अनेक पहलुओं से प्रभावित होगा भारत
अमरीका-इज़रायल एवं ईरान युद्ध
कहने को अमरीका दुनिया की सबसे बड़ी शक्ति है, परन्तु उसके राष्ट्रपति ट्रम्प का यह कहना समझ से परे है कि यदि ईरान परमाणु बम न बनाने की बात मान लेता तो उसकी तबाही का बिगुल न बजाना पड़ता, यही नहीं उसने बात करने में देरी कर दी तो इसकी भी सज़ा उसे मिलनी तय ही थी। सत्ता और ताकत का नशा जब सिर चढ़कर बोलता है तो ऐसा ही होता है।
सत्ता का अजब खेल : अमरीका की शह और कुछ अपने बलबूते आज इज़राइल हालांकि क्षेत्रफल और जनसंख्या के हिसाब से दुनिया के छोटे देशों में से एक है, लेकिन उसकी सैन्य शक्ति और आधुनिक हथियार किसी भी बड़े देश को टक्कर दे सकते हैं। उसका खुफिया तंत्र किलिंग मशीन कहलाता है यानी जिससे इज़राइल को खतरा हो, वह बच नहीं सकता। अपने संसाधनों से किस तरह एक निडर और सशक्त बना जा सकता है, यह देश उसकी मिसाल है। उसका दुश्मन नंबर एक ईरान उसी की तरह ताकतवर बन कर उभरा, लेकिन उसकी छवि कट्टरपंथी वाली रही। ये दोनों देश अपनी ऐसी छवि बना चुके हैं कि कोई चाहे तो भी इन्हें नकार या इनकी अवहेलना नहीं कर सकता। विश्व की महाशक्तियों के बीच यह दोनों देश किसी का भी पलड़ा झुकाने में सक्षम हैं।
मध्य-पूर्व को दुनिया भर में तेल भंडारों के रूप में जाना जाता है और जबसे उन्हें सोने जैसे अपने अंदर छिपे अद्भुत खज़ाने का पता चला, उन्होंने इसकी अहमियत को समझा और दिन प्रतिदिन मालामाल होने लगे। कभी वीरान, रेगिस्तान और बीहड़ क्षेत्र के रूप में जाना जाने वाला यह भू-भाग दुनिया भर की नज़रों का केंद्र बन गया। इन्होंने भी अपने फायदे-नुकसान को ध्यान में रखते हुए संपन्न देशों को अपने यहां आकर अपने इलाकों को विकसित करने और आधुनिक बनाने का फैसला किया। सबसे अधिक अमरीका ने डॉलर की ताकत का एहसास कराते हुए इन सभी देशों में अपना प्रभुत्व स्थापित कर लिया। ईरान भी इसमें सहभागी था, लेकिन जब इज़रायल अमरीका को अपने कंधे का इस्तेमाल ईरान को खत्म करने के लिए देता नज़र आया तो पूरी दुनिया सकते में आ गई। ईरान ने अमरीका की दुखती रग यानी मध्य-पूर्व में उसके कहने को सैन्य अड्डों लेकिन असल में उसकी बनाई सभी परियोजनाओं को ध्वस्त करने की कार्रवाई शुरू कर दी। इससे अमरीका की बौखलाहट बढ़ गई। उधर ईरान या बातचीत और झुकने के लिए राज़ी हो या अपनी विध्वंसक गतिविधियों को और अधिक बढ़ाये ताकि पूरी दुनिया पर असर पड़े। उसने होर्मुज जलडमरू मध्य बंद कर दिया। इससे हाहाकार मचना तय था क्योंकि इसी रास्ते से तेल लगभग सभी जगह पहुंचता है। परिणाम यह हुआ कि युद्ध और तेज़ हो गया।
सौंदर्य का महाविनाश : दुनिया के आकर्षण और आर्थिक विकास तथा पर्यटन के लिए पहली पसंद बने अरब देशों की हालत अब ऐसी हो गई है कि यहां जाने, बसने और व्यापार की संभावना लगभग समाप्त होने की स्थिति में है। दुबई हो या अबू धाबी, रियाद हो या अज़रबाइजान जैसा अद्भुत सौन्दर्य से भरपूर क्षेत्र, सब कुछ अंधकार और धुएं के गर्त में समा गया है। यदि युद्ध न रुका तो ये सब उस प्राचीन युग में पहुंच जाएंगे जिसकी कल्पना करने से भी डर लगता है। ईरान और इज़रायल का अब तक बहुत नुकसान हो चुका है जिसकी भरपाई करने में बहुत समय लगेगा। अमरीका की अपनी धरती का कुछ नहीं बिगड़ा लेकिन उसके अहंकार ने इस पूरे क्षेत्र का नक्शा ही बदल दिया है।
अगर भारत की बात करें तो इस पर भी अप्रत्यक्ष विपरीत प्रभाव पड़ने की सम्भावना है। जहां एक ओर अपनी सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और विकास परियोजनाओं के पूरा होने में बाधा पड़ना निश्चित है, वहीं दूसरी ओर कृषि, परिवहन और ऊर्जा के साधनों की कमी और उनकी बढ़ने वाली कीमतों को लेकर सरकार और जनता का चिंतित होना स्वाभाविक है। ईरान के दिवंगत सुप्रीमो खामेनेई के प्रति शोक प्रकट करना इसकी शुरुआत है। इन देशों में फंसे अपने नागरिकों की सुरक्षित वापसी में ईरान बहुत बड़ा मददगार होगा क्योंकि उसके हमले की जद में जो ठिकाने आए हैं, उनमें बड़ी संख्या में भारतीय कार्यरत हैं। भारत की कूटनीतिक क्षमता इसी बात से आंकी जाएगी कि यह खाड़ी देशों में फंसे अपने नागरिकों को कैसे जल्दी सुरक्षित तरीके से भारत में वापस ला सकते हैं।
भारत पर प्रभाव और भूमिका : भारत की विदेश नीति तटस्थता और अहिंसा पर आधारित है। इसलिए किसी भी पक्ष के साथ सक्रिय रूप से खड़े होना या समर्थन करते हुए दिखना या फिर सीधे युद्ध में भाग लेना हानिकारक सिद्ध होगा। सक्रिय भागीदारी से आतंकवादी हमलों की आशंका है, तेल आयात बाधित हो सकता है जो भारत की 7 प्रतिशत की विकास दर पर असर डाले बिना नहीं रहेगा। हम पहले ही बेरोज़गारी और महंगाई से जूझ रहे हैं और जब इन देशों में रह रहे लगभग एक करोड़ लोग भारत आयेंगे तो इसमें संदेह नहीं कि वे अपने साथ अपना कौशल और अनुभव भी लाएंगे लेकिन फिर भी उन्हें बसाने की समस्या से तो जूझना ही होगा। इन देशों से जी पैसा भारत आता था, उसके बंद होने से देश को बहुत नुकसान होगा। इस युद्ध का सबसे विपरीत असर हमारे एमएसएमई क्षेत्र और निर्यातकों पर पड़ना शुरू हो गया है। हालांकि घरेलू खपत बढ़ रही है, लेकिन उसकी भी एक सीमा है।
यह युद्ध भारत के लिए चुनौती और अवसर दोनों है। अगर यह क्षेत्रीय संघर्ष विश्वव्यापी संकट में बदल गया तो उसके लिए प्रत्येक भारतीय को अभी से सावधान हो जाना चाहिए। रूस-यूक्रेन युद्ध की तरह अगर यह लड़ाई भी अनिश्चित काल तक खिंच गई तो भारत के लिए इसके परिणाम शुभ नहीं होंगे। तेल कीमतों में उछाल और आयात बिल पर दबाव हमारी सबसे बड़ी चुनौती है। आयात हो या निर्यात, जहाज़ों को लंबे रूट से आना-जाना होगा जिसका सीधा अर्थ महंगाई बढ़ना है। शेयर बाज़ार में इसका असर साफ दिख रहा है। खाद्य और अन्य उपभोक्ता पदार्थ मांग और पूर्ति के संकट से जुड़ेंगे तो इससे जमाखोरी और कालाबाज़ारी की समस्या पैदा होगी जिससे निपटने के लिए सरकार को अभी से निगरानी और कड़े कदम उठाने होंगे। स्थिति गंभीर है और परेशानियों का बढ़ना तय है और ऐसे में ही संयम, आत्मबल और धैर्य की परीक्षा होती है।



