कुलपति जी के बहाने
हर आदमी की तरह उनका क्त्रमिक विकास हुआ था। माने बँदर से आदमी की तरह। वो भी यानी कुलपति जी भी आदि मानव से ज्ञानी मानव बने थे।
होमोसेपियंस की तरह। लेकिन इस फेर में वो ज्ञानी मानव तो बन गए। लेकिन उनका आदमी बनना बाकी था । उनके अलावे जो लोग ज्ञानी भी थे और हीन थे । लेकिन उनके अनुसार वो ही ज्ञानी थे और वो ही मानव भी थे। इस तरह वे ज्ञानियों के ज्ञानी थे। लेकिन ज्ञान से उनका दूर.दूर तक का कोई नाता नहीं था। वो थे तो ज्ञानी मानव लेकिन हरकतें वो बँदरों की तरह करते थे। लिहाजा उनका मानसिक विकास होमोसेपियंस कि तरह नहीं हुआ था। कुलपति जी का दिमाग अब तक अविकसित था। लेकिन थे तो वो आदमी ही। दो .पैरों पर चलते थे। लेकिन दिमाग से चौपाया थे। इस तरह उनकी जो हरकतें थीं। वो चौपाया जानवरों की तरह थीं। आज उन्का जो क्त्रमिक विकास हुआ था वो केवल शरीर का हुआ था। मन से विचार से वो चौपाया ही थे। वो आज भी जँगली लोगों के बीच रहते थे। कँद .मूलए फल.फूल चुनकर खाते थे। विचार और स्वभाव से जँगली लोगों के साथ रहते. हुए वो भी जँगली हो गए थे। गलती से एक दिन वो प्राध्यापक बने। फिर असिस्टेंट प्रोफेसर ए फिर प्रोफेसर हुए। और गदहों की सोहबत में रहकर गदहे की तरह वो भी सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते गए ।
और जैसा कि ऊपर बताया गया है। वो अँधों में काना राजा थे। उनके आस.पास अँधों की पूरी फौज थी। जो जँगली कानून का हिमायती था। जँगल का कानून जानता था। इस तरह कुलपति जी पूरे जँगली थे। लिहाजा चौपट और अँधी व्यवस्था ने उनको कुलपति तक का सफर करवाया था। और इस तरह वो अँघी .व्यवस्था में काने राजा यानी कुलपति थे। उनको पता नहीं ये क्यों भम्र हो गया था कि वो जो हैंए वो वो ही हैं। उनके जैसा ना कोई हुआ है। ना ही हो सकता है।
तो वे कुलपति थे। उनको हमेशा यही लगता था कि उनको हमेशा पढ़ा और सुना जाना चाहिए। चूँकि स्वभाव से वो जँगली थे। लिहाजा उनकी बातचीत किसी उज्जड़ की तरह लगती थी। कम. से. कम गली .मुहल्लों के आवारा बदमाश लड़कों की तरह। उनको लगता था कि वो कुलपति से पहले शिक्षक हैं। और हर कोई उनका छात्र है। इसलिए उनको ध्यान से सुना जाना चाहिए। उनका सुने जाने में एक अवरोध क्या उत्पन्न हुआ। वो जामे से बाहर आ गए। लेकिन शालीनता की चादर ओढ़े। वैसे ही जैसे कोई नई .नवेली बहू पर्दा या घूँघट डालकर अपने सास.ससुर ए जेठ.जेठानीए ननद .ननदोई से मुँह.जोरी से बात करता हो। नहीं मुझे नहीं लगता कि वो कभी स्कूल गए होंगें। अँधी .व्यवस्था में वो काने राजा थे। अँधी .व्यवस्था में वो संतों .सहित्यकारों को गरियाते थे। कारण कि जब ष्सैंया भए कोतवाल तो डर काहे का ष्। उनको कभी तालीम नहीं मिली थी। वो कृपा से कुलपति बने थे। वो दरबारी भाट थे।
शासन व्यवस्था की चाकरी करते थे। कृपा के कारण कुलपति भए। वो पढ़े.लिखे आदमी हैं। लेकिन बोलना नहीं जानते थे। बोलना आदमी दो साल में सीख जाता है। लेकिन क्या बोलना हैए इसको सीखने में सारी उम्र लग जाती है। जिसको अक्षर ज्ञान नहीं है। वो भी बोली में मिठास भरकर बोलता है। सोच समझकर बोलता है। मिठास भरकर बोलना तहजीब में बोलना देहातियों का काम है। बड़े लोग तो धमकाकर बोलते हैं।
लेकिन सवाल उठता है कि वो बरजे क्यों या गरजे क्यों।
ये भी हो सकता है कि वो मुँहजोरी पर तभी उतर आए होंगें। यदि उनको उनके बॉस ने डाँटा होगा। लेकिन उनका बोस कौन हो सकता है। वो तो यत्र.तत्र.सर्वत्र हैं। वो नियंता हैं। वो ही नियामक हैं। वो किसी की भी ऐसी .तैसी कर सकते हैं। लेकिन ऐसा कब होता है। जब आप अपने किसी अधीनस्थ से बात कर रहें हों । लेकिन वो समर्थ हैं। कहा भी गया है ष् समरथ को नहीं दोष गुसाईं। ष्मेहमान से कोई ऐसे बोलता है।
कमाल कि बात है कि असहजता पर बात होने लगी है। पीड़ा पर बात होने लगी है। भाई कुलपति जी ये आश्चर्य की बात है कि किसी सरकारी आदमी को आम आदमी की पीड़ा दिखाई दे रही है। ये रामराज्य से कम थोड़ी है।
यहाँ पेंशन लेने के लिए हर साल बैंक में चेहरा दिखाना पड़ता है। यहाँ आप दिल की पीड़ा जान लेतें हैं । आपको कुलपति नहीं बाबा होना चाहिए था।
जहाँ सरकारी कृपा से मुर्दे चावल उठा ले रहें हैं। जो सालों पहले मर गए वो आवास ले रहें हैं।
असहजता से अमिताभ बच्चन की फिल्म ष् जँजीरष् याद आती है। संवाद कुछ इस तरह का है कि ष् ये तुम्हारे बाप घर नहीं है। जब तक बैठने को ना कहा जाए। शराफत से खड़े रहो। ष् उनको देखकर . सुनकर ऐसा लगता है कि कभी वो अदब को नहीं जाने।
कभी गूगल नहीं किया। कभी साहित्य और साहत्यकारों को नहीं पढ़ा। वो केवल यूनिवर्सिटी से घर और घर से यूनिवर्सिटी आते. जाते रहे।
कभी किसी साधारण प्रतिभा से नहीं मिले। कभी उन्होंने कहानियों को नहीं पढ़ा। कभी मुशायरो में नहीं गए। कभी किसी को ठीक से नहीं सुनाघ्
और झपकी लेना मँहगा पड़ गया । सरकारी काम और सरकारी अधिकारियों को हमने इतना चुस्त. दुरूस्त कभी नहीं देखा होगा। हो सकता है आपकी इस तत्परता से वे लोग जागें। जनता की पीड़ा समझें। जितना हमने देखा फाइलों पर जब तक चढ़ावा नहीं रखा जाए। तब तक फाईलें आगे नहीं बढ़ती हैं। ऐसे समय में कुलपति जी ने झपकी लेते देख लिया । यहाँ तो हमारे माननीय इतने सुस्त हैं कि वो सदन में रील्स और पोर्न देखते पकड़े गए हैं। भाई जैसे साँस लेना अधिकार सको है। वैसे ही झपकी लेना का अधिकार सबको है । सबका अपना अपना कंफर्ट जोन होता हैए कुलपति जी।



