कहानी - प्रतिशोध

डा. महेश की निगाहें अचानक सड़क किनारे लगे एक साइन बोर्ड पर जाकर टिक गयी। ‘माया नर्सिंग होम, गरीब बेबस लोगों के लिए निशुल्क सेवा’। 
डा. महेश अपनी गाड़ी से उतर गये और माया नर्सिंग होम की तरफ आंखें गड़ा दी। लोगों से सुना था कि इस नर्सिंग होम की मालकिन डा. माया दया- करूणा की देवी है। उनके लिए नर्सिंग होम पैसा कमाने का साधन नहीं था बल्कि दीन-दुखियों की सेवा करना ही मुख्य उद्देश्य था। यह नर्सिंग होम पूरे शहर में कम खर्चें पर इलाज के लिए प्रसिद्ध है, तो गरीबों के लिए संजीवनी से कम नहीं। यही कारण है कि डा. माया लोगों की नज़रों में दया-करूणा की देवी बन गयी। 
डा. महेश नर्सिंग होम की ओर बढ़ गये। भीतर का दृश्य देखकर वे प्रसन्नता से खिल उठे। डा. माया स्वयं हर मरीज का हालचाल पूछ रही थी। हर किसी के दु:ख -दर्द को कम करने का प्रयास कर रही थी।
डा. महेश डा. माया को एकटक निहारते हुए अतीत में खो गये। 
माया अस्पताल में नर्स बनकर आयी थी। उसे लोगों को पीड़ा से कराहते देख बड़ा मजा आता था। उसमें दया नाम की कोई चीज नहीं थी। मरीज को तड़पना ही उसकी फितरत थी। चाहे मरीज कितना ही नाजुक स्थिति में क्यों न हो, वह उसे तड़पते देख मंद-मंद मुस्कुराते रहती। यह देखकर उनका हृदय कांप जाता, लेकिन माया निष्ठुरता की सारी हदें पार कर देती। 
एक दिन दुर्घटना में घायल एक व्यक्ति को अस्पताल में लाया गया। उसकी हालत चिंताजनक बनी हुई थी और वह दर्द से छटपटा रहा था। डा. महेश ने उसे फौरन दर्द निवारक सुई देने का आदेश माया को दिया, लेकिन वह उनकी बातों को दरकिनार कर उसे अजीब निगाहों से देखते हुए मुस्कुरा रही थी। 
यह देखकर डा. महेश माया के हाथ से सुई लेकर स्वयं लगा दी, तब जाकर उसकी तड़प कम हुई और अस्पताल के कर्मचारी को फौरन ऑक्सीजन लगाने का आदेश दिया। वही माया मुस्कुराते हुए वहां से निकल गयी। डा. महेश को माया का यह व्यवहार अच्छा नहीं लगा। 
वे सोच में पड़ गये- ‘इतनी खूबसूरत, कोमल और कमनीय माया इतनी कठोर कैसे हो गयी? उसके हृदय में तड़पते मरीज को देखकर दया-करूणा का भाव क्यों नहीं उमड़ता? वह इतनी निष्ठुर कैसे हो सकती है? फिर वह डॉक्टर की पढ़ाई की थी, लेकिन नर्स की नौकरी क्यों की?’ डा. महेश के मन-मस्तिष्क में न जाने कितने सवाल कौंध रहे थे। वे वहां से अपने केबिन में आकर बैठ गये। वे माया को अपने केबिन में बुलवाया। माया उनके पास आकर खड़ी हो गयी। 
‘नर्स की नौकरी क्यों की? तुम्हें तो ऐसी नौकरी करनी चाहिए थी जहां निष्ठुरता हो। क्या तुम्हारे हृदय में दर्द से तड़पते मरीजों को देख दया का भाव नहीं उमड़ता? तुम इतनी कठोर हृदय की कैसे बन गयी? नर्स तो मरीज के लिए संजीवनी का कार्य करती है। ईर्ष्या, द्वेष से परे नर्स का मरीजों की सेवा करना ही परम धर्म है। फिर तुम्हें मरीज को तड़पाने में मजा क्यों आता है?’ डा. महेश क्रोधित स्वर में बोले। 
‘डाक्टर! मैं यही नौकरी करना चाहती थी, जहां दर्द ही दर्द हो। लोगों की चीत्कार मेरे लिए मधुर संगीत है। उनका तड़पना और मौत के मुंह जाना मुझे आनंद की अनुभूति कराता है। जहां आंसुओं का सैलाब उमड़ता हो, मौत का तांडव होता हो ऐसी ही नौकरी की मुझे चाहत थी। मेरे हृदय में दया-करूणा का भाव नहीं उमड़ता बल्कि उनकी चीख-पुकार में मुझे संगीत की मधुर ध्वनियां सुनाई देती है। ऐसा परमानंद मुझे कहीं और नहीं मिल सकता था।’ माया मुस्कुराते हुए बोली। 
‘नाम है माया और काम है लोगों को तड़पाना। तुम अपना नाम बदल डालो और इस नौकरी से इस्तीफा दे दो। ये काम एक नर्स का नहीं हो सकता, बल्कि यह काम एक चांडाल का है। नाम के विपरीत तुम्हारा कर्म है। तुम्हें यह सब कहते हुए जरा भी शर्म नहीं आती। नर्स दया-करूणा की देवी होती है जो बिना किसी भेदभाव के अपनी सेवा से लोगों का दर्द हर लेती है। तुम तो कठोरता की देवी हो। कठोर होने के बावजूद मरीजों की तड़प देखकर पत्थर भी पिघल जाएगा, लेकिन तुम निष्ठुरता की सारी हदें को पार गयी हो।’ डा. महेश तीखी आवाज में बोले। 
‘आपको जो कहना हो कहिये। न मैं इस नौकरी से इस्तीफा दूंगी और न मैं दया-करूणा की देवी बनूंगी। मुझे दर्द से प्यार है और इस प्यार को कभी कम नहीं होने दूंगी। मैं ऐसी ही नौकरी की तलाश में थी जहां सिर्फ आंसू ही आंसू हो! जहां हर रोज मौत का तांडव होता हो। जहां घावों का मंजर हो। इन चीखते-चिल्लाते लोगों की दुनिया में आनंद ही आनंद है।’ माया एक तीखी मुस्कान के साथ बोली। 
‘माया! मानवता को कलंकित मत करो। एक नर्स के मुंह से ऐसी बातें शोभा नहीं देती। एक नर्स का सबसे बड़ा धर्म है रोगी की सेवा करना। उसे मौत के मुंह से निकाल लाना न कि उसे मौत के मुंह मे ढकेल देना। तुम इस पेशे को कलंकित मत करो। मानवता की सेवा कर अपने जीवन यात्रा को यादगार बनाओ। कुछ ऐसा कर जाओ जो समाज के लिए मिसाल बने। कर्म ही इंसान को महान और पूजनीय बनाता है। अपने स्वभाव में परिवर्तन लाओ और अपने जीवन को लोगों के लिए समर्पित कर दो। कल सुबोध का ऑपरेशन है, तुम मेरे साथ रहोगी। जरा उसे बेचारे का हाल-चाल भी जान लिया करो।’ डा. महेश उसे समझाते हुए बोले। 
सुबोध का नाम सुनते ही माया क्रोध से कांप गयी और बोली- ‘वह कल का सूरज नहीं देख पायेगा। यदि वह बच भी गया तो मैं कल आपके साथ ऑपरेशन में नहीं रहूंगी। मेरी तबियत खराब है। कल छुट्टी पर रहूंगी।’
(क्रमश:)

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