ट्रम्प के बेम़कसद युद्ध ने दुनिया को मुसीबत में डाल दिया

इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू 1996 से निरन्तर अमरीका के राष्ट्रपतियों को यह समझाने का प्रयास करते रहे कि ईरान दो सप्ताह में, दो माह में या बस कुछ ही दिनों में परमाणु बम बना लेगा जोकि इज़रायल के अस्तित्व के लिए ठीक नहीं होगा, इसलिए अमरीका को चाहिए कि ईरान पर हमला कर दे। इस लगभग तीस साल की अवधि में अमरीका के किसी राष्ट्रपति ने नेतन्याहू की बात को कोई खास महत्व नहीं दिया। मिच मैकोनेल, जो रिपब्लिकन पार्टी के ही नेता हैं, ने एसोसिएटेड प्रेस (एपी) के वाशिंगटन ब्यूरो प्रमुख माइकल टैकेट की पुस्तक ‘द प्राइस ऑफ पॉवर’ में ट्रम्प के बारे में यह भी कहा था कि ‘वह बहुत जल्द गुस्सा करने वाले,  घिनौने व आत्ममुग्ध अहंकारी व्यक्ति हैं’। यहां सवाल यह नहीं है कि मिच मैकोनेल की यह कड़ी आलोचना सही है या गलत है, बात बताने की यह है कि अपने बेतुके व बिना सोचे समझे किये गये फैसलों से ट्रम्प ने पहले टैरिफ युद्ध से और अब ईरान पर बेमक़सद का युद्ध थोप कर उन्होंने पूरी दुनिया को परेशानी में डाल दिया है और वह भी इस हद तक कि अगर आज युद्ध बंद हो जाये, जिसकी संभावना कम ही है, तो भी दुनिया को पटरी पर आने में कम से कम दस साल का समय लगेगा। 
इससे भी अहम बात यह है कि ट्रम्प भरोसे के लायक व्यक्ति नहीं हैं। उनका दूसरे कार्यकाल के लिए चुनाव अभियान इस वायदे पर आधारित था कि वह अमरीका को दूसरों के युद्ध में नहीं झोंकेंगे। इस वायदे का क्या हुआ, सबके सामने है, इसलिए अब अमरीका में उनके अपने ही कट्टर समर्थक उनका विरोध कर रहे हैं और युद्ध को तुरंत बंद करने का दबाव डाल रहे हैं। पिछले साल जून में अमरीका व ईरान के बीच समझौता वार्ता चल रही थी क्योंकि ट्रम्प ने बराक ओबामा और तेहरान के बीच जो परमाणु समझौता हुआ था, उसे रद्द कर दिया था। लेकिन वार्ता के बीच ही ट्रम्प ने ईरान पर हमला करके, 12 दिन के युद्ध के बाद दावा किया कि ईरान की परमाणु बम बनाने की क्षमता को उसने इतनी बुरी तरह से ध्वस्त कर दिया है कि वह वर्षों तक परमाणु बम बनाने की सोच भी नहीं सकता। इसके बावजूद इस साल एक बार फिर अमरीका व ईरान में समझौता वार्ता आरंभ हुई, दोनों पक्ष दावा कर रहे थे कि वार्ता एकदम सही दिशा में जा रही है और एक या दो दिन में समझौता हो जायेगा, लेकिन 28 फरवरी, 2026 की सुबह अमरीका व इज़रायल ने मिल कर ईरान पर हमला कर दिया और उसके एक हमले में सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत हो गई।
नेतन्याहू की पिछले एक साल में सात बार व्हाइट हाऊस की यात्रा के उद्देश्य को बाखूबी समझा जा सकता है, जिसमें न सिर्फ ईरान पर हमला करना शामिल था, बल्कि नेतन्याहू व उनके परिवार पर जो इज़रायल में भ्रष्टाचार के अनेक मुकद्दमे चल रहे हैं, उन्हें भी समाप्त कराना था। गौरतलब है कि ट्रम्प ने इज़रायल के राष्ट्रपति इसाक हरज़ोग पर दबाव बनाया कि वह नेतन्याहू के खिलाफ चल रहे मुकद्दमों को वापस ले लें, लेकिन उन्होंने स्पष्ट इन्कार कर दिया। इससे पहले नेतन्याहू ने न्यायिक सुधार के नाम पर विधेयक लाकर अपने को ‘अपराध-मुक्त’ करने की योजना बनायी थी, लेकिन इज़रायल की जनता ने सड़कों पर उतर कर इस विधेयक का विरोध किया और मजबूरन नेतन्याहू को यह विधेयक वापस लेना पड़ा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इज़रायल में आम चुनाव होते ही नेतन्याहू न सिर्फ  हार जाएंगे बल्कि भ्रष्टाचार के मामलों में सलाखों के पीछे भी जायेगा। इसलिए गद्दी पर बने रहने के लिए वह अपने मुल्क को निरन्तर जंग में थोपे हुए है और अब उसने इस उद्देश्यरहित युद्ध में ट्रम्प को भी फंसा दिया है। 
दरअसल, ट्रम्प को यह समझाया गया था, जैसा कि सीआईए की अमरीकी सांसदों को ब्रीफिंग से ज्ञात होता है, कि ईरान के सुप्रीम लीडर व अन्य शीर्ष लीडरशिप की हत्या करते ही वहां की जनता तख्ता पलट देगी और नई कमज़ोर सरकार से अपनी शर्तों पर समझौता हो जायेगा। यह काम एक दो दिन में ही पूरा हो जायेगा। ट्रम्प ने ईरान को वेनेजुएला समझने की भूल कर दी। इसके अतिरिक्त ट्रम्प को शायद किसी ने यह नहीं समझाया (या उनकी समझ में नहीं आया) कि ईरान ही नहीं बल्कि दुनियाभर के इमामिया शिया समुदाय के लिए सुप्रीम लीडर का क्या महत्व होता है? अस्ना अशरिया या 12 इमामों को मानने वाले इमामिया शिया अपने सुप्रीम लीडर, जोकि 12वें गायब इमाम का प्रतिनिधि होता है कि तकलीदे-मरजा में होते हैं, जिसका सामान्य शब्दों में अर्थ यह होता है कि उसका कथन अंतिम होता है और कोई इमामिया शिया उसके कथन का उल्लंघन नहीं करेगा, वह उसके लिए अपना  सब कुछ कुर्बान कर देगा। इसलिए सुप्रीम लीडर की हत्या करना ट्रम्प व नेतन्याहू की बहुत बड़ी गलती रही। यही वजह है कि ईरान ने ट्रम्प के सीज़फायर के ऑफर को ठुकरा दिया, अब वह करो या मरो की स्थिति में है; क्योंकि उसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है और जब बहरीन में स्थित अमरीका की पांचवीं फ्लीट पर ईरानी मिसाइल गिरती हैं या अमरीका के अन्य बेसों पर हमले होते हैं तो वहां के शिया जश्न मनाते हैं। 
बहरहाल, इस बेमकसद युद्ध का नुकसान अब पूरी दुनिया को उठाना पड़ रहा है। ईरान ने स्ट्रेट आफ होर्मुज़बंद कर दिया है, जहां से 20 मिलियन तेल और वैश्विक एलएनजी व्यापार का पांचवां हिस्सा निकलता है। ज़ाहिर है इससे न सिर्फ तेल व गैस की कमी दुनिया भर के देश महसूस कर रहे हैं, बल्कि उनमें महंगाई भी निरन्तर बढ़ती जा रही है। इसके अतिरिक्त व्यापार व हवाई यात्रा भी बुरी तरह से प्रभावित हो गए हैं। खाड़ी के देशों में भारत के लगभग 18.3 मिलियन लोग काम करते हैं, जिनमें से अकेले यूएई में 4.4 मिलियन, सऊदी अरब में 2.6 मिलियन और कुवैत में 1.15 मिलियन भारतीय काम करते हैं। ऐसे देश भी मुसीबत में फंसते जा रहे हैं, जिनका इस युद्ध से कोई संबंध नहीं है। अगर इस युद्ध पर जल्द विराम न लगा तो तीसरे विश्व युद्ध की सम्भावना से इन्कार नहीं किया जा सकता।
-इमेज रिफ्लेक्शन सेंटर 

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