बलोचिस्तान की आज़ादी की जड़ें वहां के इतिहास व संस्कृति में हैं
पाकिस्तान के चार राज्यों पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलोचिस्तान में से बलोचिस्तान सबसे बड़ा राज्य है। यह पाकिस्तान की कुल भूमि का 44 प्रतिशत है, जबकि इसकी जनसंख्या पाकिस्तान की जनसंख्या के मुकाबले 3.6 प्रतिशत है। 1947 से पहले बलोचिस्तान खुद चार रियासतों में बंटा हुआ था। इनमें कलात, लासबेला, खारन और मकरान थे। कलात, लासबेला और खारन पर कलात के खान शासन करते थे।
17वीं शताब्दी में बलोचों की राष्ट्रीय चेतना और संघर्ष कलात के खानों के आस-पास केन्द्रित हो गया था। 1666 में मीर अहमद ने कलात के खान की गद्दी स्थापित की। 1758 में मीर नसीर खान पहले कलात की गद्दी पर बैठा। इस काल को बलोचिस्तान का सुनहरा काल माना जाता है। 1839 में ब्रिटिश सेना ने कलात पर हमला कर दिया, जिसमें खान और उसके बहुत सारे सैनिक मारे गये। अंग्रेजों ने बलोचिस्तान की ताकत को कम करने के लिए उसको चार भागों में बांट दिया।
1931 में बलोच मध्य वर्गीय जमात ने अंग्रेजों से आज़ादी हासिल करने के लिए राष्ट्रीय संघर्ष का बिगुल बजा दिया। उन्होंने अंजुमन-ए-इतिहाद-ए-बलोचिस्तान लहर चलाई। वे आज़म खान को कलात के खान की गद्दी दिलाने में कामयाब रहे और उसके अधीन एक संवैधानिक सरकार कायम की। उसके बाद उसके उत्तराधिकारी मीर अहमद यार खान ने अंजुमन और अंग्रेज़ दोनों के साथ रिश्ते कायम करने की नीति अपनाई। अंजुमन का कलात स्टेट नैशनल पार्टी में विलय हो गया और मीर अहमद यार खान ने मुस्लिम लीग खड़ी कर दी। मोहम्मद अली जिन्ना को कलात स्टेट का लीगल एडवाईज़र नियुक्त कर लिया गया।
पहला संघर्ष : 4 अगस्त 1947 को यार खान और मोहम्मद अली जिन्ना के बीच समझौता हुआ कि कलात 15 अगस्त 1947 को आज़ाद हो जाएगा और उसका 1838 वाला रुतबा बहाल कर दिया जाएगा। मुहम्मद अली जिन्ना ने कलात को पाकिस्तान में शामिल होने के लिए दबाव बनाया, परन्तु कलात का खान अहमद यार खान नहीं झुका। 27 मार्च 1948 को पाकिस्तान ने कलात पर हमला कर दिया। सेना किसी राजा को कैदी बना कर यदि कुछ लिखवा लेती है तो उसको सही दस्तावेज नहीं माना जा सकता। यही बात कलात के साथ हुई। अहमद यार खान के भाई आगा अब्दुल करीम बलोच और मोहम्मद रहीम हथियार डालने से मुनकर हो गये और 1950 तक पाकिस्तानी सेना के खिलाफ लड़ते रहे।
दूसरा संघर्ष : 1958-59 में नवाब नुरोज़ खान ने पाकिस्तानी सेना के खिलाफ गुरिल्ला युद्ध लड़ा। पाकिस्तानी सेना के नवाब नुरोज़ खान और उसके संबंधियों को धोखे से पकड़ लिया। उसके पांच संबंधियों को फांसी दे दी और नवाब नुरोज़ खान की जेल में मौत हो गई।
तीसरा संघर्ष : 1960 में बलोच आज़ादी लहर को बल मिला, क्योंकि पाकिस्तान की सरकार ने 1956 में बने नये संविधान के तहत क्षेत्रीय ताकतों को खत्म करके इकाई ताकत नीति अपना ली थी। पाक सेना ने बलोचिस्तान में अपने कई ठिकाने बना लिये थे। शेर मोहम्मद बिजरानी मारी और उसके साथियों ने 1963-1969 तक पाकिस्तानी सेना के खिलाफ गुरिल्ला अर्थात छापामार युद्ध लड़ा। यह युद्ध पूरे बलोचिस्तान में फैल गया। 1970 में पाकिस्तान के राष्ट्रपति याहिया खान ने इकाई ताकत प्रणाली नीति को त्याग दिया। बलोच छापामार युद्धबंदी के लिए सहमत हो गये। बलोचिस्तान को पाकिस्तान का चौथा प्रांत मान लिया गया, जिसमें चारों बलोच रियासतें, हाई कमिश्नर और गवादर का 800 वर्ग कि.मी. तटवर्ती क्षेत्र जो उमान से खरीदा गया था, शामिल था।
चौथा संघर्ष : 1973 में प्रधानमंत्री भुट्टो ने बलोचिस्तान और उत्तर पश्चिमी सीमा प्रांत की क्षेत्रीय सरकारों को बर्खास्त कर दिया और मार्शल-ला लगा दिया जिसके कारण बलोचिस्तान में विद्रोह शुरू हो गया। ़खैर बख्श मारी ने बलोचिस्तान पीपल्ज़ लिब्रेशन फ्रंट (बी.पी.एल.एफ) बनाया, जिसके कारण बहुत सारे मारी और मैंगल कबीले के छापामार युद्ध में कूद पड़े। 400 के लगभग पाकिस्तानी सैनिक मारे गये और 8000 के लगभग छापामार और आम नागरिक मारे गये।
पांचवां संघर्ष : पूरे बलोचिस्तान की पूर्ण आज़ादी के लिए संघर्ष 2004 से शुरू होकर आज तक चल रहा है। अगस्त 2006 में बलोच नेता नवाब अकबर खान बुगती जो 79 वर्ष के थे, पाकिस्तानी सेना के विरुद्ध विद्रोह के दौरान मारे गये। अप्रैल 2009 में बलोच नैशनल मूवमैंट के प्रधान गुलाम मोहम्मद बलोच और उसके दो अन्य नेता लाला मुनीर और शेख मोहम्मद पाकिस्तानी सेना की शह प्राप्त पश्तो आतंकवादियों ने मार दिए।
12, अगस्त 2009 में कलात के खान मीर सुलेमान दाऊद को बलोचिस्तान का बादशाह घोषित कर दिया गया और आज़ाद बलोचिस्तान कौंसिल बना ली। कौंसिल ने ईरान में हाज़िर बलोच इलाके सिसतान और ईरानी बलोचिस्तान, पाकिस्तानी बलोचिस्तान पर अपना अधिकार दिखाया था। उसने अफगानिस्तान में हाज़िर बलोच इलाके को नहीं दिखाया था। कौंसिल ने दावा किया, कि उसके साथ बलोचिस्तान की आज़ादी के लिए लड़ रहे सभी दल और नवाबज़ादा ब्रह्मद़ाग बुगती की सहमति थी।
मौजूदा बलोच संघर्ष ने पाकिस्तानी हकूमत के सामने बड़ी चुनौती पेश कर दी। पहले हुए संघर्षों के साथ न्यारा यह संघर्ष लम्बे समय से चल रहा है और लगभग पूरे बलोचिस्तान में फैल गया है। इस संघर्ष में महिलाएं और पुरुष इक्ट्ठे भाग ले रहे हैं। इस आज़ादी संघर्ष में खाड़कू संगठनों के साथ आम बलोची जनता और वहां की लोकतांत्रिक पार्टियां और संगठन अग्रणी हैं। इस संघर्ष ने अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी का ध्यान भी खींचा है। 2012 में अमरीका की कांग्रेस में बलोचिस्तान के आज़ादी संघर्ष के बारे में सुनवाई हो चुकी है।
भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 15 अगस्त 2016 को भारत के मुख्य आज़ादी समागम मौके लाल किले की फसील से बलोचिस्तान के लोगों के आज़ादी संघर्ष का खुलकर समर्थन करना इतनी बड़ी घटना है कि इस घटना को आज़ाद बलोचिस्तान की सरकार को मान्यता देने के बराबर समझा जा सकता है। उसके बाद बांग्लादेश, अफगानिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति श्री हामिद करज़ई और रूस द्वारा बलोचिस्तान के आज़ादी संघर्ष का समर्थन किया जा चुका है। बलोचिस्तान में आज़ादी संघर्ष के ठोस कारण हैं :—
सबसे बड़ा कारण तो यह है कि बलोचिस्तान की अपनी एक अलग पहचान, संस्कृति और भाषा है। बलोचिस्तान की जनता ने पाकिस्तान द्वारा थोपी गई इस्लामिक संस्कृति को नकार दिया है। उन्होंने धर्म और संस्कृति को गड़भड़ नहीं किया है। बलोच लोग गुलामी में रहना पसंद नहीं करते। बलोचिस्तान नामकरण ही एक देश के तौर पर इसकी अलग पहचान बनाता है। अकेला बलोचिस्तान, पाकिस्तान की कुल भूमि का 44 प्रतिशत भाग है परन्तु बलोचिस्तान और पाकिस्तान में बहुत बड़ी आर्थिक असमानता पाई जाती है। बलोचिस्तान का पाकिस्तान की जी.डी.पी. में केवल 3.7 प्रतिशत हिस्सा है। बलोचिस्तान में बाल और जच्चा मृत्युदर पाकिस्तान में सबसे ज्यादा है। वहां गरीबी दर भी सबसे ऊंची है और साक्षरता दर सबसे नीचे है।
पाकिस्तानी सेना बलोचिस्तान में बड़े स्तर पर अत्याचार कर रही है। हज़ारों आम बलोचियों को मार दिया गया है और हज़ारों बलोच गायब हैं। सेना द्वारा बलोचियों के घरों को आग लगाना और महिलाओं के साथ दुष्कर्म करना आम बात है।
पाकिस्तान का अपना कोई सांझा सभ्याचार नहीं है। इस धरती पर इस्लाम तो एक हज़ार साल पहले आया था, जबकि किसी इलाके का सभ्याचार कई हज़ार सालों में लोगों के कुदरत प्रति विश्वास, भौगोलिक हालात, रहन-सहन, खान-पान, भाषा और कला के सुमेल के साथ अस्तित्व में आया हुआ है। इसलिए साझे सभ्याचार के बिना पाकिस्तान के चार सभ्याचारों को लम्बे समय के लिए जोड़कर रखना असंभव है। 1971 में बांग्लादेश की आज़ादी का मुख्य कारण बंगाली सभ्याचार की पाकिस्तान के साथ कोई सांझ न होना ही था।
कुछ समय पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ईरान के बलोचिस्तान में चाबहार समुद्री बंदरगाह को विकसित करने के लिए उद्घाटन किया था। यह घटना ईरान को एक संकेत थी कि भारत ईरानी बलोचिस्तान और सिसतान राज्यों को ईरान के ही अटूट अंग समझता है। बलोचिस्तान की आज़ादी के साथ ईरान और अफगानिस्तान का कोई नुकसान नहीं होना है। बलोचिस्तान की आज़ादी ईरान, अफगानिस्तान में आतंकवाद के खात्मे के लिए हमेशा के लिए एक मील का पत्थर साबित होगी।
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