भारत की पहली महिला कुलपति राजकुमारी अमृत कौर

भारत के उच्च शिक्षा इतिहास में राजकुमारी अमृत कौर का नाम केवल इसलिए महत्वपूर्ण नहीं है कि वे स्वतंत्र भारत की पहली महिला स्वास्थ्य मंत्री बनीं, बल्कि इसलिए भी कि वे भारत में किसी विश्वविद्यालय की पहली महिला कुलपति बनीं। उनका समूचा जीवन शिक्षा, सेवा, राष्ट्रनिर्माण और महिला सशक्तिकरण की एक अद्वितीय मिसाल है। राजकुमारी अमृत कौर का जन्म 2 फरवरी 1889 को पंजाब के कपूरथला रियासत में हुआ था। वे कपूरथला के महाराजा हरनाम सिंह की पुत्री थीं। राजघराने में जन्म लेने के बावजूद उनका झुकाव बचपन से ही वैभव की बजाय मानव सेवा और अनुशासन की ओर था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा शिमला में हुई और आगे की पढ़ाई के लिए उन्हें इंग्लैंड भेजा गया। वहां उन्होंने प्रतिष्ठित संस्थानों में अध्ययन किया और अंग्रेज़ी साहित्य, इतिहास तथा दर्शन में विशेष रुचि विकसित की। ब्रिटेन में अपने अध्ययन के दौरान उन्होंने पश्चिमी शिक्षा प्रणाली को निकट से समझा। यही अनुभव आगे चलकर भारत में शिक्षा सुधारों के लिए उनके काम आया।
महात्मा गांधी से मुलाकात 
इंग्लैंड से लौटने के बाद अमृत कौर का संपर्क महात्मा गांधी से हुआ। गांधी जी के विचारों ने उनके जीवन की दिशा ही बदल दी। उन्होंने सादा जीवन अपनाया, विदेशी वस्त्र त्यागे और स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रूप से जुड़ गईं। वे गांधी जी की निकट सहयोगी बनीं और कई आंदोलनों में हिस्सा लिया। कई बार जेल भी गईं। एक राजकुमारी का जेल जाना उस समय समाज के लिए अत्यंत प्रेरणादायक घटना थी। गांधी जी के विचारों/सत्य, अहिंसा, स्वदेशी और समानता ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। उन्होंने राजसी जीवन त्यागकर गांधी जी के आश्रम में रहना स्वीकार किया। खादी पहनना, सादा भोजन करना और सेवा को जीवन का उद्देश्य बनाना उनके दैनिक जीवन का हिस्सा बन गया। उनके अन्दर का यह परिवर्तन केवल बाहरी नहीं था, बल्कि उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन को राष्ट्र और समाज की सेवा के लिए समर्पित कर दिया।
स्वतंत्रता संग्राम में योगदान 
राजकुमारी अमृत कौर ने कई आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी निभाई-असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा भारत छोड़ो आंदोलन के औरां वह कई बार जेल गईं और कठोर परिस्थितियां झेलीं। उनका विशेष योगदान महिलाओं को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने में रहा। वे महिला स्वयंसेविकाओं को संगठित करती थीं और गांव-गांव जाकर लोगों को स्वतंत्रता संग्राम के लिए प्रेरित करती थीं। उनकी निर्भीकता और संगठन क्षमता के कारण वे कांग्रेस नेतृत्व की भरोसेमंद सहयोगी बन गईं। वह महिला सशक्तिकरण की अग्रदूत रहीं, वह मानती थीं कि जब तक महिलाएं शिक्षित और आत्मनिर्भर नहीं होंगी, तब तक राष्ट्र सशक्त नहीं बन सकता। उन्होंने महिला शिक्षा, बाल विवाह उन्मूलन, विधवा पुनर्विवाह और स्त्री स्वास्थ्य जैसे विषयों पर जोरदार अभियान चलाए। राजकुमारी अमृत कौर ऑल इंडिया वीमेंस कॉन्फ्रैंस की प्रमुख नेताओं में रहीं और लंबे समय तक इसकी अध्यक्ष भी रहीं। इस मंच के माध्यम से उन्होंने महिलाओं की आवाज़ को राष्ट्रीय स्तर पर मजबूत किया।
स्वतंत्र भारत की पहली महिला स्वास्थ्य मंत्री 
आजादी के बाद 1947 में बने पहले मंत्रिमंडल में उन्हें भारत की केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री बनाया गया। इस भूमिका में उन्होंने एम्स जैसे राष्ट्रीय संस्थान की नींव रखी और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं पर जोर दिया। टीबी और मलेरिया नियंत्रण कार्यक्रम उन्हीं के जरिये शुरू किए गये। राजकुमारी अमृत कौर केवल पदों तक सीमित नहीं थीं। वे व्यवहारिक रूप से महिलाओं को आगे बढ़ाने में विश्वास करती थीं। उन्होंने महिला डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने के लिए विशेष योजनाएं बनाईं। नर्सिंग को सम्मानजनक पेशे का दर्जा दिलाने में योगदान दिया। लड़कियों की उच्च शिक्षा के लिए उन्होंने फंड स्थापित किए।
भारत की पहली महिला कुलपति
अमृत कौर मानती थीं, ‘यदि भारत को सशक्त बनाना है तो महिलाओं को शिक्षित करना सबसे पहली शर्त है।’ उनका विश्वास था कि विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाली संस्थाएं नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण और सामाजिक चेतना के केंद्र होने चाहिए। स्वतंत्रता के तुरंत बाद उन्हें दिल्ली विश्वविद्यालय का कुलपति नियुक्त किया गया। यह नियुक्ति ऐतिहासिक थी; क्योंकि इससे पहले किसी महिला को भारत में विश्वविद्यालय का सर्वोच्च शैक्षणिक पद नहीं मिला था। 
उच्च शिक्षा में नेतृत्व के स्तर पर उनके रूप में यह पहली महिला एंट्री थी। उन्होंने पुरुष-प्रधान अकादमिक व्यवस्था को चुनौती दी थी। उनके जरिये महिलाओं को शिक्षा प्रशासन में आगे आने का मार्ग प्रशस्त हुआ। कुलपति के रूप में उनका कार्यकाल कई महत्वपूर्ण पहलों का जरिया बना। कुलपति रहते हुए उन्होंने शैक्षणिक गुणवत्ता पर जोर दिया। उन्होंने पाठ्यक्रमों को आधुनिक और शोध-उन्मुख बनाने पर बल दिया। महिला छात्रों के लिए बुनियादी सुविधाएं मुहैय्या करवाईं। उन्होंने महिला छात्रावास, छात्रवृत्ति और सुरक्षा संबंधी व्यवस्थाओं को मज़बूत किया। वे मानती थीं कि शिक्षा केवल जानकारी नहीं बल्कि संस्कार भी देती है। उन्होंने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को विश्वविद्यालय स्तर पर प्रोत्साहन दिया।
निजी जीवन 
 उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया। उनका पूरा जीवन देश सेवा को समर्पित रहा। वे खादी पहनती थीं, साधारण भोजन करती थीं और निजी संपत्ति को महत्व नहीं देती थीं। विश्व स्वास्थ्य संगठन और अन्य अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर भारत का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्होंने भारतीय दृष्टिकोण को मजबूती से रखा। उन्हें कई अंतर्राष्ट्रीय सम्मानों से भी नवाजा गया। 6 फरवरी 1964 को नई दिल्ली में उनका निधन हुआ। परंतु उनका कार्य और विचार आज भी जीवित हैं।
विरासत 
 राजकुमारी अमृत कौर की सबसे बड़ी विरासत यह है कि उन्होंने साबित किया कि महिलाएं शिक्षा प्रशासन में उत्कृष्ट नेतृत्व दे सकती हैं। उन्होंने उच्च शिक्षा को समाज सुधार से जोड़ा और सत्ता को सेवा का माध्यम बनाया। आज भारत में दर्जनों महिला कुलपति हैं- यह स्थिति उसी ऐतिहासिक शुरुआत की देन है जो अमृत कौर ने की थी।
अंतिम शब्द 
 राजकुमारी अमृत कौर का जीवन इस बात का प्रमाण है कि साहस, शिक्षा व सेवा मिलकर समाज की तस्वीर बदल सकते हैं। भारत की पहली महिला कुलपति के रूप में उन्होंने केवल एक पद नहीं संभाला बल्कि एक नई परंपरा की नींव रखी। वे उन स्त्रियों की अग्रदूत हैं जिन्होंने विश्वविद्यालयों की दीवारों के भीतर और बाहर दोनों जगह- इतिहास रचा।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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