व्यक्ति का संतुलित विकास होना चाहिए शिक्षा का उद्देश्य
शिक्षा प्राप्त करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, लेकिन यह जानना कि हमारी शिक्षा का उद्देश्य क्या हो, शिक्षा प्राप्त करने से भी महत्वपूर्ण है। यदि हम शिक्षा प्राप्त करते हैं अथवा कोई डिग्री आदि लेते हैं, लेकिन उससे हमें अच्छा रोज़गार नहीं मिल पाता अथवा हममें व्यवसाय आदि करने की योग्यता व क्षमता उत्पन्न नहीं हो पाती तो वह शिक्षा बेकार है। साथ ही यदि शिक्षा हमारे व्यक्तित्व के विकास में सहायक नहीं हो पाती है तो भी ऐसी शिक्षा को उपयोगी नहीं माना जा सकता।
अधूरी है ऐसी शिक्षा जो बहुआयामी न हो। मनुष्य के जीवन में संतुलन सबसे अधिक अनिवार्य है। वह आर्थिक रूप से भी सक्षम हो और साथ ही उसका व्यक्तित्व भी प्रभावशाली हो। प्रभावशाली व्यक्तित्व के अनेक आयाम हैं। इसमें बाह्य व्यक्तित्व के साथ-साथ दूसरी अच्छी आदतों का विकास भी सम्मिलित है।
यदि व्यक्ति पर्याप्त धनार्जन करने में सक्षम है, लेकिन उसमें उदात्त जीवन-मूल्यों का अभाव है तो उसे पूर्ण रूप से शिक्षित नहीं कहा जा सकता। बीए, एमए, बीएससी, एमएससी, एम.फिल, पीएचडी, डी.लिट., बी.टेक, एम.टेक, एमबीबीएस, एमडी, अथवा अन्य डिप्लोमा-डिग्री प्राप्त कर लेना ही शिक्षा नहीं है। इन कोर्सों में अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हो जाना भी हमारी शैक्षिक योग्यता के स्तर को निर्धारित करने में सक्षम नहीं है। एक डिग्री प्राप्त हो जाने अथवा एक भारी-भरकम पैकेज मिल जाने से शिक्षा के उद्देश्यों की पूर्ति नहीं हो पाती है। शिक्षा क्या है, इसके लिए शिक्षा के वास्तविक स्वरूप को समझने की आवश्यकता है।
मनुष्य का एक परम लक्ष्य होता है नकारात्मक भावों से मुक्त होकर आत्म-विकास करना। दूसरों के विकास में बाधा न बनते हुए स्वयं का विकास ही शिक्षा है। शिक्षा के लिए ज्ञान शब्द का प्रयोग भी किया जाता है। शिक्षा या विद्या की तरह ज्ञान भी विषयों अथवा पदार्थों का नहीं होता। बाह्य जगत का ज्ञान तो सूचना मात्र है। वास्तविक ज्ञान तो स्वयं के जानने को कहा गया है। जो स्वयं को जानने की दिशा में अग्रसर हो गया, वही सच्चा ज्ञानी और सच्चा शिक्षित है। शिक्षा वास्तव में बाह्य परिर्वतन नहीं, अपितु आंतरिक परिवर्तन है। शिक्षा मनुष्य का रूपांतरण है।
बेशक व्यावसायिक शिक्षा की उपेक्षा नहीं की जा सकती लेकिन येन-केन-प्रकारेण जो मात्र उदरपूर्ति अथवा केवल भौतिक समृद्धि के लिए तैयार करे, वह वास्तविक शिक्षा नहीं। मनुष्य के बाह्य विकास एवं वास्तविक शिक्षा प्राप्ति के लिए साक्षरता तथा औपचारिक शिक्षा दोनों अनिवार्य है।
अनौपचारिक शिक्षा तो हम बिना किसी प्रयास के भी प्राप्त करते रहते हैं, लेकिन हमारी अनौपचारिक शिक्षा अवश्य ऐसी हो जो हमारे रूपांतरण में सहायक हो। इसके लिए भी हमें अपने लिए सही परिवेश, अच्छे मित्रों व सहयोगियों, अच्छी पुस्तकों तथा अच्छी आदतों के चुनाव की योग्यता विकसित करनी होगी। औपचारिक व अनौपचारिक शिक्षा में पूर्ण संतुलन उत्पन्न करके हम सही अर्थों में शिक्षित होने की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं, अपना सर्वांगीण विकास कर सकते हैं। (एजेंसी)



