नव वर्ष—नया दृष्टिकोण

विश्व भर में लोगों द्वारा नव वर्ष 2026 का पूरे उत्साह और जोश से स्वागत किया गया है। भिन्न-भिन्न देशों में लोगों द्वारा अपने-अपने ढंग से खुशी का प्रकटावा किया गया है। धार्मिक आस्था रखने वाले लोगों ने अपने-अपने धार्मिक स्थानों पर जाकर अपनी और पूरे विश्व की सुख-शांति के लिए प्रार्थनाएं की हैं। नव वर्ष के अवसर पर सुख-शांति की कामना करना अच्छी बात है परन्तु इसके साथ ही यह भी ज़रूरी हो जाता है कि विश्व भर की बड़ी राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक पक्षों द्वारा क्रियात्मक रूप में भी इस विश्व को शांतिमय रखने और लोगों की खुशहाली के लिए नव वर्ष में नया दृष्टिकोण अपनाया जाए।
हम जानते हैं कि विश्व में ज्यादातर टकराव और तनाव बड़ी राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक शक्तियों द्वारा लोगों के सामूहिक हित की परवाह किए  बिना प्रत्येक ढंग से अपने स्वार्थों को आगे बढ़ाने के किए जाते यत्नों से पैदा होते हैं। यदि विश्व की बड़ी शक्तियां ‘जीओ और जीने दो’ के सिद्धांत का दृढ़ता से पालन करें तो इस विश्व को राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक टकरावों से काफी सीमा तक मुक्त किया जा सकता है। इस संदर्भ में महात्मा गांधी ने भी कहा था कि ‘यह धरती मनुष्य की ज़रूरतें पूरा करने के लिए तो काफी है परन्तु इसके लालच की पूर्ति करने के लिए नाकाफी है।’ ज़रूरत से अधिक राजनीतिक सत्ता हासिल करने, ज़रूरत से अधिक आर्थिक और वित्तीय स्रोत एकत्रित करने और ज़रूरत से अधिक अपने ही धर्म को महान मान कर अन्य धर्मों के लोगों को भेदभाव और अत्याचारों का शिकार बनाने से ही अधिक समस्याएं पैदा होती हैं।
यदि इस समय की विश्व की स्थिति संबंधी बात करें तो रूस-यूक्रेन युद्ध विगत तीन वर्ष से चल रहा है। इसमें व्यापक स्तर पर लोगों का जानी और आर्थिक रूप से नुकसान हुआ है। यूक्रेन के लगभग 20 प्रतिशत क्षेत्र पर रूस कब्ज़ा कर चुका है। इस समय भी रूस की ज़िद्द है कि उसने यूक्रेन के जिस 20 प्रतिशत क्षेत्र पर कब्ज़ा किया है, यूक्रेन उस पर रूस का अधिकार मान ले, तभी वह युद्ध-विराम के लिए तैयार होगा। इस तरह मध्य पूर्व में इज़रायल और हमास के टकराव ने 70 हज़ार से अधिक फिलिस्तीनियों की जान ले ली है। गाज़ा पट्टी एक तरह से खण्डहर बन गई है। इस युद्ध में इज़रायल के भी लगभग 1200 नागरिक और लगभग 1000 सैनिक मारे गए हैं। इस टकराव में मीडिया के भी ज्यादातर कर्मचारी अपनी जान गंवा चुके हैं। विश्व के और भी बहुत-से देशों में राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक और क्षेत्रीय विवादों के कारण टकराव चल रहे हैं। विश्व की उभर रही नई आर्थिक और राजनीतिक शक्ति चीन ताइवान पर कब्ज़ा करके उसे अपने देश में शामिल करने के लिए सैन्य अभ्यास करने में जुटा हुआ है। चीन के राष्ट्रपति शी-जिनपिंग ने अपने ताज़ा बयान में यह भी कहा है कि ताइवान चीनी भूमि का हिस्सा है। उसे चीन में मिलाने से विश्व की कोई ताकत उन्हें नहीं रोक सकती। चीन ने ब्रह्मपुत्र पर भी विश्व का बड़ा हाईड्रो बिजली प्रोजैक्ट बनाने की शुरुआत कर दी है। यह बांध भारत के प्रदेश अरुणाचल प्रदेश के निकट पड़ता है। इस संबंध में यह भी कहा जा रहा है कि ब्रह्मपुत्र के पानी को अपने ढंग से रोक कर चीन भारत और बांग्लादेश के हितों को भी प्रभावित कर सकता है। विगत वर्ष में भारत और पाकिस्तान के संबंध भी बेहद खराब रहे हैं। पहलगाम के घटनाक्रम के बाद ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के तहत भारत ने पाकिस्तान में लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों और कुछ पाकिस्तानी सैन्य हवाई अड्डों को नुकसान पहुंचाया था। पाकिस्तान की ओर से भी भारत के विरुद्ध अपने ढंग से कार्रवाई की गई थी। दोनों देशों के मध्य विश्व के कुछ देशों द्वारा पर्दे के पीछे किए गए यत्नों से तीन-चार दिन बाद यह लड़ाई बंद हो गई। पहलगाम हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से सभी व्यापारिक संबंध बंद कर दिए थे और सिंधू जल समझौता भी रद्द कर दिया था। दोनों देशों ने एक-दूसरे के विमानों के लिए अपने-अपने हवाई क्षेत्र भी बंद किए हुए हैं। भारत जम्मू-कश्मीर में सिंध, जेहलम और चिनाब का पानी पाकिस्तान की ओर जाने से रोकने के लिए कुछ कदम उठा रहा है और चिनाब दरिया पर एक नए बांध का निर्माण करने संबंधी भी समाचार प्राप्त हो रहे हैं।
विश्व भर में विकसित देशों द्वारा अपनाए गए और लागू किए जा रहे विकास के कार्पोरेट मॉडल के कारण लोगों में आर्थिक असमानताएं बढ़ रही हैं। विश्व के आर्थिक और प्राकृतिक स्रोत कुछेक लोगों के हाथों में केन्द्रित होते जा रहे हैं, जिससे भिन्न-भिन्न देशों के विकास के सभी दावों के बावजूद बहुसंख्यक लोगों की आर्थिक हालत पतली होती जा रही है। इस कारण विश्व भर के लोगों में चिंता और बेचैनी पाई जा रही है। इस तरह की असमानताओं भरे आर्थिक मॉडल के विरुद्ध भिन्न-भिन्न देशों में समय-समय पर जन-रोष भी सामने आता रहा है। यदि विश्व के बड़े राजनीतिक, आर्थिक और धार्मिक पक्षों का रवैया पहले जैसे ही रहता है तो 2026 के सभी के लिए सुख-शांति वाला वर्ष होने के सपने उसी तरह बिखर कर रह जाएंगे, जैसे पिछले वर्षों में बिखरते रहे हैं।
यदि हम सच में वर्ष 2026 को पूरे विश्व के लिए और सभी लोगों के लिए सुख-शांति और खुशहाली वाला बनाना चाहते हैं तो विश्व के शक्तिशाली पक्षों के साथ-साथ जन-साधारण को भी नव वर्ष में नये दृष्टिकोण से इस विश्व को रहने के लिए एक बेहतर स्थान बनाने के लिए पूरी ऊर्जा से यत्नशील होना पड़ेगा।

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