सपने पूरे करने के साधन भी उपलब्ध किए जाने चाहिएं
देश में हर वर्ष बजट में कुछ न कुछ ऐसा होता है जो लोकलुभावन, मनभावन होता है और कभी तो आसमान से तारे तोड़ कर ले आने जैसी घोषणाएं कर दी जाती हैं। यह भी कहा जाता है कि बस आप हम पर भरोसा रखिए और जब भी हमें ज़रूरत हो अपना आशीर्वाद अर्थात वोट देते रहिए, आपकी मनोकामनाएं पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी।
सपनों के साथ छल : इसमें संदेह नहीं कि वर्तमान सरकार के पहले दशक और उसके बाद से अब तक काफी कुछ ऐसा हुआ है जो कामनाओं को साकार करने जैसा रहा लेकिन फिर भी बहुत कुछ ऐसा है जो होना चाहिए था, शुरू हुआ लेकिन आधा अधूरा रहा या बंद हो गया। अनेक परियोजनाओं की घोषणाएं फाइलों में सिमटकर रह गईं जिन पर धूल की परत इतनी मोटी जम चुकी है कि किसी की नज़र न पड़े। कुछ उदाहरण हैं—जून 2015 में कहा गया कि देश के 100 शहरों को टेक्नोलॉजी आधारित, सतत विकास की प्रक्रिया से जोड़ा जाएगा अर्थात् यहां रहने वाले अपने जीवन में वह बदलाव देख सकेंगे जो वे अक्सर विदेश यात्रा के समय विकसित देशों में देखते हैं। इन स्मार्ट शहरों में गड्ढों से मुक्त शानदार सड़क, जलभराव से निपटने के साधन, कूड़ा कचरा निस्तारण के उपाय, जितनी ज़रूरत हो उतनी ऊर्जा या बिजली मिलने की व्यवस्था और सभी आवश्यक आधारभूत सेवाएं, उद्यमियों के लिए वन विंडो सिस्टम और सामान्य नागरिक को डिजिटल, ई-गवर्नेंस का तोहफा।
इसके लिए भारी भरकम राशि 48 हज़ार करोड़ रुपये रखी गई। अब आंकड़े बताते हैं कि लगभग 18 शहरों में अब तक काम पूरा हुआ और शेष में कहीं कहीं थोड़ा बहुत काम होता दिखा और बाद में वह भी ठप हो गया। कहीं ज़मीन न मिलने का बहाना बना तो अनेक स्थानों पर रख-रखाव की व्यवस्था का अभाव होने से जो निर्माण कार्य हुए थे, वे मलबे का रूप धारण करने लगे। परिणाम यह हुआ है कि इस पूरी स्मार्ट सिटी योजना को तिलांजलि दे दी गई और इस पर अब तक खर्च हुआ जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा बट्टे खाते में चला गया। अब इस साल के बजट में सिटी इकोनॉमिक रीजन विकसित करने की घोषणा हुई है जिसका हश्र भी स्मार्ट सिटी जैसा ही होने की पूरी आशंका है।
चलिए अब एक और सपने की बात करते हैं। हम अक्सर चीन, जापान और अन्य देशों में तेज़ गति से चलने वाली बुलेट ट्रेन के बारे में सुनते हैं। आश्चर्यचकित होते हैं कि बिना गाड़ी के अंदर या आसपास कोई कम्पन हुए 3-4 सौ की स्पीड से दौड़ना कितना रोमांचक है। कमाल की इंजीनियरिंग और टेक्नोलॉजी तथा साथ में चढ़ने उतरने और प्लेटफार्म पर सुविधाओं को देखकर लगता है कि काश भारत में यह हो पता। कोई बात नहीं, हमारी सरकार ने भी घोषणा कर दी कि 2014-2017 के कालखंड में मुंबई-अहमदाबाद के बीच बुलेट ट्रेन की सवारी करने का आनंद मिल जाएगा। अब कहते हैं कि शायद 2029 तक यह उम्मीद पूरी हो। कहां तो सोचा था कि पूरे देश में एक के बाद एक बुलेट ट्रेनों का दौड़ना संभव हो जाएगा, परन्तु अब इस पर संतोष करना पड़ रहा है कि वंदे भारत ट्रेनें चल रही हैं।
बहुत-सी अनेक ऐसी परियोजनाओं की प्रगति देखने पर निराशा ही हाथ लगती है। हाईवेज यानी राजमार्गों का विस्तार देश के व्यापार करने की सुविधा का महार्वपूर्ण अंग है। इसी तरह बंदरगाहों पर आधुनिक सुविधाओं का होना ज़रूरी है। राष्ट्रीय हो या अंतर्राष्ट्रीय व्यापार, निर्यात हो या आयात, जब तक एक स्थान से दूसरे स्थान तक निर्मित वस्तुओं को लाने ले जाने की निर्विघ्न व्यवस्था नहीं होगी तब तक हम व्यापार में पिछड़े ही रहेंगे। यह बात हाल ही में हुए अंतर्राष्ट्रीय समझौतों को देखते हुए और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है कि जल और ज़मीन के ज़रिए आवागमन की व्यवस्था ही एकमात्र विकल्प है कि हम इन सभी करारों का फायदा अपने लाभ के लिए उठा सकें। यह अच्छा संकेत कि इन साधनों के निर्माण की गति बढ़ी है, लेकिन जो प्रोजैक्ट पिछले वर्ष पूरे होने थे, वे अगले 4-5 साल आगे सरक गए हैं।
देश में रेल नेटवर्क बिछाना केंद्र सरकार के ज़िम्मे आता है, विशेषकर मालगाड़ियों का संचालन जिसके लिए डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर बनाने की ज़रूरत है। इस दिशा में अब तक हुई प्रगति निराशाजनक है। इसका कारण है कि पुरानी लाइनों पर अभी भी यात्री और सामान ले जाने वाली रेलों का एकसाथ चलाया जाना। पैसेंजर ट्रेनों को निकालने के लिए गुड्स ट्रेनों को रोक दिया जाता है जिससे जो आवश्यक औद्योगिक सामग्री है अपने नियत स्थान पर बहुत देर से पहुंचती है। हालांकि, गति शक्ति योजना का लक्ष्य देश की प्रगति के लिए ज़रूरी रेल, सड़क, पोर्ट, जलमार्ग, वायुमार्ग, सार्वजनिक परिवहन और लोजिस्टिक्स इंफ्रास्ट्रक्चर का तेज़ी से विकास करना है, लेकिन इनके पूरा होने में जो बार-बार समय बढ़ा दिया जाता है, वह चिंताजनक ही नहीं, एक तरह से नुकसानदेह भी है।
बाधाएं : अब हम इस बात पर आते हैं कि आखिर हम समय पर काम क्यों नहीं शुरू और पूरा कर पाते। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि प्रशासनिक स्तर पर अधिकारियों का निष्पक्ष और पारदर्शी न होना। इसकी जड़ में एक ही चीज़ है और वह है कि पुराने नियमों का आज के हिसाब से न बदलना और उन्हीं पर अड़े रहने के कारण फाइलों का अंबार लगना। सरकार चाहे कितने भी दावे कर ले, लेकिन कथित रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार भी प्रोजैक्टों में देरी का कारण हो सकता है। जहां तक औद्योगिक विकास प्राधिकरणों की बात है तो उनमें बिना सुविधा शुल्क दिए बरसों फाइलें बिना किसी कार्रवाई के अलमारियों में बंद रहती हैं। वे तभी खुलती हैं जब मुँह मांगा कथित नज़राना दे दिया जाता है। यह सब तब उजागर होता है जब कोई दुर्घटना वर्षों पहले की गई प्रशासनिक लापरवाही के कारण हो जाता है। प्रश्न यह है कि क्या किसी परियोजना के समय पर पूरा न किए जाने को अपराध की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और इसके लिए जो ज़िम्मेदार अधिकारी हैं, उन्हें कड़ी सज़ा का प्रावधान किया जाना चाहिए। राजनीतिज्ञों को तो पांच साल बाद जनता चुनाव के समय जांच परख कर अपना निर्णय सुना ही देती है, लेकिन नौकरशाही और प्रशासन को उनकी लापरवाही की सज़ा कौन देगा? इस दिशा में सरकार को कोई ठोस कदम उठाना ही होगा।



