भारत की कूटनीतिक परीक्षा लेंगे आगामी नेपाल चुनाव
बांग्लादेशियों की घुसपैठ के लिये अब नेपाल एक नया रूट बनकर उभरा है, खास करके एक ऐसे समय पर जब चुनाव में व्यस्त होने के कारण नेपाल का शासन-प्रशासन इस पर ज्यादा ध्यान नहीं दे पा रहा। इसी का फायदा उठाकर बांग्लादेशी घुसपैठिये पिछले काफी दिनों से भारत में प्रवेश के लिए नेपाल रूट को अपनाने में लगे हुए हैं। गौरतलब है कि 1950 की शांति-सहयोग संधि के चलते तकरीबन 1800 किमी की भारत और नेपाल के बीच खुली सीमा इस घुसपैठ की बड़ी वजह है। यह खुली सीमा ऐतिहासिक, सांस्कृतिक संबंधों का प्रतीक है। बिहार, पूर्वी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के सीमावर्ती ज़िलों में इसके चलते गहरे सामाजिक-आर्थिक संपर्क हैं पर यह सुरक्षा दृष्टि से अत्यधिक संवेदनशील है।
सिर्फ बांग्लादेशी ही नहीं म्यांमार के घुसपैठिए भी बांग्लादेश से होते हुए नेपाल के रास्ते देश में घुसपैठ कर रहे हैं। दो महीने पहले जब कुछ बांग्लादेशी इस रास्ते से घुसपैठ करते हुए पकड़े गये थे, तो इसके बाद खुफिया रिपोर्ट्स में चेतावनी दी गई थी कि यहां के घुसपैठिये एजेंटों से आधार कार्ड बनवाकर बेंग्लुरु और हैदराबाद तक पहुंचने लगे हैं। बांग्लादेश चुनावों से पहले इस रास्ते से घुसपैठ और तस्करी तेजी से बढ़ी थी और एसएसबी ने बिहार तथा उत्तर प्रदेश की नेपाल से सटी सीमा पर अलर्ट जारी किया था, जो अभी जारी है; क्योंकि घुसपैठ प्रधानमंत्री के डेमोग्राफी मिशन को बुरी तरह प्रभावित करती। बांग्लादेश में चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं और नेपाल के चुनाव में अभी करीब आधे से पौने महीने का समय है, जो भारतीय संदर्भ में राजनीतिक, कूटनीतिक कारणों के अलावा इसलिए और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके परिणाम भारत की पूर्वोत्तर तथा बिहार की सुरक्षा तय करते हैं। भारत, नेपाल में स्थिर सरकार चाहता है, क्योंकि अस्थिर नेपाल बांग्लादेशी घुसपैठियों के लिए एक अनुकूल रास्ता बना रहेगा।
साल 2023 में नेपाल के प्रधानमंत्री के.पी. शर्मा ओली ने कहा था कि खुली सीमा का ‘अनचाहे तत्वों’ द्वारा दुरुपयोग न हो, इसका वह खास तौर पर ख्याल रखेंगे। साल 2025 में भारत-नेपाल ने अवैध प्रवेश और तस्करी रोकने पर सहमति जताई थी, लेकिन पहले तो नेपाली जेन-जी आंदोलन ने अस्थिरता बढ़ाई, और अब राजनीतिक स्थिरता के लिये नेपाल में चुनाव होने जा रहे हैं, तब वहां खुली सीमा, घुसपैठ और तस्करी का कोई नामलेवा नहीं है। नेपाल चुनावों के बाद सरकार तो बनेगी लेकिन राजनीतिक स्थिरता भी बहाल होगी, इसकी उम्मीद अभी कम ही है। कारण साफ हैं क्योंकि नेपाल चुनावों का परिणाम तकरीबन तय है। संकेत स्पष्ट हैं कि किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत नहीं मिलेगा, गठबंधन की सरकार बनेगी। नेपाली मीडिया और विश्लेषकों का आकलन भी यही है कि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी यानी आरएसपी का प्रबल उभार उसे तीसरे या हद से हद दूसरे नंबर तक ही पहुंचा पाएगा।
भारत के लिए असल चिंता यही है कि क्या चुनावों के बाद नेपाल की नई सरकार किसी सुविचारित सकारात्मक दीर्घकालिक रणनीतिक निरंतरता रख पाएगी या घरेलू राजनीति के दबाव में, अपने गठबंधन दलों के प्रभाव के चलते बार-बार रुख बदलेगी? यह प्रश्न इसलिए भी मौजू हैं कि नेपाल की राजनीति में समय-समय पर ‘भारत विरोधी कार्ड’ खेला जाता रहा है। साल 2015 के संविधान विवाद और तथाकथित नाकाबंदी की स्मृति अभी भी राजनीतिक विमर्श में मौजूद है। सीमा विवाद-लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा जैसे अनेक भावनात्मक मुद्दे आज भी जिंदा हैं, जिन्हें चुनावी माहौल के अलावा अपनी राष्ट्रवादी पहचान चमकाने के लिये कुछ दल और नेता विशेष रूप से उठाने में नहीं चूकते। भारत की आलोचना उनके लिये समर्थन जुटाने का साधन बनती है। आरएसपी स्वयं को ‘स्वतंत्र विदेश नीति’ का पैरोकार बताती है और खुले झुकाव से बचने की बात करती है। यूएमएल ने अतीत में चीन के साथ बुनियादी ढांचा सहयोग को आगे बढ़ाया है। माओवादी सेंटर वैचारिक रूप से संतुलन की बात करता है। नेपाली कांग्रेस अपेक्षाकृत भारत-समर्थक मानी जाती है, पर वह भी सार्वजनिक रूप से ‘समान दूरी’ का ही आग्रह करती है।
इस पृष्ठभूमि में गठबंधन सरकार का मतलब होगा- भारत पर बयानबाज़ी में उतार-चढ़ाव। घरेलू दबाव बढ़ने पर भारत-विरोधी स्वर तेज़ हो सकते हैं। राजनीतिक अस्थिरता या प्रशासनिक ढीलापन सीमा-प्रबंधन को प्रभावित कर सकता है। फर्जी दस्तावेज़, मानव तस्करी, हवाला नेटवर्क और कभी-कभार चरमपंथी तत्वों की आवाजाही, ये सब जोखिम बने रहेंगे। यदि नेपाल में सरकार कमजोर हो या भ्रष्टाचार बढ़े, तो स्थानीय स्तर पर निगरानी और आपसी सहयोग भी प्रभावित होगा ही। पूर्वोत्तर पर इसका प्रत्यक्ष प्रभाव भले सीमित हो पर सच यह है कि नेपाल, भूटान, सिक्किम और अरुणाचल मिलकर जो व्यापक हिमालयी रणनीतिक परिक्षेत्र तथा एक साझा सुरक्षा परिदृश्य बनाते हैं, प्रभावित होंगे।
चुनाव भारत के लिए सामरिक चिंता का विषय होगा। हमारे लिए नेपाल में हमारी रेल लिंक, पेट्रोलियम पाइपलाइन, जलविद्युत जैसी कई द्विपक्षीय परियोजनाएं प्रशासनिक अस्थिरता से और लटक सकती हैं, साथ ही उनकी लागत बढ़ेगी तो जन-धारणा प्रभावित होगी। यदि नेपाल में स्थिर, सहयोगी सरकार बनती है, तो बिहार व यूपी की खुली सीमा वाले ज़िलों- सीतामढ़ी, मधुबनी, बहराइच, महाराजगंज आदि में दबाव कम रहेगा। भारत-नेपाल सुरक्षा समन्वय यानी इंटेलिजेंस शेयरिंग, जॉइंट पेट्रोलिंग मजबूत रहेगा। नकली मुद्रा, मानव तस्करी, कट्टरपंथी नेटवर्क और सीमा अपराधों पर नियंत्रण बेहतर होगा। पर अगर ऐसा नहीं हुआ तो भारत के लिए सीमा सुरक्षा, आर्थिक सहयोग और सामरिक संतुलन जैसे दीर्घकालिक हितों की रक्षा चुनौती बनेगी। धैर्य, संवेदनशीलता और संस्थागत संवाद- यही वह त्रयी है, जो आने वाले वर्षों में भारत-नेपाल संबंधों की दिशा तय करेगी।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर

