अमरीकी चक्रव्यूह में फंसे ईरान को तारणहार की तलाश !

खाड़ी देश ईरान में बढ़ते जन-असंतोष से अमरीका-इज़रायल की पौ बारह हो चुकी है। जिस तरह से जन-असंतोष भड़का, उससे तो यही प्रतीत होता है कि देर-सबेर ईरान को घुटने टेकने ही पड़ेंगे या फिर चीन-रूस-तुर्किये के अलावा इस्लामिक देशों का साथ लेकर उसे अपने अस्तित्व की रक्षा करनी होगी हालांकि वेनेजुएला का नजीर उसके सामने है। अमरीका जो चाहता है, कर लेता है। यहां भी रूस-चीन उसके राष्ट्रपति को नहीं बचा पाए। इसलिए यक्ष प्रश्न है आखिर ईरान कैसे अमरीकी चक्रव्यूह  को भेदेगा? क्या चीन-रूस-तुर्किये समेत 56 मुस्लिम देश ईरान की मदद को आगे आएंगे और उसका तारणहार बनेंगे? ऐसा सुलगता सवाल इसलिए कि ईरान अमरीकी दबाव, सैन्य धमकियों और आंतरिक विरोध प्रदर्शनों के बीच गंभीर संकट में फंसा हुआ है, जहां ट्रम्प प्रशासन हमले विकल्पों पर विचार कर रहा है। ऐसे में ईरान के पास प्रतिक्रिया के सीमित लेकिन रणनीतिक विकल्प बाकी हैं, जो सैन्य, कूटनीतिक और आर्थिक क्षेत्रों में फैले हैं। हालांकि, ईरान को यह ध्यान रखना होगा कि रूस या चीन के भरोसे वह कोई जोखिम नहीं उठाए, क्योंकि वेनेजुएला का उदाहरण उसके सामने है। 
बेहतर होगा कि ईरान दुनिया के 56 मुस्लिम देशों के साथ रक्षा समझौता करे। इससे उनकी इस्लामिक सियासत की परीक्षा भी हो जाएगी, क्योंकि अधिकांश मुस्लिम देश तो अमरीका व यूरोप के गठजोड़ के समक्ष नतमस्तक रहते हैं। वहीं ईरान को इराक व सीरिया के हश्र से भी सबक लेनी चाहिए लेकिन अफगानिस्तान मॉडल को अपनाकर देर-सबेर ईरान खुद को अमरीकी चंगुल से बचा सकता है। इसलिए ईरान आत्मरक्षार्थ सैन्य विकल्प आजमाने हेतु अपनी रणनीति मज़बूत करे क्योंकि ईरान अपनी मिसाइल क्षमता और क्षेत्रीय प्रॉक्सी ताकतों (हिजबुल्लाह, हूती, इराकी मिलिशिया) का उपयोग करके अमरीकी और उसके सहयोगियों के ठिकानों पर हमला कर सकता है। साथ ही होर्मुज जलडमरू मध्य बंद करना या अमरीका के खिलाफ साइबर हमले भी संभावित हैं, लेकिन ये पूर्ण युद्ध को आमंत्रित कर सकते हैं।
शायद इसलिए ईरान को कुटनीतिक रास्ते अपनाने होंगे। ईरान अमरीका के विशेष दूत स्टीव विटकॉफ  के साथ संवाद को पुन: शुरू कर सकता है जैसा विदेश मंत्री अराघची ने संकेत दिया है, वहीं क्षेत्रीय सहयोगियों (रूस, चीन) से समर्थन मांगना या परोक्ष वार्ता भी एक प्रयास हो सकता है। ईरान आर्थिक प्रतिरोध भी कर सकता है। इस हेतु ईरान अमरीकी प्रतिबंधों के बावजूद तेल निर्यात जारी रखे या वैकल्पिक व्यापारिक रास्ते (चीन, तुर्की) मजबूत करे जो ईरान की सफल रणनीति साबित हो सकती है।  हालांकि, ईरान का आर्थिक संकट गहरा रहा है जो उसकी आंतरिक अस्थिरता को बढ़ा सकता है। मौजूदा जन-असंतोष की यही वजह है।
जहां तक ईरान की आंतरिक स्थिरता की बात है तो विरोध दबाने के लिए आईआरजीसी और बसीज तैनाती बढ़ाना जारी है, लेकिन यह विद्रोह को भड़का सकता है। जिस तरह से ईरानी सेना उपद्रवियों का दमन कर रही है, उससे जन-असन्तोष और भड़क सकता है और भड़क भी रहा है, क्योंकि प्रदर्शनकारियों को अमरीका, रजा शाह और इज़रायल का पूरा सहयोग व नैतिक समर्थन मिल रहा है। इसलिए ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम को तेज कर सकता है, क्योंकि ऐसा करना उसकी हिफाजत का अंतिम हथियार हो सकता है। कहना न होगा कि ईरान पर अमरीकी प्रतिबंधों और आर्थिक संकट ने भारी दबाव डाला है, जहां मुद्रा अवमूल्यन और 64 प्रतिशत खाद्य महंगाई आम जनता को प्रभावित कर रही है। फिर भी कुछ राहत के रास्ते बचे हैं—मुख्यत: चीन और रूस जैसे सहयोगियों के साथ तेल व्यापार। ईरान के तेल निर्यात पर ही उसका सब कुछ निर्भर है। चीन ईरान का 90 प्रतिशत तेल खरीदता है जो स्वतंत्र रिफाइनरियों को छूट पर बेचा जाता है जिससे उत्पादन पूर्व-प्रतिबंध स्तर पर पहुंचा। वहीं, रूस को ईरान का निर्यात बढ़ा (2022 में 692 डालर मिलियन) है जो वैकल्पिक बाज़ार प्रदान करता है। जहां तक कूटनीतिक प्रयास की बात है तो विदेश मंत्री अराघची प्रतिबंध हटाने के लिए जोसीपीओए जैसी वार्ताओं को आगे बढ़ा रहे हैं जो आर्थिक सुधार ला सकती हैं।
हालांकि अमरीका से प्रमुख राहत की मांग राजनीतिक बदलाव पर निर्भर है। जहां तक आंतरिक उपाय की बात है तो सरकार मासिक 7 डालर भुगतान और सब्सिडी क्रेडिट दे रही है, लेकिन ये अपर्याप्त हैं। वहीं, होर्मुज जलमार्ग का सामरिक महत्व व्यापार बनाए रखने में मदद करता है। चूंकि ईरान को उसके आर्थिक संकट में तत्काल राहत प्रदान करने के लिए चीन, रूस और तुर्की जैसे प्रमुख देश हैं, जो उसकी मदद कर सकते हैं, खासकर तेल खरीद और व्यापार के माध्यम से समर्थन दे सकते हैं क्योंकि ये देश ही अमरीकी प्रतिबंधों को दरकिनार कर ईरान को आर्थिक सांस प्रदान करते हैं। इसमें चीन का योगदान अधिक है। चीन ईरान का सबसे बड़ा तेल खरीदार है जो 77.90 प्रतिशत निर्यात सोखता है और 400 अरब डॉलर निवेश का वादा कर चुका है। यह तत्काल नकदी प्रवाह सुनिश्चित करता है।
वहीं रूस का समर्थन भी ईरान को प्राप्त है। रूस ने निर्यात को 692 मिलियन डालर तक बढ़ाया और संयुक्त ब्रिक्स प्रयासों से आर्थिक सहायता दे सकता है। दोनों देश प्रतिबंध-विरोधी व्यापार बढ़ा रहे हैं। वहीं ईरान को अन्य संभावित स्रोत से भी मदद लेनी चाहिए। जैसे तुर्की और यूएई ईरान के व्यापारिक साझेदार हैं (2022 में 10-37 अरब डालर) जो सीमापार लेन-देन से त्वरित मदद दे सकते हैं। हालांकि, ईरान के व्यापारिक सहयोगियों पर ट्रम्प के नए 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने से ये रास्ते जटिल हो रहे हैं। जहां तक तेल व्यापार का पैमाना है तो 2025-26 में चीन ने ईरान से प्रतिबंध-विरोधी तरीके से 1.5 मिलियन बैरल प्रतिदिन तेल आयात किया, जो टेकआवे रिफाइनरियों के जरिए होता है। इससे ईरान को प्रतिबंधों के बावजूद जीडीपी का 10-15 प्रतिशत राजस्व मिला।
वहीं ईरान में निवेश और ऋण से भी चीन मदद कर रहा है। चीन ने 25 अरब डॉलर से अधिक ऊर्जा क्षेत्र में निवेश किया, जिसमें सड़क, रेल और बंदरगाह परियोजनाएं शामिल हैं। ब्रिक्स ढांचे में अतिरिक्त वित्तीय सहायता संभव है, जो तत्काल राहत दे सकती है। फिर भी चीन की अपनी सीमाएं हैं। ईरान के कारोबारी सहयोगियों पर ट्रम्प ने नया 25 प्रतिशत टैरिफ बढ़ाने का जो दांव चला है, उससे ईरान के सहयोगियों पर दबाव बढ़ा है, लेकिन चीन ने प्रतिबद्धता जताई है। कुल मिलाकर, यह समर्थन ईरान की अर्थव्यवस्था को ढहने से बचा रहा है।
ईरान का पड़ोसी इराक भी अमरीका का सहज शिकार बन चुका है। मसलन, वैश्विक स्तर पर अमरीका को यही स्थिति प्राप्त है। वह बारी-बारी सबको दंडित करता है, लेकिन उसकी आर्थिक, तकनीकी व सैन्य समृद्धि के सामने कोई भी देश हद से ज्यादा बोल नहीं सकता है। आलम यह है कि लोकतंत्र के नाम पर वह पूरी दुनिया में घूम-घूम कर संघर्ष के हालात पैदा करता है और फिर हथियार व अन्य साजो-सामान बेचता है। कहा जाता है कि उसका डीप स्टेट यही चाहता है। उसके रणनीतिकारों ने दुनियाभर में अपने पूंजीपति पैदा किये हैं जो अपने-अपने देश के नेताओं के दिल-दिमाग पर काबिज़ हैं और अमरीका के लिए लाभदायक स्थिति पैदा करते-करवाते रहते हैं। इस दिशा में जो भी उसके समकक्ष खड़ा होना चाहता है और अमरीका को खुली चुनौती देने की हिमाकत दिखाता है, अमरीका उसे बर्बाद करने पर तुल जाता है। 
वहीं, अब 2010-20 के दशक में वह चीन-रूस गठजोड़ के पीछे पड़ चुका है और एक-एक करके रूस-चीन के सहयोगियों को कमज़ोर कर रहा है। पहले वेनेजुएला और अब ईरान के घटनाक्रम इसी बात की तस्दीक करते हैं। वैसे तो ब्रिक्स में शामिल भारत, ब्राज़ील, दक्षिण अफ्रीका भी उसके निशाने पर हैं, लेकिन वह इनकी आर्थिक व सैन्य मज़बूती देखते हुए इनके साथ कूटनीति चालें चल रहा है। (युवराज)

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