गा अण्डा खाने की सलाह देते। उन्हीं दिनों की बात है।
सफाचट बाबू परेशान थे। उन्होंने बुढ़ापे में मेनका नाम की युवती से दूसरी शादी कर ली थी। उगली मोहल्ले के लुच्चे लफंगे लड़कों की नज़र उनकी पत्नी पर रहती। वो साग-भाजी, सौदा-सुल्फ लाते हुए, मेनका को छेड़ते। मेनका भी मुस्कुरा कर रह जाती। सफाचट बाबू परेशान हो जाते। जवानी लौटाने के सारे नुस्खे उन्होंने आज़मा लिये थे। बालों में खिजाब लगाते। अखाड़े वो रोज जाते नियम से। वहां वो बीस साला, तीस साला लड़कों को देखते तो अपने जवानी के दिन याद करने लगते। लड़कों को मुगदल भांजते देखते तो उनको लगता, वो खुद भांज रहे हैं।
इस तरह घर आकर अपनी सीना फुलाते। डंड पेलते। सीने को निकाल कर मोहल्ले के लड़कों को दिखाते। फिर भी उनको एक असुरक्षा की भावना ने घेर रखा था। बादाम और दूध सुबह शाम लेते। कसरत व वर्जिश से अपने जवान होने का सबूत पूरे मोहल्ले को देते।
एक बार उनके पास एक नया नौकर आया था। नाम था उसका बंबूलाल। बंबूलाल बहुत ही सीधा-सादा व साधारण भोजन करने वाला प्राणी था। एक दिन जब बंबूलाल ने मालिक को चिकन खाते देखा तो बोला, मालिक, आप लहसुन, प्याज ना खाया करें। ये सब तामसिक भोजन है। लहसुन, प्याज का जन्म आपको पता है कैसे हुआ था। दरअसल जब समुद्र मंथन हुआ था, तो उसमें जो अमृत निकला था, उसको देवताओं में बराबर-बराबर बांटा जा रहा था। देवताओं में छिपकर दो राक्षस राहू और केतू भी बैठ गये थे। जब अमृत बंटा तो उसमें से थोड़ा-थोड़ा अमृत राहू और केतू के मुंह में भी चला गया। इस तरह बहुत थोड़ा सा अंश ही उनके मुख में गया था। देवता डरे और बोले, इस तरह तो ये दोनों अमर हो जायेंगे। इसलिये इनका सिर काटकर अलग किया जाये। अंतत: राहू और केतू का सिर काट दिया गया जिससे अमृत उनके मुख से उनके पेट में ना जा सका। खैर, राहू और केतू का रक्त पृथ्वी पर जहां-जहां गिरास वहां-वहां लहसुन और प्याज पैदा होते हैं, मालिक! मालिक के सामने बंबूलाल का चेहरा था। उनको अपनी अवस्था याद आ रही थी।
सफाचट बाबू सत्तर वर्षीय बंगाली ब्राह्मण थे। बंबूलाल की बात सुनी तो उनके पेट में उथल-पुथल मच गई थी। उन्हें बार-बार लहसुन-प्याज का भूंजा हुआ सुनहरा पेस्ट याद आता। अण्डे की भुजिया, मुर्गे का शोरबा और मटनकरी की याद आ जाती। फिर राहु और केतू की याद आ जाती। समुद्र मंथन याद आ जाता। अमृत याद आ जाता। फिर राहू केतू के कटे सिर नज़र आ जाते। तब वो मंथन करने लगते। उनको क्या अधिकार था कि वो उनका सिर काट कर पृथ्वी के किसी सुदूर हिस्से में फेंक दें। लेकिन वो आदमी थे। उनके अंदर आदमियत थी। लहसुन और प्याज ज़रूर राहू और केतू के रक्त से बने होंगे लेकिन उनके औषधीय गुणों को नकारा नहीं जा सकता।
ये सफेद प्याज का पराक्रम ही है कि इसके रस को सोंठ के साथ मिलाकर सेवन करने से कफ की बीमारी ठीक हो जाती है। अगर नाक से रक्तस्राव होता हो तो प्याज के रस को नाक में दो-चार बूंद डालने से नाक का रक्तस्राव ठीक हो जाता है। लहसुन के बारे में जब सफाचट बाबू सोचते तो उन्हें याद आता कि यह वही राहू केतू के रक्त से बना लहसुन है जोकि सुबह-सुबह खाली पेट खाने से कोलेस्ट्रोल, ब्लडप्रेशर और हृदय रोग से बचाता है। शरीर की इम्यूनिटी भी बढ़ाता है। पाचन तंत्र को भी ठीक करता है। जो गैस और अपच की समस्या को भी ठीक करता है। लिहाजा अब सफाचट जी अपने गुरु की बात मान रहें हैं, और लहसुन प्याज का नियमित सेवन कर रहे हैं।