नई चुनौतियों का सामना करने हेतु एकजुट हों विकासशील देश
वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम (डब्ल्यूईएएफ) की 56वीं सालाना बैठक, जो 19 से 23 जनवरी, 2026 को दावोस में ‘ए स्पिरिट ऑफा डायलॉग’ थीम के तहत हुई, वह वैश्विक व्यापार संबंधों में भारी तनाव के माहौल में हुई। अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के उठाए गए कदमों ने देशों के बीच सहयोग के बने-बनाए ढांचे को पूरी तरह से बदल दिया है। दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह आम तौर पर महसूस किया गया कि वैश्विक लड़ाई से बचने के लिए अलग-अलग देशों की ज़रूरतों को पूरा करने के लिए आपसी सहयोग और शांतिपूर्ण तरीके से साथ रहना ज़रूरी है। इसी संदर्भ में बातचीत और अन्तर्राष्ट्रीय झगड़ों को सुलझाने के लिए एक साझे मंच के तौर पर संयुक्त राष्ट्र की स्थापना की गई थी। इसने बच्चों की भलाई, सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए संसाधन जुटाने और मानव जनित एवं प्राकृकि, दोनों तरह की मुश्किलों से निपटने में अहम भूमिका निभायी है। इसने अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को नियंत्रित करने वाले नियम बनाने में भी मदद की है।
1964 में बनी यूनाइटेड नेशंस कॉन्फ्रैंस ऑन ट्रेड एंड डिवेल्पमेंट (अंकटाड) का मकसद विकासशील देशों को वैश्विक व्यापार, निवेश और आर्थिक विकास से फायदा पहुंचाने में मदद करना और उन्हें बराबरी की शर्तों पर विश्व अर्थव्यवस्था में समेकित करना था। अंकटाड नीति विश्लेषण देकर, आम सहमति बनाने में मदद करके और खासकर कम विकसित देशों (एलडीसी) को तकनीकी मदद देकर व्यापार और विकास के लिए एक केन्द्रीय बिंदु के तौर पर काम करता है।
इसी तरह जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ्स एंड ट्रेड (गैट), जो 1947 की एक बहुपक्षीय संधि थी, ने टैरिफ, कोटा और सब्सिडी में कमी करके अन्तर्राष्ट्रीय व्यापार को उदार बनाकर युद्ध के बाद आर्थिक सेहत में सुधार को तेज़ करने की कोशिश की। 1995 में गैट की जगह विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) ने ले ली। हालांकि डब्ल्यूटीओ की विकसित देशों के पक्ष में होने के लिए बहुत आलोचना हुई है, लेकिन ट्रेड-रिलेटेड आस्पेक्ट्स ऑफ इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (ट्रिप्स) और ट्रेड-रिलेटेड इन्वेस्टमेंट मेज़र्स (ट्रिम्स) जैसे समझौतों के कई प्रावधानों का इस्तेमाल विकासशील देश अपने फायदे के लिए कर सकते हैं। ज़रूरी बात यह है कि इन व्यवस्थाओं ने कम से कम अंतर्राष्ट्रीय व्यापार के लिए एक नियम-आधारित प्रणाली दी। ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ (मगा) के नारे के तहत डोनाल्ड ट्रम्प ने डब्ल्यूटीओ और संयुक्त राष्ट्र दोनों को नज़रअंदाज़ करते हुए एकतरफा व्यापार नियम फिर से लिखना शुरू कर दिया। अमरीका ने पेरिस पर्यावरण समझौते सहित 66अन्तर्राष्ट्रीय संगठनों, कन्वेंशन और संधियों से खुद को अलग कर लिया। जैसा कि कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने डब्ल्यूईएफ में अपने भाषण में कहा, ‘अन्तर्राष्ट्रीय व्यवस्था (इंटरनेशनल ऑर्डर) टूट गयी है।’ उन्होंने मध्यम आय वाले देशों से एकजुट होने की अपील की। यह ट्रम्प की नीति की अप्रत्यक्ष आलोचना थी और उसका विरोध था।
ट्रम्प ने अलग-अलग देशों के साथ अलग-अलग बातचीत करके अपना टैरिफ एजंडा लागू करने की कोशिश की, जिससे बहुपक्षवाद कमज़ोर हुआ। अनेक मामलों में कई यूरोपीय देश अमरीका के समर्थक रहे हैं, लेकिन जब ट्रम्प ने ग्रीनलैंड पर जबरन या खरीदकर कब्ज़ा करने की योजना बताई तो इन देशों को अमरीका के एकतरफा फैसले का असर महसूस होने लगा। नतीजतन, यूरोपीय संघ के देश, जिनमें से कुछ कभी औपनिवेशिक ताकतें थीं, अमरीकी चुनौती का सामना करने के लिए दूसरे तरीके तलाशने लगे। यह घटनाक्रम वैश्विक व्यवस्था में बहुध्रुवीयता को मज़बूत करने की दिशा में एक अच्छा कदम है।
इसी संदर्भ में लंबे समय से लंबित भारत-यूरोपीय संघ व्यापार समझौता, जिस पर 2007 से बातचीत चल रही थी, 27 जनवरी, 2026 को सम्पन्न हुआ। इस समझौते पर सावधानी से नज़र रखनी होगी क्योंकि यूरोपीय संघ की बड़ी मांगें, जिसमें बौद्धिक सम्पदा, सरकारी खरीद, कृषि और नियामक मानक भी शामिल हैं, भारत के विकास, औद्योगिक विकास, और जन कल्याण के लिए नीतिगत जगह को हमेशा के लिए रोकना चाहती हैं, जो भारत की आर्थिक सम्प्रभुता, रणनीतिगत स्वायत्तता और नागरिकों की भलाई का उल्लंघन है। इससे विनिर्मित सामान की बाढ़ आ जाएगी, जिससे भारत में उद्योगीकरण में विलोम गति (डी-इंडस्ट्रीयलाइज़ेशन), बड़े पैमाने पर नौकरियों का नुकसान और सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उपक्रमों (एमएसएमई) का विनाश होगा। इसके अलावा यूरोपीय संघ की प्रस्तावित बौद्धिक सम्पदा प्रणाली भारत के जेनेरिक दवा सेक्टर को पंगु बना देगा जिससे ज़रूरी दवाएं महंगी हो जाएंगी और वैश्विक सार्वजनिक स्वास्थ्य के साथ धोखा होगा।
भू-मंडलीय वैश्विक राजनीति में तेज़ी से बदलाव हो रहे हैं और नए रूझान सामने आ रहे हैं। इस नाज़ुक मोड़ पर वैश्विक दक्षिण के विकासशील और सबसे कम विकसित देशों के लिए आपसी सहयोगए शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व, संप्रभुता के सम्मान, हथियारों की होड़ को खत्म करने और आपसी फायदे पर आधारित आर्थिक विकास की अपनी प्रणाली विकसित करना ज़रूरी है। (संवाद)



