कहानी-भेड़िया

(क्रम जोड़ने के लिए पिछला रविवारीय अंक देखें)

राजेश का भाग्य करवटें ले रहा था। वह अचानक एक ऐसी तिलिस्मी दुनिया में प्रवेश करने जा रहा था जिसकी कि उसने कल्पना तक नहीं की थी। उसके इलाके के आदिवासी नेता के देहावसान के बाद विधायक का पद खाली था। उस स्थान की भरपाई के लिए एक ऐसे योग्य और होनहार व्यक्ति की तलाश थी, जो पढ़ा-लिखा होने के साथ-साथ वाकपटु हो, मिलनसार हो, विनम्र हो और हर छोटी-बड़ी समस्याओं को चुटकी बजाते हल कर लेने वाला हो। प्रदेश के सांसद महोदय भी ऐसे व्यक्ति की तलाश में थे। 
एक दिन जंगल विभाग के बड़े आला अधिकारियों सहित, प्रदेश के सांसद और वन मंत्री वार्षिक अधिवेशन में भाग ले रहे थे। बातों ही बातों में कन्जर्वेटर साहब ने अपने कार्यालय में कार्य कर रहे राजेश के बारे में विस्तार से सांसद महोदय को बतलाते हुए कहा कि उन्होंने अब तक उस जैसा कर्मठ कर्मचारी नहीं देखा है। यदि उससे त्याग-पत्र लेकर विधायक के पद पर चुनाव लड़वा दिया जाए तो आपको एक बेहतर केंडिडेट मिल सकता है। अधिकारी की बातों में दम था और उन्हें एक लंबे समय से ऐसे योग्य उम्मीदवार की तलाश भी थी।
सांसद महोदय ने उसे अपने कार्यालय में बुलवाकर अपना मंतव्य सुनाया। सुनते ही राजेश सकते में आ गया था। उसने सपने में भी नहीं सोचा था कि एक दिन वह विधायक भी बन सकता है। सुनते ही उसके शरीर में रोमांच हो आया था। खुशी के मारे वह अन्दर ही अन्दर उछलने लगा था। मन गदगद हो उठा था। चाहतें पंख पसार कर उड़ने लगी थीं पूरे वेग से। उसे इसी क्षण निर्णय लेना था। हां कहने मात्र से वह फर्श से अर्श तक जा सकता था और ना कहने पर उसे बाबू का बाबू ही बने रहना था। काफी सोचने और विचार करने के बाद उसने हामी भर दी थी। आज वह विधायक ही नहीं अपितु एक खास विभाग का मंत्री भी बन गया था। बाबू से मंत्री बना राजेश अपने भाग्य पर इतराने लगा था। जिसके पास कभी दो लोग इकट्ठा नहीं होते थे, आज उसके इर्द-गिर्द भीड़ जमी रहती है। फटीचर साइकिल में चलने वाले राजेश के पास उसकी अपनी बेशकीमती फोरव्हील गाड़ी है। अब वह टपरेनुमा कमरे में नहीं रहता। आज उसके पास एक आलीशान बंगला है और नौकर-चाकरों की भीड़। जब वह सफर में होता है तो 5-10 गाड़ियां उसके आगे-पीछे चलती है। उसका अपना बॉडीगार्ड है। आज क्या नहीं है राजेश के पास? धन-दौलत, रुतबा, पैसे, नौकर-चाकर। किसी चीज की कमी नहीं है उसके पास। सफलता के नशे में मदहोश रहने लगा था वह। बहुत खुश थी कांता भी। उसने कभी अनुमान तक नहीं लगाया था कि वह आम से खास बन जाएगी। आम से खास बनी कांता नित नूतन सपने देखती और राजेश उन सपनों में रंग भर देता। टपरा टाईप स्कूल में पढ़ने वाली उसकी बेटियां और बेटे अब शहर के नामी-गिरामी स्कूल में पढ़ने जाते है। सभी के पास अपने-अपने व्हिकल हैं। सबके अपने रौब हैं, रुतबें हैं।
समय कभी एक सी चाल में नहीं चलता। वह सीधी चाल में चलता हुआ कब उलटी चाल में चलने लगेगा, कोई नहीं जानता। एक मनहूस क्षण, बिल्ली की सी दबी चाल में चलता हुआ कांता के घर में कब घुस आया, पता ही नहीं चल पाया। छोटी-बड़ी खुशियों के तिनकों को जोड़कर बनाया घोंसला अब बिल्ली की उछाल में जमीन पर आ गिरा था और घोंसलें में सिर छिपाए खुशियों के पखेरु, चिंचियाते हुए फुर्र से दूर जा उड़े थे।
एक दिन की बात है। राजेश अपने दल-बल के साथ एक बीहड़ में से गुजर रहा था। तभी उसकी नज़र एक कुतिया पर पड़ी जो आराम से सो रही थी और उसका नन्हा पिल्ला दूध चूस रहा था। गाड़ी की आवाज सुनकर कुतिया उठ खड़ी हुई और जंगल में समा गई। राजेश के इशारे पर गाड़ी रोक दी गई। नवजात शिशु भाग नहीं पाया। राजेश ने उस पिल्ले को गौर से देखा। उस पिल्ले को देखते ही उसके मन में दया आ गई। पिल्ला था भी बड़ा सुन्दर। चमकीला रंग, भूरी-भूरी आंखें और जबड़े से झांकते नुकीले दांत। उसके मन में आया कि इसे अपने बंगले पर होना चाहिए। इसके रहते उसका घर सुरक्षित रहेगा, ऐसा विचार करते हुए उसने उसे अपने साथ ले आया।
राजेश के पी.ए. ने बतलाया कि वह कुतिया का बच्चा नहीं बल्कि भेड़िया का बच्चा है लेकिन राजेश ने उसके तर्क को बोथरा करते हुए, यह मानने से इन्कार कर दिया कि वह भेड़िया का वशंज है।
घर में प्रवेश करते हुए उसने कांता को बुला भेजा और हिदायत देते हुए कहा कि वह इस नवजात पिल्ले का विशेष ध्यान रखेगी। उसे समय पर दूध पिलवाया करेगी और उसका समुचित रख-रखाव भी करती रहेगी। कांता ने उस पिल्ले को गौर से देखा। लम्बा मुंह, झब्बेदार पूंछ, आंखों से टपकती चालाकी। देखते ही समझ गई कि वह कुतिया का नहीं बल्कि भेड़िया का बच्चा है। उसने अपनी ओर से राजेश को समझाने की बहुतेरी कोशिश की कि जैसा वह समझ रहा हैं, वैसा नहीं है। उसने सलाह देते हुए कहा भी कि उस पिल्ले को फिर से जंगल में छुड़वा देना चाहिए। राजेश किसी भी तरह उसके तर्कों से सहमत नहीं था। उसका एक ही कहना था कि वह कुतिया का पिल्ला है, अत: उसे वह किसी भी कीमत पर अपने बंगले पर ही रखेगा।
दिन के शुरुआत भी बड़ी अजीब तरीके से होती। दिन निकलते ही उसके चमचों की भीड़ बंगले पर जमा हो जाती। चाय-पानी-नाश्ते के बाद वह अपने क्षेत्र के दौरे पर निकल जाता। वह घर कब लौटेगा, कोई नहीं जानता। कभी रात के दस, तो कभी बारह बजे वह घर लौटता। उसके लौटने का वह बेसब्री से इन्तजार करती रहती। इन्तजार करते-करते कभी-कभार उसकी आंख लग जाती, तो वह तूफान उठा लेता और अर्र-सर्र बकने लगता। उसकी बहकी-बहकी चाल देखकर वह समझ जाती कि श्रीमान महुआ चढ़ाकर घर लौटे हैं। शराब और कबाब से दूर रहने वाला उसका राजेश अब पूरी तरह बदल गया था। एक दिन वह भी था जब वह ऑफिस से थका-हारा घर लौटता था। थका-मांदा होने के बावजूद वह उसे अपनी बांहों के घेरों में कस लेता और जी भर के प्यार-दुलार दिया करता था, लेकिन अब ऐसा नहीं होता। प्यार के दो शब्दों की जगह अब घिनौनी गालियों ने ले ली थी। वह समझ नहीं पा रही थी कि इस बदलाव का क्या कारण है ? 
पिल्ला अब धीरे-धीरे बड़ा हो रहा था। जैसे-जैसे वह बढ़ता गया, उसकी खुराक भी बढ़ती चली गई। उसे अब दिन में दो बार मीट खिलाया जाता। मीट खा-खाकर वह मुटियाने लगा था। उसके शरीर का भूरा-काला रंग और चटख हो आया था। पूंछ और झबरीली घनी हो गई थी। उसके नूकुले दांतों को देखकर भय लगता। कूं...कां करने वाला युवा होता पिल्ला अब गुर्राने लगा था। उसके गले से निकलने वाली आवाज भी दिल को दहला देने के लिए काफी थी, लेकिन इन सब बातों से बेफिकर राजेश उससे चिपका रहता। ऐसा करते देख उसे घिन होने लगती। वह समझाने की कोशिश करती लेकिन राजेश की घूरती आंखों को देखकर वह सहमी रह जाती। शब्द गले में अटके रह जाते।
राजेश के इस बदले रूप को देखकर वह सहम जाती, वह समझ रही थी कि इस तरह का बदलाव अचानक नहीं आया है। यह बदलाव उस भेड़िए के आने के बाद से ही शुरु हुआ है। नशे में चूर राजेश भेड़िए के साथ खेलता, खुद मीट खाता और उसे भी खिलाता जाता। खेल-खेल में उसका झूठा खाना भी खा लेता। ऐसा करते हुए देखकर उसे घिन आने लगती, लेकिन वह कर भी क्या सकती थी, सिवाय देखते रहने के। राजेश के व्यव्हार में आए परिवर्तन की वजह वह पूरी तरह समझ चुकी थी कि नार्मल रहते हुए वह अचानक क्यों भड़क उठता है, उसकी आवाज में कर्कशपन क्यों उतर आता है, उसके लक्षणों को देखकर निश्चित रुप से कहा जा सकता है कि राजेश के शरीर में भेड़िए का प्रवेश हो चुका है, तभी तो वह इतना आक्रमक हो उठता है।  (क्रमश:)

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