भारत से न खेलना पाक के लिए नुकसानदेह सिद्ध होगा

पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड ने टी-20 विश्व कप के श्रीलंका में 15 फरवरी को भारत के साथ मैच खेलने से इन्कार कर दिया है। इस फैसले से पाकिस्तान को आगामी समय में भारी नुकसान उठना पड़ सकता है। वैसे भी विगत कुछ वर्षों से क्रिकेट पाकिस्तान के लिए बोझ बनता जा रहा प्रतीत हो रहा है। चर्चा है कि भारत से हार जाने के डर से पाकिस्तान ने मैच खेलने से इन्कार कर दिया है। उल्लेखनीय है कि टी-20 विश्व कप में आठ में से 7 मैच भारत जीता है और पाकिस्तान केवल एक मैच ही जीत पाया है। वर्तमान परिस्थितियों में यह फैसला खेल से अधिक राजनीति से प्रेरित प्रतीत हो रहा है और अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में इसके दूरगामी आर्थिक, कूटनीतिक और संस्थागत दुष्परिणाम निश्चित हैं।
भारत-पाक मुकाबला केवल एक मैच नहीं बल्कि वैश्विक क्रिकेट का सबसे बड़ा व्यावसायिक इवेंट एवं दिलचस्प मुकाबला माना जाता है। इससे आईसीसी, मेज़बान देश, प्रसारण कम्पनियां, प्रायोजक और स्वयं दोनों क्रिकेट बोर्डों को भारी राजस्व प्राप्त होता है। इन परिस्थितियों में यदि पाकिस्तान इस मैच से पीछे हटता है तो पहला सीधा झटका इंटरनेशनल ब्रॉडकास्टर्स को लगेगा जिन्होंने अरबों रुपये का निवेश इस टूर्नामेंट के अधिकारों में किया है। विज्ञापन अनुबंध, स्लॉट बुकिंग और व्यूअरशिप अनुमानों की रीढ़ भारत-पाक मैच पर ही टिकी होती है। मैच रद्द या पाकिस्तान की अनुपस्थिति की स्थिति में प्रसारण कंपनियां आईसीसी से मुआवज़े की मांग करेंगी और यह स्वाभाविक है कि आईसीसी उस क्षतिपूर्ति का बोझ संबंधित बोर्ड यानी पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड (पीसीबी)और अंतत: पाकिस्तान सरकार पर डालने का प्रयास करेगा। विभिन्न मीडिया अनुमानों और पूर्व अनुभवों के आधार पर यह नुकसान लगभग 250 से 300 करोड़ रुपये तक आंका जा रहा है, जो पहले से कज़र्, महंगाई, विदेशी मुद्रा संकट और आईएमएफ की शर्तों से जूझ रहे पाकिस्तान के लिए अत्यंत गंभीर आर्थिक आघात होगा। इतना ही नहीं यदि आईसीसी इसे टूर्नामेंट की अखंडता और अनुबंध उल्लंघन के रूप में देखती है तो उस पर अतिरिक्त जुर्माना भी लगाया जा सकता है, जिससे कुल नुकसान और बढ़ेगा। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे बड़ा शिकार पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड होगा जो पहले ही आर्थिक रूप से कमज़ोर स्थिति में है और जिसकी आय का बड़ा हिस्सा आईसीसी के वितरण और भारत-पाक सीरीज की अप्रत्यक्ष लोकप्रियता पर निर्भर करता है। यदि आईसीसी पाकिस्तान को गैर-पेशेवर व्यवहार या राजनीतिक हस्तक्षेप के लिए दोषी मानती है तो उस पर भविष्य के टूर्नामेंटों की मेजबानी से वंचित किया जा सकता है या प्रतिबंध जैसी कार्रवाई की संभावना भी बन सकती है, जो पीसीबी के लिए लगभग बेहद नुकसानदेह सिद्ध होगी। ऐसी स्थिति में न केवल राजस्व रुकेगा बल्कि खिलाड़ियों का अंतर्राष्ट्रीय पहुंच भी सीमित हो जाएगी। 
पाकिस्तान का यह तर्क कि उसने बांग्लादेश के भारत न आकर खेलने के फैसले के समर्थन में यह कदम उठाया है, तो यह फैसला अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट जगत में ज्यादा महत्व नहीं रखता, क्योंकि आईसीसी का ढांचा द्विपक्षीय राजनीतिक समर्थन नहीं, बल्कि लिखित अनुबंधों और तय कार्यक्रमों पर आधारित होता है। खेल की वैश्विक संस्था भावनात्मक या वैचारिक समर्थन से नहीं, बल्कि व्यावसायिक अनुशासन से चलती है। पाकिस्तान का यह निर्णय उसे नैतिक ऊंचाई नहीं बल्कि प्रशासनिक अविश्वसनीयता की श्रेणी में खड़ा करता है। भारत की स्थिति इस पूरे विवाद में अपेक्षाकृत मज़बूत है क्योंकि बीसीसीआई न केवल आर्थिक रूप से दुनिया का सबसे ताकतवर बोर्ड है, बल्कि आईसीसी की आय का सबसे बड़ा स्रोत भी है। इसलिए किसी भी विवाद में आईसीसी संतुलन साधने का प्रयास करेगी लेकिन अंतत: नुकसान उसी को उठाना पड़ेगा जो आयोजन को बाधित कर रहा है। 
पाकिस्तान में क्रिकेट को लेकर पहले ही अस्थिरता रही है, कभी सुरक्षा कारण, कभी सरकार का हस्तक्षेप, कभी बोर्ड की अंदरूनी राजनीति, इन सबने मिलकर पाक क्रिकेट की विश्वसनीयता को कमज़ोर किया है और यह फैसला उसी कड़ी का अगला अध्याय लगता है। यदि पाकिस्तान वास्तव में क्रिकेट को बचाना चाहता है तो उसे यह समझना होगा कि आधुनिक क्रिकेट केवल खेल नहीं बल्कि वैश्विक उद्योग भी है, जहां भावनाओं से अधिक अनुबंध और पेशेवर प्रतिबद्धता मायने रखती है। भारत के खिलाफ न खेलने का निर्णय घरेलू राजनीति में भले ही तालियां बटोर ले, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय मंच पर यह पाकिस्तान को अलग-थलग करने की दिशा में एक और कदम साबित हो सकता है।
अंतत: नुकसान केवल सरकार या बोर्ड का नहीं होगा बल्कि उन खिलाड़ियों का होगा जिनके करियर, मेहनत और सपने इस अव्यवस्था की भेंट चढ़ जाएंगे। इसलिए यह कहना अतिशयोक्ति नहीं कि इस फैसले से पाकिस्तान ने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी नहीं मारी, बल्कि क्रिकेट रूपी आखिरी सहारे पर भी गहरी चोट की है। 
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