प्रभावशाली उत्तर

गोंदावन राज्य का मुखिया बाघ बहुत ही न्यायप्रिय और दयालु था। उसकी सभी नीतियां सब जानवरों की सलाह से बनाई जाती थीं और वे सबको माननी पड़ती थीं। गलती करने पर कड़ी सजा भी मिलती थी। चाहे गैंडा हो या चींटी, वहां सबको एक समान ही समझा जाता था। न्याय के मामले में कोई भेदभाव नहीं होता। यही कारण था कि मंत्री और पुलिस वाले भी किसी छोटे जानवर पर अत्याचार करने की हिम्मत नहीं करते थे। मुखिया बाघ की व्यवस्था अच्छी होने के कारण ही गोंदावन राज्य में किसी प्रकार की कमी नहीं थी। खेतीबाड़ी अच्छी होती थी। खानेपीने के लिए किसी चीज की कमी नहीं थी। सब जानवर मन लगाकर मेहनत करते और अपने जंगल में हमेशा सुख शांति बनाए रखने का प्रयास करते। किसी डर या कानूनी भय के कारण ही वहां के जानवर आपस में मेलजोल नहीं रखते थे बल्कि वे वास्तव में एक-दूसरे की सहायता करने के लिए सदा तत्पर रहते।
जो जानवर बूढ़े हो जाते या किसी काम करने में असमर्थ हो जाते, उन्हें ‘मुखिया सहायता कोष’ से खाने पीने का सामान मुफ्त मिल जाता। इस तरह गोंदावन राज्य में सभी जानवर हंसी खुशी अपना जीवन बिताते थे।
गोंदावन राज्य के जानवरों की अच्छी जीवनशैली के कारण ही आस-पड़ोस के राज्यों के जंगली जानवर वहां आकर रहना पसंद करते थे लेकिन मुखिया बाघ अपनी व्यवस्था सुचारू रूप से चलाने के लिए किसी नए जानवर को जंगल में रहने की अनुमति देने से पहले उसकी परीक्षा लेते और अच्छी तरह जांच पड़ताल करते। जो परीक्षा में खरा उतरते, उसे ही गोंदावन राज्य में रहने की आज्ञा मिलती थी। यदि कोई चोरी छिपे आ कर रहता तो उसे कड़ा दंड मिलता।
गोंदावन राज्य में प्रवेश पाने की परीक्षा साधारण नहीं होती थी, न ही इसका कोई पक्का स्वरूप होता था। मुखिया बाघ हर नए जानवर से नए-नए प्रश्न पूछा करते। इसलिए ऐरे गैरे की तो हिम्मत ही नहीं पड़ती थी कि वहां आकर रहने के लिए आवेदन पत्र भेजे।
एक बार पड़ोसी राज्य के जंगल से एक भालू, एक भेड़ और एक चूहा तीनों ने गोंदावन राज्य में रहने के लिए बायोडाटा के साथ आवेदन पत्र भेजा। मुखिया बाघ ने निश्चित समय पर उन्हें विधानसभा में परीक्षा के लिए बुलाया। सदा की भांति विधानसभा में बहुत सारे जानवर मौजूद थे। सब यह जानने को उत्सुक थे कि इस बार मुखिया बाघ क्या प्रश्न पूछता है?
‘अब मुखिया महोदय एक प्रश्न पूछेंगे। तुम तीनों को उसका उत्तर देना है। जिस का उत्तर सबसे अधिक उपयुक्त और प्रभावशाली होगा, उसे ही गोंदावन राज्य में रहने की आज्ञा दी जाएगी,’ रक्षा मंत्री चीते ने रिवाज के मुताबिक घोषणा की।
इसके बाद मुखिया बाघ ने प्रश्न किया, ‘यदि तुम्हें यह मालूम हो जाए कि 5 साल बाद इस जंगल में अकाल पड़ने वाला है तो तुम क्या करोगे?’
प्रश्न सुनते ही भेड़ ने उत्तर दिया, ‘सर, 5 साल बाद होने वाली बात पर विचार करना व्यर्थ है। जब अकाल पड़ेगा, तब कोई न कोई रास्ता खोज निकालेंगे। इस पर भालू ने कहा, ‘और उस समय भी सोचना क्या है, सर यदि यहां अकाल पड़ा तो हम किसी दूसरे राज्य के जंगल में जाकर रहने लग जाएंगे।’
‘नहीं, मुख्यमंत्री जी, हमें आने वाले कल के लिए अभी से कुछ सोचना चाहिए। आज रोटी चाहिए तो आज ही बीज डालकर अन्न नहीं पैदा किया जा सकता और न ही डर कर भाग जाने से काम चलता है। मेरी राय में तो अभी से हमें जंगल में एक नहर बनाने का काम शुरू कर देना चाहिए। साथ ही बड़े-बड़े तालाब भी खोदने चाहिएं। इन से आड़े वक्त पर पानी लिया जा सकेगा,’ चूहे ने उत्तर दिया। चूहे का उत्तर सुन कर वहां उपस्थित सभी जानवर आश्चर्यचकित रह गए। सबके चेहरे देख कर ही पता चलता था कि चूहे का उत्तर सबसे अधिक उपयुक्त और कारगर था। मुखिया बाघ ने कुछ देर के मौन के बाद कहा, ‘मुझे खुशी है कि इतना छोटा होने पर भी चूहे ने अपनी बुद्धिमत्ता का प्रमाण दिया है। इससे यह भी सिद्ध होता है कि चूहे के मन में मेहनत के प्रति आस्था है। गोंदावन राज्य में केवल ऐसे ही जानवरों को रहने की आज्ञा दी जा सकती है। इसलिए लापरवाह भेड़ और अवसरवादी भालू को हमारे जंगल से बाहर निकाल दिया जाए और चूहे के लिए अपने यहां रहने का प्रबंध किया जाए।’ मुखिया बाघ का निर्णय सुनते ही भेड़ और भालू अपना सा मुंह लेकर चले गए और चूहे ने मुखिया बाघ के प्रति आभार प्रकट किया। गोंदावन राज्य के सभी जानवरों ने छोटे से चूहे का हृदय से स्वागत किया। (उर्वशी)

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