संगीत के सुल्तान ओपी नय्यर के सौ साल

असाधारण प्रतिभा के धनी व विख्यात संगीतकार ओमकार प्रसाद नय्यर जो ओपी नय्यर के नाम से अधिक जाने जाते हैं, ने कभी भी लता मंगेशकर की आवाज़ का इस्तेमाल अपनी बनायी धुनों के लिए नहीं किया, यह अलग बात है कि लता की बहन आशा भोंसले की आवाज़ में उन्होंने सैंकड़ों सदाबहार गीत रिकॉर्ड कराये। नय्यर लता को इतना नापसंद करते थे या उनका विरोध करते थे कि मध्यप्रदेश सरकार जो पुरस्कार लता के नाम पर देती है उसे भी उन्होंने लेने से इंकार कर दिया था। 
एक स्वतंत्र संगीतकार के रूप में ओपी नय्यर की पहली फिल्म ‘आसमान’ (1950) थी। इस फिल्म में लता को ‘मोरी निंदिया’ गाने के लिए अनुबंध किया गया था। राजू नामक व्यक्ति को लता को बुलाने के लिए भेजा गया ताकि गाने की रिकॉर्डिंग हो सके। लता ने राजू से मालूम किया कि संगीतकार कौन है? राजू ने जब नय्यर का नाम बताया तो लता, जो उन दिनों ‘महल’ (1949), ‘अंदाज़’ (1949) व ‘बरसात’ (1949) की कामयाबी के कारण आसमान में उड़ रही थीं, ने कहा कि वह तो उन्हें जानती नहीं और वह हर किसी के साथ काम नहीं करतीं। राजू ने यही जाकर नय्यर को बता दिया और नय्यर ने कभी लता के साथ काम नहीं किया। नय्यर इतने तुनकमिजाज थे कि एक बार मोहम्मद रफी उनकी रिकॉर्डिंग के लिए लेट हो गये कि शंकर-जयकिशन की रिकॉर्डिंग में समय लग गया था, तो नय्यर ने उनके साथ भी काम करना बंद कर दिया था, जबकि रफी उनके पसंदीदा गायक थे। फिर जब दोनों एक जगह टकराये तो रफी ने उनसे देर से आने के लिए माफी मांगी तो नय्यर ने ‘इतना बड़ा गायक अगर माफी मांगेगा तो मेरे पास विकल्प क्या है’ कहते हुए रफी को माफ कर दिया, जबकि बताया यह भी जाता है कि रफी के बिना नय्यर की फिल्में सफल नहीं हो रही थीं, इसलिए उन्हें रफी की ओर लौटना पड़ा। लेकिन जो प्रतिद्वंदिता व कड़वाहट नय्यर और लता के बीच थी वह कभी समाप्त न हो सकी और दुनिया बेहतरीन धुनों व शानदार आवाज़ के संगम से वंचित रही।   
लता की बहन आशा भोंसले के साथ नय्यर ने बहुत लम्बे समय तक काम किया, लेकिन इस संबंध का अंत भी कड़वाहट में हुआ और फिर इन दोनों ने भी कभी साथ काम नहीं किया। आशा व नय्यर की पहली मुलाकात 1952 में ‘छम छमा छम’ गीत की रिकॉर्डिंग पर हुई थी। उस समय तक आशा अपनी बड़ी बहन लता के साये में रहती थीं। नय्यर ने उन्हें विश्वास दिलाया कि वह अपना व्यक्तिगत रास्ता स्वयं बना सकती हैं। नय्यर के मार्गदर्शन में आशा ने अपनी स्वतंत्र व आकर्षक शैली विकसित की। कैबरे-शैली गायन में भी उन्होंने महारत हासिल की और उसमें प्रेम का भाव वह लेकर आयीं। नय्यर के संगीत निर्देशन में जो उन्होंने मोहम्मद रफी के साथ युगल गीत गाये वह सभी अपने समय में चार्टबस्टर थे। ‘कश्मीर की कली’ व ‘तुमसा नहीं देखा’ के गीत तो आज तक लोगों की ज़बान पर हैं। ‘नया दौर’ का युगल गीत ‘उड़ें जब जब जुल्फें तेरी’ को कौन भूल सकता है, जिसमें तीनों नय्यर, रफी व आशा ने कमाल कर दिया था। 
लेकिन लम्बे प्रोफेशनल साथ के बावजूद 1972 में नय्यर व आशा कड़वी यादों के साथ एक-दूसरे से अलग हो गये और फिर दोनों ने कभी भी साथ काम नहीं किया। दोनों का साथ अंतिम गीत ‘चैन से हम को कभी आप ने जीने न दिया’ था। इस गीत के लिए आशा को 1974 में फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ महिला गायिका का अवार्ड मिला था। नय्यर ने आशा की तरफ से यह अवार्ड स्वीकार किया, लेकिन उसे बाद में आशा को देने की बजाय रास्ते में ही फेंक दिया। अनुमान यह है कि दोनों के बीच भावनात्मक रिश्ता कायम हो गया था। नय्यर से अलग होने के बाद आशा का आर.डी. बर्मन के साथ गहरा पर्सनल व प्रोफेशनल रिश्ता रहा। बहरहाल, हमेशा सफेद कपड़ों व हैट के साथ सार्वजनिक स्थलों पर दिखायी देने वाले नय्यर का जन्म 16 जनवरी 1926 को लाहौर के एक पंजाबी परिवार में हुआ था। इसलिए यह उनका जन्मशती वर्ष है। संगीत में उन्होंने कभी औपचारिक ट्रेनिंग हासिल नहीं की थी, लेकिन उन्होंने अपनी एक विशिष्ट शैली विकसित की और वह पंजाबी रिदम को मुंबई की फिल्मों में लेकर आये। नय्यर ने संगीत की बारीकियां अपनी मां से सीखी थीं और वह घर में गाते थे, जिससे उनके पिता बहुत नाराज़ होते और कहते कि ‘गाना मिरासियों का काम है’। एक दिन वह लोकगीत की धुनों व नृत्य में डूबे हुए मेले से देर रात को लौटे तो उनके पिता ने उनकी जमकर पिटाई की लेकिन नय्यर तो संगीत में मस्त थे और वह अगले दिन फिर मेले में चले गये। अपने पिता के विरोध के बावजूद नय्यर ने लाहौर की संगीत सभा में भजन के लिए 10 रूपये का ईनाम जीता और वह रेडियो पर बाल कार्यक्रम में काम करने लगे। इससे परिवार का दबाव उन पर बढ़ने लगा और वह घर से भागकर पंजाब की एक नाटक कम्पनी में 15 रूपये मासिक पर संगीतकार हो गये।
नय्यर इतने तुनक मिज़ाज थे कि 1979 में अपने परिवार के चर्चगेट, मुंबई के मकान से अलग हो गये। पहले होटल में रहने लगे और फिर 1989 से विरार में गायिका माधुरी जोगलेकर के साथ रहने लगे। इसके बाद वह ठाणे में रानी नखवा व उनके परिवार के साथ पेइंग गेस्ट के रूप में रहने लगे। उन्होंने अपनी मय्यत में अपने परिवार की शिरकत पर प्रतिबंध लगा दिया था। दिल का दौरा पड़ने से 28 जनवरी 2007 को उनका निधन हो गया। उनके अंतिम संस्कार में उनके परिवार का कोई सदस्य या बॉलीवुड का कोई सदस्य शामिल नहीं हुआ। वैसे इसमें कोई दो राय नहीं कि वह यादगार नगमें देने वाले महान संगीतकार थे और इसलिए भारत सरकार ने उनकी स्मृति में 3 मई 2013 को एक डाक टिकट जारी किया। 

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