युवाओं में रोग प्रतिरोधक क्षमता कम होना चिंताजनक 

भारत की युवा पीढ़ी यानी 15 से 49 वर्ष के आयु वर्ग के लोगों के स्वास्थ्य को लेकर एम्स जैसी संस्थाओं और प्रधानमंत्री तक का आंकड़ों के आधार पर चिंता व्यक्त किया जाना बताता है कि कुछ तो ऐसा है जो सही नहीं है। मोटापे या दुबलेपन को गंभीरता से लेने को ज़रूरत है क्योंकि युवाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर ही देश के विकास की नींव टिकी हुई है। 
बीमारी की शुरुआत : अध्ययनों के अनुसार अधिक मोटापा या दुबलापन न केवल बीमारियों का संकेत हैं बल्कि उनसे शरीर द्वारा स्वयं लड़ सकने की क्षमता का निरंतर कम होते जाना है। इसका अर्थ यह है कि समस्या दुतरफा है, एक है गरीबी के कारण पौष्टिक भोजन न मिल पाना और दूसरा है अमीरी होने से ऐसी खुराक लेना, जो कचरे की तरह जमा होकर थुलथुल बनाने लगती है। यह ख़तरनाक होने के साथ मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालती है। सेहत ख़राब हो तो न सकारात्मक सोच बन पाती है और न ही अपने व्यवसाय की ऊंचाइयों तक पहुंचने की इच्छा बाकी रहती है। शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बिगड़ने से रोगों के हमले से मुकाबला करना मुश्किल होता जाता है। संक्रमण से बचाव न कर पाने से विभिन्न प्रकार की बीमारियां अपना घर बना लेती हैं। इस स्थिति में गम्भीर बीमारियों को बहुत बड़ी तादाद में अपने शिकार आसानी से मिल जाते हैं। असामयिक मृत्यु या तिल-तिल कर जीना पड़ता है और समय से पहले बुढ़ापा आने से जीवन निष्क्रिय होकर बोझ बन जाता है जो परिवार और समाज तथा अंत में देश के लिए घातक है।
जो लोग 60 से 90 या अधिक आयु के हैं उनसे अगर पूछा जाए कि तब और अब में क्या अंतर है तो सबसे पहले यही बात सामने आयेगी कि तब प्रकृति के बहुत करीब रहते थे, साधन सीमित होने पर भी दिन भर की मेहनत के बाद थकान महसूस नहीं होती थी, ज़रूरतें कम होने से थोड़े में गुज़ारा होता था, नींद खूब आती थी और पारिवारिक तथा सामाजिक ताना-बाना एक दूसरे के साथ जोड़े रखता था जिससे अकेलापन दूर रहता था। खानपान के मामले में ताज़ा भोजन और पौष्टिकता का मेल रखा जाता था। व्यायाम अनिवार्य था, चाहे सुबह की सैर हो या मैदान में कसरत या उस समय अखाड़ों में जाकर दण्ड बैठक, मुगदर या दूसरे देसी साधनों से शरीर को बलशाली बनाना।
आज की स्थिति यह है कि जनसंख्या दुनिया में सबसे अधिक होने से संसाधनों का बंटवारा असंतुलित होता गया। धनवान तथा आर्थिक रूप से कमज़ोर लोगों के बीच अंतर इतना बढ़ गया कि पौष्टिक आहार हरेक के लिए सुलभ नहीं रहा। ताज़ा फल दूध और अनाज की जगह डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों की बिक्री बढ़ी और अब यह स्थिति है कि प्रत्येक वर्ग इनका आदी होता जा रहा है। युवाओं की समस्या यह है कि वे अधेड़ और वृद्ध होती पीढ़ी के साथ सामंजस्य बैठाने में सहज नहीं हो पाते। आधुनिक रहन सहन अपनाने और नवीनतम टेक्नोलॉजी से लैस उपकरण जुटाने की होड़ में अपने को काम में इतना खपा देते हैं कि उन्हें इसकी कीमत अपने स्वास्थ्य के प्रति बेपरवाह रहने से चुकानी पड़ती है। 
व्यायाम का अर्थ इनके लिए जिम है, जहां ये जब भी वक्त मिल जाए, जाते हैं और अक्सर वजन उठाने, शरीर को तोड़ने-मरोड़ने की हद तक मशीनों का इस्तेमाल करते हैं, जैसे कि मानो ये किसी वेटलिफ्टिंग या रेसलिंग या मुक्केबाज़ी प्रतियोगिता की तैयारी कर रहे हों। ऐसा करने से इनका बदन और मांसपेशियां ये समझ ही नहीं पातीं कि उन्हें ये कैसा बनाना चाहते हैं। नतीजा होता है कि इनका शरीर तरह तरह के खिंचावए दर्द और थकान महसूस करता है और उसे ठीक करने के लिए देसी विदेशी प्रोटीन और विटामिन की गोलियां भोजन की तरह खाते हैं। डॉक्टर के पास जाते हैं तो वह टेस्ट और दवाइयों के परीक्षण से इनकी सेहत से खिलवाड़ और अपनी कमाई करने में लग जाते हैं। 
समस्या का निदान : प्रोसेस्ड फूड और कोला जैसे अनेक पदार्थ अधिक सेवन करने से चर्बी और मोटापे का कारण बनते हैं। ऐसी बीमारियां युवाओं को होने लगी हैं जो कभी उम्रदराज़ लोगों में दिखाई देती थीं। मधुमेह, हृदय रोग से पीड़ित युवाओं की संख्या में वृद्धि चिंता का कारण है। सरकार पोषण अभियान, फिट इंडिया मूवमेंट और योग शिविर जैसे कार्यक्रमों का फोकस इस बात पर है कि संतुलित खानपान, सक्रिय जीवन और मानसिक स्वास्थ्य की देखभाल हो ताकि हृष्ट-पुष्ट और रोग-मुक्त पीढ़ी तैयार हो। 18 से 30 वर्ष के युवाओं में अधिक और कम वजन होने का अनुपात लगभग बराबर है। शरीर की कमज़ोरी तनाव का कारण है, आत्मविश्वास कम और ज़्यादा से ज़्यादा कमाई करने के चक्कर में हालत बाद से बदतर होकर बीमारी और मृत्यु का ख़तरा बढ़ जाता है। यह समझना ज़रूरी है कि कुपोषण का संबंध अमीरी या गरीबी से नहीं है बल्कि आदतों से है। जहां पौष्टिक अनाज, फल, सब्जियां मौसम के अनुसार सस्ती और ताज़ा मिल जाती हैं वहीं ये किसी भी मौसम में और कहीं भी डिब्बों में आकर्षक पैकिंग के साथ महंगे दाम पर मिलती हैं। स्वस्थ युवा बने रहना है तो खानपान और दिनचर्या में बदलाव करना होगा ताकि देश के लिए सर्वश्रेष्ठ योगदान कर सकें।

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