परम्परा और विज्ञान का अद्भुत संगम है शीतला अष्टमी पर्व
हिन्दू पंचांग के मुताबिक चैत्र मास के कृष्णपक्ष की सप्तमी और अष्टमी को ठंडा भोजन खाने की परम्परा है। इन तिथियों को शीतला सप्तमी और शीतला अष्टमी कहा जाता है। इस साल 10 मार्च 2026 को शीतला सप्तमी और 11 मार्च 2026 को शीतला अष्टमी का पर्व पड़ता है। चूंकि इस दिन माता शीतला को ठंडा भोग अर्पित किया जाता है, इसलिए इसे शीतला अष्टमी या बासी भोजन से भोग लगाने के कारण बसोड़ा भी कहते हैं। मान्यता है कि इस दिन मां शीतला जो कि देवी दुर्गा का ही एक रूप है, बासी रोटी, गुड़ या दही के साथ प्रसाद के रूप में ग्रहण करती हैं। यह पर्व इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें जितनी धार्मिक आस्था समाहित हैं, उतनी की महान स्वास्थ्य की वैज्ञानिक परम्परा शामिल है।
यह पर्व होली के 8वें दिन मनाया जाता है और इसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, बिहार, हरियाणा, पंजाब और दिल्ली आदि जगहों में मनाया जाता है। वास्तव में शीतला अष्टमी महज धार्मिक अनुष्ठान नहीं है बल्कि भारतीय समाज की सबसे प्राचीन स्वास्थ्य चेतना और पर्यावरणीय समझ का आईना है। गांवों में नीम के पेड़ पर शीतला मां के लिए जल चढ़ाया जाता है, जो स्वास्थ्य चेतना का ही विहंगम उदाहरण है। माना जाता है कि मां शीतला त्वचा रोगों और संक्रमणों से रक्षा करने वाली देवी मां हैं। शीतला शब्द का मतलब है शीतलता प्रदान करने वाली। शीतला माता को अकसर कलश और नीम की पत्तियों के साथ चित्रित किया जाता है। इन सभी प्रतीकों का गहरा स्वास्थ्य दर्शन है। कलश जीवन और स्वास्थ्य का स्रोत है। नीम की पत्तियां औषधीय गुणों और रोग प्रतिरोध का प्रतीक हैं। माता शीतला की पूजा सामाजिक और स्वास्थ्य संदर्भ से भी जुड़ी हुई है। पिछली सदी में जब गांवों में चेचक का जबर्दस्त प्रकोप होता था, तो लोग मानते थे कि शीतला माता उनसे नाराज़ हैं। उन्हें प्रसन्न करने के लिए लोग उनकी पूजा करते थे और इस पूजा के दौरान कई तरह के नियम बनाये गये थे, जो वास्तव में अप्रत्यक्ष रूप से स्वच्छ रहने के लिए बनाये गये नियम होते हैं। शीतला मां को प्रसन्न करने की जो प्रक्रिया होती थी, वह दरअसल स्वास्थ्य चेतना का एक अनुपम उदाहरण है। शीतला माता को प्रसन्न करने के लिए घर की साफ-सफाई करने का प्रावधान है। दिन में ठंडा भोजन करने की परम्परा है,जिससे अग्नि और गर्मी कम हो जाए। साथ ही इस दौरान नीम का प्रयोग और मूलत: नीम के पेड़ के नीचे ठंडक में रहने का चलन था, जिससे मनुष्य को इन वैज्ञानिक तौर तरीकों से आराम मिलता था। इसलिए स्वस्थ वातावरण बचाने की वैज्ञानिक प्रक्रिया ही वास्तव में शीतला माता का पूजा और अनुष्ठान है, जो कि धर्म से ज्यादा मनुष्य स्वास्थ्य की रक्षा तय करता है।
शीतला अष्टमी मनाये जाने के सदियों से प्रमुख कारणों में से रोगों से रक्षा करना, स्वास्थ्य व स्वच्छता का संदेश देना और प्रकृति तथा परिवर्तन का स्वागत करना। मांएं जब शीतला अष्टमी का व्रत रखती हैं, तो उनकी यही कामना होती है कि शीतला मां परिवार को रोगों से दूर रखें। शीतला अष्टमी के दिन न सिर्फ अपने पहने जाने वाले कपड़ों को बहुत गहराई से धोए जाने की परम्परा है बल्कि यही इस पर्व का प्रमुख संदेश है। कुछ लोग इसे शरीर को शीतल रखने और पाचन को संतुलित रखने का पर्व भी कहते हैं। शीतला अष्टमी का व्रत रखने के बाद अगले दिन सुबह जल्दी से जाग कर मंदिर जाना होता है और फिर पूजा को दोहराया जाता है, जिसमें वही सब चीजें शामिल होती हैं, जो भोग का हिस्सा भी होती हैं। शीतला अष्टमी की परम्परा में एक सोच यह भी छिपी है कि चाहे जितनी पुरानी हो गई हो नीम, लेकिन यह स्वास्थ्य के लिए हमेशा एंटी बैक्टीरियल और एंटी वायरस होती है। नीम अनेक तरह से स्वास्थ्य सुरक्षा में हमारी सहायक होती है। इसलिए इस दिन विशेष तौर पर नीम के पेड़ को महत्व दिया जाता है। भारतीय समाज में प्राचीन काल से ऐसे ही ज्ञान को जन-जन तक पहुंचाने की परम्परा रही है।
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