पाकिस्तान और अ़फगानिस्तान के बीच बढ़ रहा है टकराव
विगत कुछ दिनों से भारत के पड़ोसी देशों पाकिस्तान और अ़फगानिस्तान के बीच बढ़ रहे टकराव के कारण दोनों देशों की सीमाओं पर भीषण सैन्य झड़पें हुई हैं। अ़फगानिस्तान की तालिबान सरकार ने दावा किया है कि उसके सुरक्षा दलों ने पाकिस्तान की 25 से अधिक चौकियों पर कब्ज़ा कर लिया है और 100 से अधिक सैनिक भी मार दिए हैं। दूसरी तरफ पाकिस्तान ने दावा किया है कि उसकी ओर से तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के पाकिस्तान स्थित प्रशिक्षण केन्द्रों को नष्ट कर दिया गया है और बड़ी संख्या में विद्रोही भी मारे गए हैं। निष्पक्ष सूत्रों ने पाकिस्तान द्वारा कंधार, काबुल और बगराम हवाई अड्डे पर हमले करने की पुष्टि की है। दोनों देशों के बीच चल रहे टकराव के कारण अ़फगानिस्तान के सीमांत क्षेत्रों में लगभग 66000 लोगों को अपने घर भी छोड़ने पड़े हैं।
दोनों देशों के बीच सीमाएं अंग्रेज़ों के शासनकाल के दौरान की गई थीं, जिसे डूरंड लाइन कहा जाता है। अंग्रेज़ों द्वारा अ़फगानिस्तान और पाकिस्तान के बीच सीमा तय करने का काम ब्रिटिश अधिकारी सर हैजरी मोर्टीमर डूरंड ने किया था। अ़फगानिस्तान की ओर से इस कार्य में अमीर अब्दुर रहमान खान शामिल हुए थे। तब पाकिस्तान भारत का हिस्सा था और भारत पर अंग्रेज़ शासन कर रहे थे। उस समय भी अ़फगानिस्तान और भारत की सीमा पर लगातार झड़पें होती रहती थीं। अंग्रेज़ तब बड़ी शक्ति थे। उन्होंने ही यह सीमा निर्धारित करने का फैसला किया था, परन्तु अ़फगानिस्तान ने तब भी इसे स्वीकार नहीं किया था। आज भी अ़फगानिस्तान द्वारा इस सीमा को मान्यता नहीं दी जाती और वह पाकिस्तान के ़खैबर पख्तूनख़्वा क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा अपना समझता है, जिसे ब्रिटिश शासकों ने जब्री छीन लिया था। यह वार्ता पिछले लम्बे समय की है।
1947 में देश के विभाजन के समय पाकिस्तान (जिस में पूर्वी पाकिस्तान भी शामिल था, जो आज का बांग्लादेश है) एक अलग देश बन गया था। इसलिए अ़फगानिस्तान की इस सीमा विवाद की विरासत पाकिस्तान की झोली में पड़ गई थी, परन्तु इस विवाद के जारी रहते भी पाकिस्तान ने पिछले कई दशकों से अ़फगानिस्तान में किसी न किसी रूप में हस्तक्षेप जारी रखा है। वर्ष 1979 में यूनियन ऑफ सोवियत सोशलिस्ट रिपब्लिक्स (यू.एस.एस.आर.) ने अ़फगानिस्तान पर हमला करके वहां अपनी विचारधारा से संबंधित अ़फगानिस्तानी नेताओं को अ़फगास्तिन के शासक बना दिया था, परन्तु इस सरकार के होते हुए भी अ़फगानिस्तान के लड़ाकू विद्रोही तालिबानों ने लम्बे समय तक उस सरकार के नाक में दम करके रखा था। अ़फगानिस्तान की सोवियत यूनियन पक्षीय सरकार के विरुद्ध लड़ने वाले बहुत से संगठनों के लड़ाकों ने तब पाकिस्तान में शरण ली हुई थी, जहां वे निरन्तर अपनी गतिविधियों को अंजाम देते थे। पाकिस्तान शुरू से ही अमरीका के प्रभाव में रहा है। अमरीका ने सोवियत यूनियन को मात देने के लिए पाकिस्तान द्वारा अ़फगानिस्तान के तालिबानों की पूरी सहायता की और तब इसी कारण जहां सोवियत यूनियन की सेनाओं को अ़फगानिस्तान से निकलना पड़ा, वहीं बाद में सोवियत यूनियन पक्षीय सरकार को भी अमरीका और पाकिस्तान की सहायता प्राप्त तालिबान ने उखाड़ दिया था।
अ़फगानिस्तान में तालिबान का शासन स्थापित होने के बाद सऊदी अरब के इस्लामिक कट्टरपंथी और अल-कायदा के प्रमुख ओसामा-बिन-लादेन ने अमरीका पर हमला करके उसे बड़ी चुनौती दी थी। उस समय लादेन को अ़फगानिस्तान ने शरण दी हुई थी, जिस कारण अमरीका ने अ़फगानिस्तान के तालिबान शासन को खत्म करने के लिए अपनी सैन्य गतिविधियां पाकिस्तान द्वारा ही शुरू की थीं और तालिबानियों के शासन को उखाड़ दिया गया था। अमरीका की सहायता से वहां बनी सरकारों को तालिबान लगातार चुनौती देता रहा है तथा उसकी ओर से लम्बा संघर्ष लड़ा गया। पाकिस्तान ने उस समय दोगली नीतियां अपनाते हुए जहां तालिबान का पक्ष-पोषण किया, वहीं अमरीका के साथ भी अपनी विवशताओं के कारण समय-समय पर सहायता लेने के लिए अच्छा बनने का नाटक करता रहा, जिसका कच्चा चिट्ठा बाद में सभी के समक्ष आ गया था। समय पाकर तालिबान के पुन: अ़फगानिस्तान पर काबिज़ होने के बाद दोनों पड़ोसी देशों का जो टकराव तथा तनाव बना हुआ है, उसका मुख्य कारण तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान संगठन के गुरिल्ले हैं, जिनकी सहायता कई अन्तर्राष्ट्रीय संगठन कर रहे हैं। इन दोनों ने लगातार पाकिस्तान के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में हिंसक गतिविधियां जारी रखते हुए जहां उसे बड़ी चुनौती दी हुई है, वहीं पाकिस्तान लगातार यह आरोप लगाता रहा है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान के गुरिल्लों ने अ़फगानिस्तान में शरण ली हुई है और वहां वे सीमा पार करके लगातार पाकिस्तान को रक्त-रंजित कर रहे हैं। पाकिस्तानी तालिबान ने पाकिस्तान के सीमांत क्षेत्रों के अतिरिक्त लाहौर एवं इस्लामाबाद तक को भी कई बार अपना निशाना बनाया है। वे कट्टरपंथी शिया मस्जिदों को भी अपना निशाना बना रहे हैं, जिनमें अब तक सैकड़ों ही लोग मारे जा चुके हैं। विगत दिवस भी पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में एक मस्जिद पर हमले की इन गुरिल्लों ने ज़िम्मेदारी ली थी, जिसमें 31 लोग मारे गए और सैकड़ों ही लोग घायल हुए थे।
पाकिस्तान लगातार होते ऐसे हमलों के लिए अ़फगानिस्तान में छुपे गुरिल्लों को ही आरोपी ठहराता रहा है और अ़फगानिस्तान सरकार पर उन्हें शरण देने का आरोप लगाता रहा है। दूसरी तरफ अ़फगानिस्तान सरकार ने इनके साथ अपने संबंध होने से इन्कार किया है परन्तु हिंसक घटनाओं का यह सिलसिला खत्म होने वाला प्रतीत नहीं होता। इसी कारण ही पाकिस्तान की सेना अ़फगानिस्तान के सीमांत ज़िलों पर अक्सर हमले करती रहती है, जिस कारण दोनों देशों के बीच तनाव बहुत बढ़ चुका है। इसके उत्तर में अ़फगानिस्तान के गृह मंत्री सिराजुद्दीन हक्कानी ने पाकिस्तान पर यह आरोप लगाया है कि वह अपनी सेनाओं द्वारा अ़फगानिस्तान पर हमला करके अ़फगानिस्तान की प्रभुसत्ता और अन्तर्राष्ट्रीय कानून का उल्लंघन कर रहा है। इसके साथ ही इस्लामिक अमीरात ऑफ अ़फगानिस्तान की तालिबान सरकार के प्रवक्ता जबीहुल्ला मुजाहिद ने भी यह धमकी दी थी, कि वह इन हमलों का जवाब हर स्थिति में देंगे।
पाकिस्तान में पैदा हो रही यह स्थिति बेहद ़खतरनाक है, जो दोनों देशों में किसी बड़े सम्भावित युद्ध को छिड़ने का संकेत दे रही है। चीन तथा रूस ने दोनों देशों को अपने मतभेद सुलझाने की अपील की है। भारत सरकार ने भी इस संबंध में स्पष्ट रूप में यह कहा है कि पाकिस्तान की सेनाएं हमला करके अ़फगानिस्तान की प्रभुसत्ता को चुनौती दे रही हैं। यदि आगामी दिनों में दोनों देशों में युद्ध होता है तो यह इस क्षेत्र के लिए भारी विनाश का कारण बन सकता है।
—बरजिन्दर सिंह हमदर्द

