अनोखी पहल

बहुत बात है कि एक शासकीय पाठशाला में एक गरीब छात्र पढ़ता था। वह पाठशाला में पांच किलोमीटर दूर जंगल में बसे अपने गांव से प्रतिदिन पैदल आता-जाता था। वह पढ़ने में बहुत होशियार था। वह अपनी कक्षा में हमेशा प्रथम आता था। 
एक दिन पाठशाला के प्रधानाध्यापक सत्यप्रकाश वर्मा ने उससे कहा कि रमेश तुम साइकिल क्यों नहीं ले लेते? जिससे तुम्हें आने-जाने में कम समय लगेगा एवं घर का सामने लाने ले जाने में भी सुविधा होगी।  ‘सर! आपकी बात सही है किन्तु मैं बहुत गरीब हूं। मेरे माता-पिता वृद्ध हैं। अभी तक तो मैं कक्षा पांचवीं तक अपने मामा के यहां पढ़ता था। मामा जी ही मेरा खर्च वहन करते थे। लेकिन अब वह इस दुनिया में नहीं हैं।’ 
रमेश की बातें सुनकर प्रधानाध्यापक सत्यप्रकाश वर्मा का हृदय द्रवित हो उठा। वह रात भर विचार करते रहे। उन्होंने सोचा कि यह विद्यार्थी अपनी कक्षा में नहीं पूरी पाठशाला में पढ़ने में तथा बातचीत, व्यवहार में और बॉलीबॉल, फुटबॉल खेलने में भी बहुत होशियार है। इसलिए इस गरीब छात्रा की शासन की ओर से तथा विद्यालय स्टॉफ की तरफ से आर्थिक मदद की जानी चाहिए ताकि यह और अच्छी तरह पढ़कर अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होकर पाठशाला का नाम ऊंचा कर सके।
दूसरे दिन प्रधानाध्यापक सत्यप्रकाश वर्मा ने रमेश छात्र की गरीबी स्थिति एवं उसकी अध्ययन में रुचि एवं लगन के विषय में तथा अपने विचारों को पाठशाला अध्यापक गण एवं अन्य स्टॉप को बताया तो सभी ने उनके विचारों को उत्तम समझकर अपनी स्वीकृति दे दी तथा रमेश को तुरंत ही स्टाफ की ओर से एक नई साइकिल क्रय करके गणतंत्र दिवस के पावन पर्व पर कार्यक्रम के मुख्यातिथि गंगादीन पुरोहित सरपंच के द्वारा रमेश को झण्डा वंदन के समय भेंट स्वरुप प्रदान की गई तो पाठशाला में उपस्थित सभी छात्रा एवं अतिथिगण ने इसको अनोखी पहल बता कर सभी ने भूरि-भूरि प्रशंसा की तथा रमेश ने भी और अधिक मन लगाकर अध्ययन करने का संकल्प लिया। बाद में वह और बड़ा विद्वान बना तथा उसने पाठशाला, क्षेत्र और देश का नाम रोशन किया। (सुमन सागर)

#अनोखी पहल