बांग्लादेश में हिंदुओं के उत्पीड़न पर दुनिया खामोश क्यों ?
भारत के पड़ोसी बांग्लादेश में हिंदुओं पर अत्याचार एक लंबे अरसे से चली आ रही समस्या है। कभी पूर्वी पाकिस्तान कहे जाने वाले बांग्लादेश में अक्सर इस्लामिक कट्टरता कुछ समय थमने के बाद मुखर हो जाती है जो राजनीतिक अस्थिरता के दौरान अमूमन तेज़ हो जाती है। यह भारत सहित अंतर्राष्ट्रीय चिंता का विषय है और दुनियाभर में अल्पसंख्यक समूह के उत्पीड़न पर संयुक्त राष्ट्र की विफलता का द्योतक है। विगत कुछ समय से भारत और बांग्लादेश के कूटनीतिक सम्बन्धों पर भी इन बातों का प्रभाव महसूस किया जा सकता है। यदि पुरानी बातें छोड़ भी दीं जाएं तो वर्ष 2024 में शेख हसीना की सरकार गिरने के बाद से बांग्लादेश में हिंदू विरोधी हिंसा पुन: बढ़ गई है, जिसमें मंदिरों पर हमले, घरों में लूटपाट एवं आगज़नी और हत्याएं शामिल हैं। इस पर अंतर्राष्ट्रीय समुदाय की महज खानापूर्ति वाली प्रतिक्रिया से वहां हिंदुओं पर संकट गहराता जा रहा है।
यदि हालिया घटनाओं पर नज़र डालें तो पता चलता है कि नवम्बर, 2024 से जनवरी 2025 तक 76 हमले दर्ज किए गए, जबकि अगस्त 2024 से अब तक 23 से अधिक हिंदुओं की हत्या और 152 मंदिरों पर आक्रमण की खबरें हैं। वहीं, 2025 में राजबाड़ी जिले में अमृत मंडल और दीपू चंद्र दास हिंदू युवकों की हत्या हुई, साथ ही घरों में आगज़नी के मामले सामने आए। आंकड़े बताते हैं कि 1971 में हिंदू बांग्लादेश की आबादी का 22 प्रतिशत थे जो अब कम होकर 8 प्रतिशत से कम रह गए हैं, जो मुख्यत: उत्पीड़न और पलायन के कारण हुआ है।
एक अंतर्राष्ट्रीय रिसर्च के मुताबिक 16 लाख हिंदू भारत चले गए, क्योंकि बंगलादेश में हिंदुओं की भूमि हड़पना, दुष्कर्म और मंदिर की तोड़-फोड़ सामान्य बात हो गई है। इससे जुड़े आंकड़े और रिपोर्ट की मानें तो 2025 के पहले छह महीनों में 258 हिंसा की घटनाएं हुईं, जिनमें 20 दुष्कर्म और 59 पूजा स्थलों पर हमले शामिल हैं। 4 अगस्त, 2024 से जून 2025 तक 2,244 मामले दर्ज किए जा चुके हैं जबकि अंतरिम सरकार पर आंखें मूंद कर रखने का आरोप है, जिस कारण अपराधी बेखौफ हैं।
दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि बांग्लादेश की अंतरिम सरकार के मुखिया मोहम्मद यूनुस ने बांग्लादेश में हिंदुओं हत्याओं पर प्रत्यक्ष रूप से कोई सार्वजनिक बयान नहीं दिया या ठोस कार्रवाई नहीं की है, जिससे उनकी सरकार पर निष्क्रियता के आरोप लगे हैं। कई रिपोर्टों में हिंसा को उनकी कथित कट्टरपंथी नीतियों से जोड़ा गया है, लेकिन आधिकारिक प्रतिक्रिया में केवल सामान्य शांति अपील तक सीमित रहने का उल्लेख है। इसलिए उन पर आरोप लगते हैं और आलोचना भी होती है कि यूनुस सरकार जमात-ए-इस्लामी जैसे कट्टरपंथी समूहों को संरक्षण दे रहे हैं जिसके बाद हिंदुओं के खिलाफ हिंसा बढ़ी है। यूनुस ने भारत के दबाव में जांच का वादा किए बिना कोई कार्रवाई नहीं की। जहां तक अंतर्राष्ट्रीय दबाव की बात है तो भारत और ब्रिटेन जैसे देशों ने यूनुस से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की मांग की. लेकिन उनकी प्रतिक्रिया में कोई ठोस कदम नहीं दिखा। बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना ने निर्वासन से यूनुस पर हिंदू-उत्पीड़न को बढ़ावा देने का आरोप लगाया है। जहां तक इस मसले पर अंतर्राष्ट्रीय प्रतिक्रिया का सवाल है तो भारत सरकार द्वारा लोकसभा में मामला उठाया गया। उधर ब्रिटिश सांसदों ने यूनुस सरकार पर कार्रवाई की मांग की।
बता दें कि भारत विदेशों में हिंदुओं पर हो रहे उत्पीड़न को मुख्य रूप से कूटनीतिक दबाव, अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर आवाज़ उठाने और संबंधित देशों से न्याय की मांग करके रोकने का प्रयास करता है। बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे देशों में हालिया घटनाओं पर विदेश मंत्रालय ने सख्त बयान जारी किए हैं, जहां दोषियों को सज़ा देने और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की गई है।
जहां तक कूटनीतिक प्रयास की बात है तो भारतीय विदेश मंत्रालय बांग्लादेश में हिंदू युवकों की हत्या और घरों पर हमलों की कड़ी निंदा करता है तथा अंतरिम सरकार से कार्रवाई की अपेक्षा रखता है। विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने ढाका में बांग्लादेशी समकक्ष से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा पर चर्चा की। वहीं भारत अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों की दुर्दशा उजागर करता है, लेकिन सुरक्षा की मुख्य ज़िम्मेदारी संबंधित देश की सरकार की मानता है। जहां तक गृह मंत्रालय की भूमिका की बात है तो गृह मंत्री अमित शाह ने बांग्लादेश सीमा पर विशेष समिति गठित की है जो हिंदू अल्पसंख्यकों की स्थिति की निगरानी करती है और भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सुनिश्चित करती है। नागरिकता संशोधन कानून के जरिए उत्पीड़ित हिंदू-सिख आदि को भारत में शरण प्रदान की जा रही है। (एजेंसी)



